राजू सजवान
एनएसओ की ‘पारिवारिक सामाजिक उपभोग: स्वास्थ्य’ रिपोर्ट में कहा गया है कि 13.1% आबादी ने पिछले 15 दिनों में बीमारी की सूचना दी। देश का हर आठ में एक व्यक्ति बीमार है। इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि 100 में से 13 व्यक्ति किसी न किसी रोग से ग्रस्त है। इसमें बच्चों और बुजुर्गों की संख्या सबसे अधिक है। एक और खास बात यह है कि 15 से 29 आयु वर्ग के युवा भी हृदय रोगों की चपेट में आ रहे हैं।

ये खुलासे राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) द्वारा जारी ‘पारिवारिक सामाजिक उपभोग: स्वास्थ्य’ रिपोर्ट में किए गए हैं। यह रिपोर्ट एनएसएस के 80वें राउंड (जनवरी–दिसंबर 2025) पर आधारित है। इस रिपोर्ट में देश में बीमारी, इलाज के उपयोग और स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च की व्यापक तस्वीर पेश की जाती है। रिपोर्ट तैयार करने के लिए सर्वे के दौरान लोगों से पूछा गया कि पिछले 15 दिनों (दो हफ्तों) में वे बीमार थे या नहीं। तब पता चला कि देश में पिछले 15 दिनों के दौरान करीब 13.1 प्रतिशत लोगों ने अपने बीमार होने की जानकारी दी। यानी लगभग हर आठ में से एक व्यक्ति बीमार रहा। रिपोर्ट के अनुसार, शहरी क्षेत्रों में बीमारी की दर ग्रामीण क्षेत्रों से अधिक है। शहरों में लगभग 14.9 प्रतिशत लोगों ने बीमारी की सूचना दी, जबकि ग्रामीण इलाकों में यह आंकड़ा करीब 12.2 प्रतिशत रहा। लिंग के आधार पर भी अंतर देखने को मिला। महिलाओं में बीमारी की दर 14.4 प्रतिशत रही, जबकि पुरुषों में यह 11.8 प्रतिशत दर्ज की गई।

बच्चों में बढ़ रहा संक्रमण
उम्र के हिसाब से देखें तो 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों में बीमारी सबसे ज्यादा पाई गई। इस आयु वर्ग में करीब 42 से 45 प्रतिशत लोगों ने खुद को बीमार बताया। इसके बाद 45 से 59 वर्ष के आयु वर्ग में लगभग 20 से 25 प्रतिशत लोग बीमार पाए गए। वहीं, 15 से 29 वर्ष के युवाओं में बीमारी सबसे कम रही, जहां करीब 4 से 5 प्रतिशत लोगों ने बीमारी की सूचना दी। छोटे बच्चों (0–4 वर्ष) में यह आंकड़ा लगभग 9 से 10 प्रतिशत रहा। रिपोर्ट के अनुसार, 0–14 वर्ष के बच्चों और किशोरों में बीमारियों का सबसे बड़ा हिस्सा संक्रमण और सांस से जुड़ी समस्याओं का है, जिनमें बुखार, सर्दी-खांसी और गले के संक्रमण प्रमुख हैं। 15 से 29 वर्ष के युवा वर्ग में संक्रमण अभी भी प्रमुख बना रहता है, लेकिन इसके साथ मानसिक/न्यूरोलॉजिकल और गैस्ट्रो-इंटेस्टाइनल (पेट से जुड़ी) समस्याओं का हिस्सा उल्लेखनीय रूप से बढ़ने लगता है।

इससे अंदाजा लगाया जा सकता है इस आयु वर्ग के युवाओं में शारीरिक के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियां भी उभरने लगती हैं। 30–44 वर्ष के आयु वर्ग में कार्डियो-वेस्कुलर (दिल की बीमारियां) और एंडोक्राइन/मेटाबोलिक (जैसे डायबिटीज) का प्रतिशत तेजी से बढ़ता है, जिसका सीधा संबंध उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसे जोखिम कारकों से है। 45–59 वर्ष के समूह में जीवनशैली से संबंधित बीमारियों की हिस्सेदारी और अधिक बढ़ जाती है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि मध्य आयु तक पहुंचते-पहुंचते गैर-संचारी बीमारियां स्वास्थ्य पर प्रमुख दबाव डालने लगती हैं। 60 वर्ष और उससे अधिक आयु में हृदय रोग और मेटाबोलिक बीमारियाँ शीर्ष पर बनी रहती हैं, और इनके साथ हड्डी और जोड़ से जुड़ी समस्याओं का अनुपात भी लगातार बढ़ता है। वहीं, 15 से 29 वर्ष के युवाओं में बीमारी सबसे कम रही, जहां करीब 4 से 5 प्रतिशत लोगों ने बीमारी की सूचना दी। छोटे बच्चों (0–4 वर्ष) में यह आंकड़ा लगभग 9 से 10 प्रतिशत रहा।

दोगुनी हुई बीमारी की दर
रिपोर्ट में 1995 से अब तक के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षणों के आधार पर बीमारी के रुझानों का तुलनात्मक विश्लेषण भी प्रस्तुत किया गया है। जहां 1995–96 (52वें राउंड) के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण में पिछले 15 दिनों में बीमार होने की सूचना देने वाले लोगों का अनुपात ग्रामीण क्षेत्रों में 5.5 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 5.4 प्रतिशत था, वहीं 2004 (60वें राउंड) में यह बढ़कर क्रमशः 8.8 प्रतिशत और 9.9 प्रतिशत हो गया। इसके बाद 2014 (71वां राउंड) में यह 8.9 प्रतिशत (ग्रामीण) और 11.8 प्रतिशत (शहरी) तथा 2017–18 (75वां राउंड) में 6.8 प्रतिशत और 9.1 प्रतिशत दर्ज किया गया। ताजा 2025 (80वां राउंड) में यह अनुपात बढ़कर ग्रामीण क्षेत्रों में 12.2 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 14.9 प्रतिशत हो गया है, जो देश में बढ़ते रोग-भार और बीमारी की बढ़ती रिपोर्टिंग दोनों का संकेत देता है। 1995–96 के मुकाबले 2025 तक बीमारी की दर लगभग दोगुनी से अधिक हो गई है।
(‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )
