डी एन एस आनंद

भारत कोरोना की तीसरी लहर की चपेट में आ चुका है। देश में कोरोनावायरस के नए वैरिएंट ओमीक्रोम के संक्रमण की गति अचानक काफी तेज हो गई है। इस बीच देश में टीकाकरण की प्रक्रिया को व्यापक बनाने की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है। देश के 15 से 18 वर्ष तक के किशोरों को वैक्सीन लगाने का कार्य शुरू हुआ तो कोरोना के फ्रंट वैरियर्स एवं 60 वर्ष से ऊपर के वरिष्ठ नागरिकों को वैक्सीन का बूस्टर डोज लगाने का काम भी प्राथमिकता के आधार पर शुरू किया गया है। इस संबंध में आवश्यक प्रक्रिया शुरू हो गई है। हालात से परेशान लोग इस संकट से हर हाल में छुटकारा पाना चाहते हैं। पर यह लोगों की सजगता, वैज्ञानिक जागरूकता एवं दृढ़ता से ही संभव हो पाएगा। ऐसे में जरूरी है कि देश में कमजोर चिकित्सा सुविधाओं को बेहतर एवं प्रभावशाली बनाने के साथ ही, लोगों में वैज्ञानिक जागरूकता एवं वैज्ञानिक मानसिकता के विकास के काम को भी तेज किया जाए। उल्लेखनीय है कि भारतीय संविधान ने भी इसे देश के नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों में शामिल किया है।

यह आजादी का 75 वां वर्ष है। इसके उपलक्ष्य में देश भर में आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। ऐसे में जरूरी है कि हम आजादी के करीब सात दशक की उपलब्धियों एवं कमजोरियों की तर्कसंगत समीक्षा करें तथा भारतीय संविधान निर्दिष्ट अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह हम हर हाल में सुनिश्चित करें। निश्चय ही इसे आत्ममंथन का भी वर्ष होना चाहिए ताकि हम समझ सकें कि इन लगभग सात दशकों में विज्ञान एवं तकनीक में उल्लेखनीय प्रगति के बावजूद देश की काफी बड़ी आबादी अब तक न्यूनतम सुविधाओं से भी वंचित क्यों है? क्यों नहीं विकास एवं प्रगति की रोशनी उन तक पहुंच पाई ? क्यों उपलब्ध साधन सुविधाएं मुट्ठी भर लोगों के हाथों में सिमट कर रह गई ? कितना उपयोगी रहा देश के विकास का मौजूदा मॉडल ? और देश की काफी बड़ी आबादी को गरीबी, बदहाली एवं अंधविश्वास के मौजूदा गर्त से निकाला कैसे जा सकता है ?

दरअसल आमलोगों के सामूहिक प्रयास एवं संघर्ष से ही खुलेंगे प्रगति के द्वार। इसके लिए बेहद जरूरी है लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, वैज्ञानिक चेतना का विकास और इसके लिए जरूरी है लोगों के बीच जन विज्ञान जागरूकता अभियान एवं जन विज्ञान आंदोलन। मौजूदा परिदृश्य में यह सवाल अहम है कि आजादी के इस 75 वें वर्ष को हम कैसे सेलेब्रेट करें ? क्या अब तक की उपलब्धियों का जश्न मनाएं ? या फिर अपनी विफलताओं एवं कमजोरियों का शोक मनाएं ? अपने अतीत की गौरव गाथा गाएं या 21 वीं सदी के विज्ञान तकनीक की उपलब्धियों पर इतराएं ? दरअसल अतिउत्साही या दुखी होने के बजाय वस्तुस्थिति का सही सटीक तर्कसंगत मूल्यांकन जरूरी है। उपलब्धियों का जश्न जरूर मनाएं पर अपनी गलतियों, कमजोरियों की निर्मम, तथ्यपरक, तर्कसंगत समीक्षा भी करें। उससे सबक सीखें एवं गलतियों को स्वीकारें, उसे सुधारें। इस प्रकार विज्ञान विधि का इस्तेमाल करते हुए, समाज की कमियों, कमजोरियों को दूर करें एवं समतामूलक तर्कशील, आधुनिक एवं आत्मनिर्भर भारत के निर्माण की दिशा में मिल जुलकर साझा प्रयास करें तथा निर्धारित लक्ष्य हासिल करें।

आजादी के बाद ही शुरू हो गया था प्रयास
1947 में काफी संघर्ष एवं बलिदान के बाद भारत को विदेशी गुलामी से मुक्ति मिली थी। उस समय देश में लोगों के लिए बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव था। देश में शिक्षा की दर बहुत कम थी। स्वास्थ्य सुविधाओं का बेहद अभाव था। अंधविश्वास, कुरीतियों समेत अनेक सामाजिक विसंगतियां, विकृतियां मौजूद थीं। एक विकसित समाज एवं देश के निर्माण के लिए भारत को उस हालत से निकालना जरूरी था।लोगों में वैज्ञानिक जागरूकता को ध्यान में रखते हुए 1962 में ही केरल में केरल शास्त्र साहित्य परिषद ( KSSP )का गठन हुआ। मकसद था जन जन तक विज्ञान पहुंचाना एवं लोगों में वैज्ञानिक मानसिकता एवं संविधान सम्मत लोकतांत्रिक चेतना का विकास। नारा बना – सामाजिक परिवर्तन के लिए विज्ञान ( Science for social revolution ) 1974 में इसे देशव्यापी जन विज्ञान आंदोलन में बदल दिया गया। आल इंडिया पीपुल्स साइंस नेटवर्क ( AIPSN ) की स्थापना हुई। स्वभावत : यह जन मुद्दों पर विभिन्न राज्यों, क्षेत्रों में काम करने वाले संगठनों का मंच था।

1984 में भोपाल गैस काण्ड हुआ जिसमें बड़ी संख्या में लोग इस हादसे का शिकार हुए। नागरिकों में वैज्ञानिक जागरूकता की कमी का दुष्परिणाम सामने आया। सरकार एवं संगठनों के बीच विमर्श की प्रक्रिया शुरू हुई। अंततः राष्ट्रीय स्तर पर जन विज्ञान जत्था निकालने की योजना बनी। इस प्रकार 1987 में देशव्यापी जन विज्ञान जत्था अभियान की शुरुआत हुई। जत्था में विज्ञान कर्मियों के‌ साथ साथ संस्कृतिकर्मियों को भी शामिल किया गया। देश के चारों महानगरों से निकल कर देश के विभिन्न राज्यों, जिलों, क्षेत्रों में अपनी प्रस्तुति देते जत्थे ने देश के अधिकाधिक जिलों तक पहुंचने का प्रयास किया। अंत में देश के मध्य भोपाल में सभी जत्थों का मिलन हुआ ‌एवं वहां शानदार कार्यक्रम आयोजित हुआ। यह थी विज्ञान को पुस्तकों, पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं से निकाल कर जन जन तक, गांव – मुहल्लों, खेतों खलिहानों तक पहुंचाने की सराहनीय पहल।

उससे देश के विज्ञान लोकप्रियकरण अभियान को काफी बल मिला। यह काम तेजी से आगे बढ़ने लगा। भारत से निरक्षरता समाप्त करने के लिए 5 मई 1988 को राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की शुरुआत हुई। 1989 में विज्ञान प्रसार का गठन किया गया। स्वभावत : वैज्ञानिक जागरूकता के काम में गति आई। जन वैज्ञानिक प्रो. यशपाल, डॉ नरेन्द्र सहगल समेत अनेक वैज्ञानिकों, विज्ञान कर्मियों ने इस क्रम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1993 से राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस की शुरुआत हुई। इसने देश के स्कूली गैर स्कूली बच्चों में खोजी प्रवृत्ति एवं नवाचार को बढ़ावा देने का बेहद सराहनीय प्रयास किया। इसके लिए देश भर के इससे संबंधित संगठनों को एक जुटकर एनसीएसटीसी नेटवर्क ( NCSTC Network ) का गठन खुद में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। इस पहल से देश में विज्ञान संचार, विज्ञान लोकप्रियकरण अभियान एवं जन विज्ञान आंदोलन को काफी बल मिला। 2004 में वैज्ञानिक जागरूकता वर्ष ( YSA ) का सफल आयोजन इसी की एक कड़ी है। इससे देश में विज्ञान संचार को बढ़ावा मिला। सोशल मीडिया ने इसे बल पहुंचाया। आज देशभर में काफी संख्या में छोटे बड़े संगठन, समूह अथवा व्यक्ति हैं जो विज्ञान को अधिकाधिक लोगों तक पहुंचाने एवं उनमें वैज्ञानिक जागरूकता के लिए बेहतरीन प्रयास कर रहे हैं। कोविड – 19 महामारी ने इसकी जरूरत को काफी गहरे रेखांकित किया। एक बार फिर विज्ञान ने अपनी महत्ता साबित की।

हालांकि इस रास्ते में चुनौतियां कम नहीं हैं। यथास्थिति बनाए रखने, हर स्थिति का फायदा उठाने, धर्म के नाम पर धंधेबाजी करने, अंधविश्वास को बढ़ावा देकर समाज एवं देश को पीछे की ओर धकेलने की कोशिशें भी लगातार जारी हैं ताकि इस पर कुछ लोगों का वर्चस्व कायम रहे। पर ऐसे में यह जरूरी है कि जन संवाद, जन विज्ञान अभियान/ आंदोलन को तेजी से आगे बढ़ाया जाए। इसे जन जन तक पहुंचाया जाय ताकि गैर बराबरी, शोषण उत्पीड़न, अंधश्रद्धा, अंधविश्वास, कुरीति, पाखंड मुक्त, समतामूलक, विविधतापूर्ण, धर्मनिरपेक्ष, तर्कशील, विज्ञान सम्मत, आधुनिक एवं आत्मनिर्भर भारत का निर्माण संभव हो सके।


डी एन एस आनंद
महासचिव, साइंस फार सोसायटी, झारखंड
संपादक, वैज्ञानिक चेतना, साइंस वेब पोर्टल, जमशेदपुर, झारखंड

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