दयानिधि
भारत में पिछले तीन सालों में 2.8 करोड़ से ज्यादा बच्चों की जांच की गई। इनमें नौ लाख बच्चों में जन्म दोष या संबंधित समस्या पाई गई, उन्हें इलाज, देखभाल व पुनर्वास सेवाओं से जोड़ा गया। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने सभी देशों से अपील की है कि वे नवजात शिशुओं की जन्म के तुरंत बाद होने वाली जांच (न्यूबॉर्न स्क्रीनिंग) को बढ़ाएं। संगठन का कहना है कि जन्म के समय ही कई बीमारियों की पहचान हो जाए तो बच्चों की जान बचाई जा सकती है और उन्हें आजीवन विकलांगता से भी बचाया जा सकता है। डब्ल्यूएचओ की नई रिपोर्ट “स्ट्रेंग्थेनिंग कैपेसिटी फॉर न्यू बोर्न स्क्रीनिंग, डायग्नोसिस एंड मैनेजमेंट ऑफ बर्थ डिफेक्ट्स” में बताया गया है कि यह कदम बाल मृत्यु दर को कम करने में बहुत महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

जन्म दोष और उनकी गंभीरता
दुनिया भर में हर साल लगभग 80 लाख बच्चे जन्म दोषों के साथ पैदा होते हैं। इनमें से कई बीमारियां अगर समय पर पकड़ में आ जाएं तो आसानी से इलाज संभव है। लेकिन समस्या यह है कि बहुत से बच्चों में बीमारी का पता बहुत देर से चलता है या कभी पता ही नहीं चलता। रिपोर्ट के अनुसार, जन्म दोष अब पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मौतों का लगभग आठ प्रतिशत कारण बन चुके हैं। इनमें से लगभग 90 प्रतिशत मामले गरीब और मध्यम आय वाले देशों में होते हैं, जहां जांच और इलाज की सुविधाएं सीमित हैं।

कौन-कौन सी बीमारियां समय पर पकड़ी जा सकती हैं
कुछ ऐसी बीमारियां हैं जिन्हें जन्म के तुरंत बाद जांच से पहचाना जा सकता है और सही इलाज मिलने पर बच्चा सामान्य जीवन जी सकता है। इनमें शामिल हैं- जन्मजात हाइपोथायरायडिज्म, सिकल सेल रोग, सुनने की समस्या (हियरिंग इम्पेयरमेंट) और कुछ मेटाबॉलिक विकार। डब्ल्यूएचओ का कहना है कि अगर इन बीमारियों की जल्दी पहचान हो जाए तो बच्चे को गंभीर नुकसान से बचाया जा सकता है।

देशों के बीच बड़ा अंतर
डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट बताती है कि दुनिया में देशों के बीच बहुत बड़ा अंतर है। कुछ विकसित देश नवजात शिशुओं की 50 से ज्यादा बीमारियों की जांच करते हैं, जबकि कई देशों में कोई भी नियमित स्क्रीनिंग नहीं होती। डब्ल्यूएचओ का सुझाव है कि हर देश को कम से कम एक बड़ी बीमारी से शुरुआत करनी चाहिए और धीरे-धीरे अपनी क्षमता बढ़ानी चाहिए।

भारत सहित कई देशों की पहल
रिपोर्ट में कई देशों की सफल योजनाओं का जिक्र किया गया है। भारत में पिछले तीन सालों में 2.8 करोड़ से ज्यादा बच्चों की जांच की गई है। इनमें लगभग नौ लाख बच्चों में जन्म दोष या संबंधित समस्या पाई गई और उन्हें इलाज, देखभाल और पुनर्वास सेवाओं से जोड़ा गया। ब्राजील और अर्जेंटीना ने अपनी राष्ट्रीय स्तर की स्क्रीनिंग को लगभग सभी नवजात शिशुओं तक पहुंचाया है। फिलिपींस में यह कार्यक्रम छोटे स्तर से शुरू होकर अब हजारों अस्पतालों तक पहुंच चुका है और दर्जनों बीमारियों की जांच की जाती है। मिस्र ने नवजात देखभाल को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ दिया है, जिसमें हाइपोथायरायडिज्म और सुनने की जांच शामिल है। श्रीलंका में अधिकांश नवजात बच्चों की हाइपोथायरायडिज्म की जांच की जा रही है। वहीं युगांडा में सिकल सेल रोग की समय पर पहचान कर बच्चों को इलाज दिया जा रहा है।

डब्ल्यूएचओ की अपील और लक्ष्य
डब्ल्यूएचओ का कहना है कि सभी देशों को अपनी स्वास्थ्य प्रणाली में नवजात स्क्रीनिंग, निदान और इलाज को शामिल करना चाहिए। यह काम देश की जरूरतों और संसाधनों के अनुसार धीरे-धीरे बढ़ाया जा सकता है। रिपोर्ट में डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक टेड्रोस एडनॉम गेब्रियेसस ने कहा है कि किसी भी बच्चे को केवल इसलिए स्वस्थ भविष्य से वंचित नहीं होना चाहिए क्योंकि उसकी बीमारी का समय पर पता नहीं चल सका।

समय पर जांच ही सबसे बड़ा बचाव
डब्ल्यूएचओ की यह रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि नवजात शिशुओं की शुरुआती जांच जीवन बचाने का सबसे प्रभावी तरीका है। अगर हर देश इसे अपनी स्वास्थ्य प्रणाली का हिस्सा बना ले, तो लाखों बच्चों की जान बचाई जा सकती है और उन्हें बेहतर भविष्य दिया जा सकता है।
(‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )
