ललित मौर्या

 भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा तैयार यह नई तकनीक दवा को सीधे ट्यूमर तक पहुंचाकर लक्षित इलाज करेगी, जिससे इलाज अधिक असरदार और दुष्प्रभाव कम होने की उम्मीद है। स्तन कैंसर के खिलाफ जंग में भारतीय वैज्ञानिकों को एक बड़ी सफलता मिली है। महिलाओं में जानलेवा साबित होने वाली इस बीमारी का इलाज अब तक कीमोथेरेपी के भारी दुष्प्रभावों और शरीर पर पड़ने वाले बुरे असर के कारण बेहद चुनौतीपूर्ण रहा है।सामान्य कीमोथेरेपी से कैंसर कोशिकाओं के साथ-साथ स्वस्थ कोशिकाओं को भी नुकसान पहुंचता है, जिससे मरीज को बाल झड़ने और कमजोरी जैसे गंभीर साइड-इफेक्ट्स झेलने पड़ते हैं। साथ ही इसके कारण दवाओं के प्रति प्रतिरोध और ट्यूमर तक दवा के सीमित पहुंचने जैसी समस्याएं भी सामने आती हैं। इसी चुनौती का समाधान खोजते हुए इंस्टीट्यूट ऑफ नैनो साइंस एंड टेक्नोलॉजी (आईएनएसटी), मोहाली और भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बीएआरसी) के वैज्ञानिकों ने रोशनी से नियंत्रित होने वाला एक नया नैनो-रोबोट विकसित किया है।

सिर्फ कैंसर कोशिकाओं को निशाना बनाता है यह रोबोट

वैज्ञानिकों द्वारा साझा जानकारी के मुताबिक प्रकाश से चलने वाला यह ‘नैनो-रोबोट’ नियर-इन्फ्रारेड (एनआईआर) की मदद से शरीर के भीतर सीधे ट्यूमर का पीछा करता है और स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाए बिना, सिर्फ कैंसर कोशिकाओं को सटीक निशाना बनाकर नष्ट करता है। यह अध्ययन डॉक्टर जीबन ज्योति पांडा के नेतृत्व में किया गया है, जिसमें भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र से जुड़े वैज्ञानिक डॉक्टर संतोष के गुप्ता, स्वप्निल श्रीवास्तव, अनु बलहारा, पंकज खर्रा और ज्योति यादव ने भी सहयोग दिया है। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल एसीएस एप्लाइड मैटेरियल्स एंड इंटरफेसेस में प्रकाशित हुए हैं।

कैसे काम करता है यह नैनो-रोबोट?

अध्ययन से पता चला है कि यह रोबोट नियर-इन्फ्रारेड प्रकाश से नियंत्रित होता है। यह रोशनी बिना किसी नुकसान के शरीर की गहराई तक पहुंच सकती है। जैसे ही इस पर लेजर लाइट (980 नैनोमीटर) डाली जाती है, यह रोबोट खुद-ब-खुद रोशनी की दिशा में कैंसर ट्यूमर की ओर आगे बढ़ने लगता है। इस रोबोट पर ‘फॉलिक एसिड’ की परत चढ़ाई गई है, जो इसे कैंसर कोशिकाओं को पहचानकर सीधे उनसे जुड़ने में मदद करती है। इस दौरान नैनो-रोबोट दो अलग-अलग जैव-चिकित्सीय प्रक्रियाओं के जरिए कैंसर कोशिकाओं पर हमला करते हैं। इनमें फोटोथर्मल थेरेपी के तहत प्रकाश की ऊर्जा को गर्मी में बदलकर कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करते हैं। वहीं फोटोडायनामिक थेरेपी के दौरान ऑक्सीजन के सक्रिय अणु उत्पन्न होते हैं, जो कैंसर कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाकर उन्हें खत्म कर देते हैं। इन दोनों प्रभावों के कारण किसी एक अकेले उपचार की तुलना में ट्यूमर को अधिक प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है।

क्यों खास है यह नई तकनीक?

स्टडी से पता चला है कि वैज्ञानिकों ने इन नैनो-रोबोट की सतह पर फॉलिक एसिड जोड़ा है। स्तन कैंसर से जुड़ी कई कोशिकाओं की सतह पर फॉलेट रिसेप्टर अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। इसलिए यह नैनो-रोबोट मुख्य रूप से उन्हीं कैंसर कोशिकाओं को पहचानकर उनसे जुड़ता है। इससे स्वस्थ ऊतकों को कम नुकसान पहुंचने और इलाज के अधिक सटीक होने की संभावना बढ़ जाती है।

प्रयोगों में मिले उत्साहजनक नतीजे

वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला और कैंसर से पीड़ित चूहों पर इसका सफल परीक्षण किया है। नतीजों से साबित हुआ है कि अकेले इलाज करने के बजाय, इस रोबोट से किया गया मिश्रित इलाज ट्यूमर को बहुत तेजी और आसानी से खत्म करता है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि यह तकनीक कैंसर के इलाज को अधिक सुरक्षित, सटीक और कम तकलीफदेह बना सकती है। दवा केवल कैंसर कोशिकाओं को निशाना बनाती है, जिससे स्वस्थ ऊतकों और अंगों को होने वाले नुकसान तथा दुष्प्रभाव काफी कम हो सकते हैं। चूंकि इस नैनो-रोबोट को शरीर के बाहर से रोशनी के जरिए नियंत्रित किया जा सकता है, इसलिए इलाज के लिए जटिल सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती। सबसे खास बात यह है कि यह फ्यूल-फ्री नैनो-रोबोट है, जिसे चलाने के लिए किसी रासायनिक ईंधन की आवश्यकता नहीं होती। इससे इसकी जैव-संगतता और सुरक्षा बढ़ती है तथा भविष्य में इसे कैंसर के उपचार के लिए एक प्रभावी और सुरक्षित विकल्प के रूप में विकसित किए जाने की संभावना मजबूत होती है। ऐसे में अगर आगे के क्लिनिकल परीक्षण भी सफल रहते हैं, तो प्रकाश से नियंत्रित यह नैनो-रोबोट स्तन कैंसर के इलाज की तस्वीर बदल सकता है। यह तकनीक न सिर्फ ट्यूमर पर अधिक सटीक वार करेगी, बल्कि मरीजों को कीमोथेरेपी के कई दर्दनाक दुष्प्रभावों से भी राहत दिला सकती है। यानी भविष्य में कैंसर का इलाज सिर्फ प्रभावी ही नहीं, बल्कि पहले से कहीं अधिक सुरक्षित भी हो सकता है।

       (‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )

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