दयानिधि

पेरिस समझौते के दस साल बाद लैंसेट की रिपोर्ट ने चेताया: बढ़ती गर्मी, सूखा और बाढ़ से बिगड़ रही सेहत; स्वच्छ ऊर्जा में निवेश बढ़ा, लेकिन जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता अब भी भारी। जलवायु परिवर्तन अब केवल मौसम का संकट नहीं, बल्कि मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। द लैंसेट काउंटडाउन की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, पेरिस जलवायु समझौते के बाद के दशक (2016–2025) में जलवायु परिवर्तन से जुड़े कई स्वास्थ्य जोखिम पिछले दशक (2006–2015) की तुलना में तेजी से बढ़े हैं। रिपोर्ट में दुनिया के 30 से अधिक देशों के 100 से ज्यादा संस्थानों के 146 शोधकर्ताओं ने योगदान दिया है। इसमें स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन से जुड़े 54 संकेतकों का आकलन किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2016 से 2023 के बीच गर्मी से हर साल औसतन 5,40,800 मौतें जुड़ी रहीं। इनमें लगभग 68 प्रतिशत, यानी 3,69,900 मौतें, मानवजनित जलवायु परिवर्तन के कारण थीं। वर्ष 2023 में गर्मी से अनुमानित 7.10 लाख मौतें हुईं। इनमें 71.5 प्रतिशत मौतों के लिए जलवायु परिवर्तन जिम्मेदार था। आंकड़े बताते हैं कि बढ़ता तापमान अब जीवन के लिए सीधा खतरा बन गया है।

गर्मी ने छीने 1.07 लाख करोड़ डॉलर

गर्मी का असर केवल लोगों की सेहत तक सीमित नहीं है। इससे काम करने की क्षमता और अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हो रही है। रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में अत्यधिक गर्मी के कारण दुनिया को संभावित आय में करीब 1.07 लाख करोड़ डॉलर का नुकसान हुआ। यह वैश्विक आर्थिक उत्पादन का लगभग 0.91 प्रतिशत है। लगातार तीसरे साल यह नुकसान एक लाख करोड़ डॉलर से अधिक रहा। दक्षिण-पूर्व एशिया में यह नुकसान सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3.9 प्रतिशत और अफ्रीका में 3.2 प्रतिशत के बराबर रहा। खेती और निर्माण जैसे बाहरी श्रम वाले क्षेत्रों पर सबसे ज्यादा असर पड़ा। गर्मी में खेतों और निर्माण स्थलों पर काम करना कठिन होने के साथ श्रमिकों के स्वास्थ्य पर भी खतरा बढ़ जाता है। 

आधी से ज्यादा जमीन सूखे की चपेट में

रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में दुनिया की 51.8 प्रतिशत भूमि कम से कम एक महीने तक अत्यधिक सूखे से प्रभावित रही। यह 2023 के बाद रिकॉर्ड पर दूसरा सबसे खराब वर्ष था। 2016 के बाद सूखे से प्रभावित क्षेत्र का विस्तार पिछले दशक की तुलना में सात गुना से भी अधिक तेजी से हुआ। पानी की स्थिति भी चिंताजनक है। उपग्रह आंकड़ों के मुताबिक, 2003 के बाद दुनिया की 43 प्रतिशत भूमि में जल भंडारण घटा, जबकि 37 प्रतिशत भूमि में बढ़ा। यानी दुनिया के 80 प्रतिशत से अधिक भूभाग में पानी की स्थिति में बड़े बदलाव देखे गए। कहीं सूखे का संकट है, तो कहीं बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है। इसके अलावा, 2016–2025 के दौरान हर साल दुनिया की लगभग 17.2 प्रतिशत भूमि अत्यधिक वर्षा से प्रभावित हुई, जबकि पिछले दशक में यह आंकड़ा 14.8 प्रतिशत था। इससे बाढ़, भूस्खलन और दूषित पानी से फैलने वाली बीमारियों का जोखिम बढ़ता है।

स्वच्छ ऊर्जा से मिल रही राहत

रिपोर्ट में कुछ सकारात्मक संकेत भी हैं। वर्ष 2025 में स्वच्छ ऊर्जा में वैश्विक निवेश 7.2 प्रतिशत बढ़कर रिकॉर्ड 2.1 लाख करोड़ डॉलर पहुंच गया। यह जीवाश्म ईंधन में हुए 1.16 लाख करोड़ डॉलर के निवेश से 82 प्रतिशत अधिक था। नवीकरणीय बिजली की हिस्सेदारी 2016 के 5.5 प्रतिशत से बढ़कर 2023 में 13.5 प्रतिशत हो गई। कम जीवाश्म ईंधन प्रदूषण वाले कम से कम 77 देशों में स्वच्छ हवा के कारण हर साल अनुमानित 3,23,000 मौतों को रोकने में मदद मिली। इसके बावजूद, दुनिया की 80 प्रतिशत से अधिक ऊर्जा अब भी जीवाश्म ईंधन से आती है। वर्ष 2024 में जलवायु को गर्म करने वाले उत्सर्जन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए। जीवाश्म ईंधन से होने वाले वायु प्रदूषण के कारण दुनिया में हर साल अनुमानित 27.3 लाख मौतें होती हैं। 

स्वास्थ्य सेवाओं की तैयारी अभी अधूरी

रिपोर्ट के अनुसार, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के 194 सदस्य देशों में से केवल 56 के पास जलवायु परिवर्तन के अनुरूप स्वास्थ्य सेवाओं को तैयार करने की राष्ट्रीय योजना है। हालांकि 2015 में ऐसे देशों की संख्या महज 14 थी। यह सुधार का संकेत है, लेकिन जरूरत के मुकाबले तैयारी अभी सीमित है। जलवायु और स्वास्थ्य संबंधी शोध के लिए मिलने वाली राशि 2016 के 4.2 करोड़ डॉलर से बढ़कर 2024 में 31.6 करोड़ डॉलर हो गई। फिर भी, इस धन का 84 प्रतिशत दुनिया के सबसे अमीर देशों के शोधकर्ताओं तक पहुंचा, जबकि गरीब और कमजोर देशों में जलवायु जोखिम अधिक गंभीर हैं।

स्वास्थ्य को केंद्र में रखने की अपील

रिपोर्ट के लेखक जलवायु परिवर्तन को औपचारिक रूप से वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करने और जलवायु नीतियों में स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि उत्सर्जन में तेजी से और न्यायसंगत कटौती, स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश तथा कमजोर देशों को अनुदान के रूप में जलवायु वित्त उपलब्ध कराना जरूरी है। संदेश साफ है- स्वच्छ ऊर्जा और बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था से लोगों की जान बचाई जा सकती है, लेकिन इसके लिए कदमों की रफ्तार बढ़ानी होगी। जलवायु परिवर्तन के खिलाफ कार्रवाई में देरी का मतलब है अधिक बीमारियां, अधिक मौतें और अर्थव्यवस्था पर बढ़ता बोझ।

       (‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )
Spread the information