प्रदीप

‘‘वैसे रामन एक महान वैज्ञानिक थे, लेकिन वे बहुत संकीर्ण विचारों वाले थे. सिर्फ मेरे एक महिला होने के नाते उन्होंने जिस तरह से मेरे साथ बर्ताव किया, उसे मैं कभी नहीं भूल सकती. अगर एक नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक का ऐसा रवैया था तो फिर और लोगों से क्या ही उम्मीद की जा सकती थी?’’

तमाम अन्य क्षेत्रों की तरह विज्ञान के क्षेत्र में भी एक लंबे अर्से से भारत समेत पूरी दुनिया में महिलाओं के साथ भेदभाव होता रहा है. हालांकि न्याय और लैंगिक समानता को लेकर आई सामाजिक जागरूकता के कारण पहले की बनिस्पत स्थिति में थोड़ा सुधार जरूर हुआ है. इसलिए आज की स्थितियों में यह बात बिल्कुल भी तर्कसम्मत नहीं लगेगी कि कोई भारतीय इंस्टीट्यूट या शोध-संस्था किसी विद्यार्थी को प्रवेश (एडमिशन) देने से केवल इसलिए इंकार कर दे क्योंकि वह एक ‘लड़की’ है!

निश्चित रूप से आज विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों में कम-से-कम आधिकारिक स्तर पर इस तरह का लैंगिक भेदभाव नहीं किया जाता है, लेकिन यह बात उन दिनों की है जब स्थितियाँ आज से काफी अलग थीं. देश अंग्रेजों का गुलाम था और भारतीय परिवारों के दाकियानूसी, सामंती और पुरुषों के वर्चस्व वाले सामाजिक ढांचे की वजह से महिलाओं की स्थिति दयनीय बनी हुई थी. लेकिन इन विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भारतीय विज्ञान के फलक पर कई ऐसी महिलाएं आईं, जिन्होंने अपनी वैज्ञानिक प्रतिभा का लोहा पूरी दुनिया को मनवाया. इन्हीं वैज्ञानिकों में से एक वह लड़की थी, जिसे इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसेज (आईआईएससी) ने एक महिला होने के नाते दाखिला देने से मना कर दिया था. लेकिन उसने भी हार नहीं मानी और अपनी जिद पर अड़ी रही, जिससे स्त्री विरोधी मानसिकता रखने वाले आईआईएससी प्रशासन को झुकना पड़ा. आज उसी महान महिला वैज्ञानिक की पुण्यतिथि है. नाम है- कमला सोहोनी (भागवत).

कमला भागवत का जन्म 18 जून, 1911 को मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में एक उच्च शिक्षित परिवार में हुआ था. उनके पिता नारायणराव भागवत और उनके चाचा माधवराव भागवत दोनों ही रसायन विज्ञानी थे, जिन्होंने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसेज (वर्तमान आईआईएससी, बैंगलोर) में रसायन विज्ञान का अध्ययन किया था. नन्हीं कमला इन दोनों के रसायन विज्ञान के प्रति समर्पण और परिवार के अन्य सदस्यों से इनकी प्रशंसा सुनते हुए बड़ी हुई. इसलिए ऐसे विज्ञानमय माहौल में यह स्वाभाविक ही था कि कमला की दिलचस्पी विज्ञान के अध्ययन में पैदा हुई.

बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई में काफी होशियार कमला ने अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद बंबई विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध सेंट जेवियर्स कॉलेज में दाखिला लिया और अपनी मेधा का परिचय देते हुए भौतिकी और रसायन विज्ञान में सबसे ज्यादा नंबरों के साथ 1933 में बी.एस-सी. की डिग्री हासिल की. कमला और उनके परिवार दोनों की इच्छा थी कि वह विज्ञान के क्षेत्र में अपना कैरियर बनाएं. लिहाजा, पिता और चाचा के नक्शेकदम पर चलते हुए कमला ने मास्टर्स कोर्स (परास्नातक) के लिए प्रसिद्ध इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसेज (आईआईएससी) में रिसर्च फेलोशिप के लिए आवेदन किया. उस दौर में आईआईएससी की क्या प्रतिष्ठा थी, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहाँ से शोध करने वाले किसी भी छात्र की रिसर्च थीसिस को किसी भी भारतीय विश्वविद्यालय में भेजने पर उस छात्र को डिग्री मिल सकती थी और इससे भी बड़ी बात यह थी कि इस शोध-संस्थान के निदेशक विज्ञान के क्षेत्र में एशिया के पहले नोबेल पुरस्कार विजेता विश्व विख्यात वैज्ञानिक सर चंद्रशेखर वेंकट रामन थे.

चूंकि कमला आईआईएससी में दाखिले के लिए निर्धारित सभी शर्तों पर खरी उतरती थीं इसलिए उन्हें और उनके पिता को पूरा विश्वास था कि उन्हें इस प्रतिष्ठित इंस्टीट्यूट में अध्ययन का मौका जरूर मिलेगा. लेकिन बी.एस-सी. में अव्वल स्थान प्राप्त करने के बावजूद कमला को आईआईएससी में दाखिला देने से मना कर दिया गया, क्योंकि वह एक महिला थीं. और मना करने वाले कोई और नहीं, इंस्टीट्यूट के तत्कालीन निदेशक चंद्रशेखर वेंकट रामन ही थे! लेकिन कमला अन्याय के आगे आसानी से हार मानने वालों में से नहीं थीं. कमला ने इसके विरोध में आईआईएससी निदेशक के दफ्तर के सामने ‘सत्याग्रह’ पर बैठ गईं.

 

धरने पर बैठने के बाद आखिरकार रामन को कमला के गांधी प्रेरित सत्याग्रह के आगे झुकना ही पड़ा. लेकिन पितृसत्तात्मक मानसिकता से ग्रसित रामन ने आईआईएससी में कमला को दाखिला देने के लिए तीन यातनापूर्ण और अपमानजनक शर्तें रखीं. ये शर्तें थीं- 1. कमला को एक साल तक प्रोबेशन पर रहकर शोध करना होगा, यानी उन्हें एक नियमित विद्यार्थी के रूप में दाखिला नहीं दिया जाएगा. एक साल तक उनकी प्रगति को देखने के बाद आईआईएससी में उनके भविष्य को लेकर निर्णय लिया जाएगा 2. उन्हें अपने मार्गदर्शक की देखरेख में देर रात तक काम करना होगा और 3. वह किसी भी तरह से प्रयोगशाला का माहौल खराब नहीं करेंगी, यानी उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी मौजूदगी से पुरुष छात्रों का ध्यान न भटके.

मरता क्या नहीं करता! इन सख्त और अपमानजनक शर्तों को मानने के अलावा 22 वर्षीय कमला के पास और कोई चारा नहीं था. लेकिन इन शर्तों के लिए कमला ताउम्र रामन को माफ नहीं कर पाईं. 1997 में भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (बार्क) में आयोजित एक समारोह में उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था- ‘‘वैसे रामन एक महान वैज्ञानिक थे, लेकिन वे बहुत संकीर्ण विचारों वाले थे. सिर्फ मेरे एक महिला होने के नाते उन्होंने जिस तरह से मेरे साथ बर्ताव किया, उसे मैं कभी नहीं भूल सकती. मेरे लिए यह गहरे अपमान की बात थी. उस समय महिलाओं के प्रति लोगों का रवैया बहुत खराब था. अगर एक नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक का ऐसा रवैया था तो फिर और लोगों से क्या ही उम्मीद की जा सकती थी?’’

खैर, रामन की अनमनी स्वीकृति के बाद कमला इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसेज में दाखिला लेने वाली पहली महिला शोधार्थी बन गईं. आईआईएससी में कमला ने अपने शिक्षक श्रीनिवासैय्या के मार्गदर्शन में दूध, दलहन और फलियों में पाए जाने वाले प्रोटीन और नॉन प्रोटीन पर गहन अध्ययन किया. शोध के प्रति उनके अथक समर्पण और परिश्रम से श्रीनिवासैय्या और रामन काफी प्रभावित हुए. एक साल बाद रामन ने कमला को एक नियमित छात्र के रूप में बायोकेमिस्ट्री में शोध करने की अनुमति दे दी. आखिरकार, कमला ने रामन को महिलाओं के बारे में अपनी राय बदलने के लिए मजबूर कर दिया, जिससे आईआईएससी के दरवाजे महिलाओं के लिए खुल गए.

कमला ने प्रोटीन पर किए अपने मौलिक शोध पर आधारित रिसर्च थीसिस को बंबई विश्वविद्यालय में प्रस्तुत कर 1936 में एम.एस-सी. की डिग्री प्राप्त की. इसके बाद, उन्होंने पीएचडी करने के लिए ब्रिटेन के प्रतिष्ठित कैंब्रिज यूनिर्विसटी से रिसर्च स्कॉलरशिप हासिल की. कैंब्रिज में उन्होंने प्रसिद्ध न्यूरोकेमिस्ट डॉ. डेरेक रिक्टर और डॉ. रॉबिन हिल के साथ आलू और अन्य पौधों के ऊतकों (टिश्यूज़) पर शोध-कार्य किया. अपने शोध के दौरान कमला ने पाया कि पौधों के ऊतक की हर कोशिका में ‘साइटोक्रोम सी’ नाम का एक खास एंजाइम मौजूद होता है, जो पौधों की कोशिकाओं को ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करता है. यह वनस्पति विज्ञान से जुड़ी एक मौलिक खोज थी. इसके अलावा कमला ने डॉ. रिक्टर के साथ ‘मोनोमाइन ऑक्सीडेज’ पर भी काम किया, जो एड्रेनालाईन, नॉरएड्रेनालाईन, सेरोटोनिन और हिस्टामाइन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर के चयापचय (मेटाबॉलिज्म) में शामिल एक प्रमुख एंजाइम है.

विश्व के महान वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में शोध करने का उनका सपना तब पूरा हुआ जब उन्हें दो स्कॉलरशिप्स मिलीं. पहली स्कॉलरशिप के तहत उन्हें नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. फ्रेडरिक जी. हॉपकिंस की प्रसिद्ध प्रयोगशाला में ऑक्सीकरण और अपचयन (रिडक्शन) पर शोध करने करने का मौका मिला. दूसरी स्कॉलरशिप अमेरिकन फेडरेशन ऑफ यूनिर्विसटी विमेन से प्राप्त ट्रैवलिंग फैलोशिप थी जिसके तहत कमला को यूरोप की यात्रा कर वहाँ के प्रसिद्ध वैज्ञानिकों से मिलने का मौका मिला.

कैंब्रिज में बिताया समय कमला के पूरे वैज्ञानिक कैरियर का सबसे सुनहरा दौर था. वहां से उन्होंने प्रो. हॉपकिंस के मार्गदर्शन में यूनिवर्सिटी पहुंचने के 14 महीने से भी कम समय में उन्होंने अपनी पीएचडी डिग्री के लिए साइटोक्रोम सी की खोज का वर्णन करते हुए एक थीसिस प्रस्तुत की. उनकी यह थीसिस महज 40 पन्नों की थी, लेकिन उसकी गुणवत्ता ने रिव्यू कमेटी के सदस्यों को काफी प्रभावित किया और उन्होंने कमला की थीसिस को पीएचडी के लिए स्वीकार कर लिया. आज कमला को विज्ञान में डॉक्टरेट प्राप्त करने वाली पहली भारतीय महिला के रूप में जाना जाता है. हालांकि सही तथ्य यह है कि कमला से काफी पहले वनस्पतिशास्त्री जानकी अम्माल ने 1931 में यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन से डीएससी (पीएचडी के बराबर) की उपाधि प्राप्त कर ली थी.

पीएचडी की डिग्री हासिल करने के बाद, कैंब्रिज में अच्छे और सहयोगी स्वभाव के शिक्षक व सहकर्मी मिलने और शोध के लिए उपयुक्त माहौल मिलने के बावजूद कमला अपने देश की सेवा करने के लिए 1939 में भारत लौट आईं. उन्होंने लेडी हार्डिंग कॉलेज, नई दिल्ली में बायोकेमिस्ट्री डिपार्टमेंट के प्रमुख के रूप में काम शुरू किया, लेकिन वहाँ कार्यरत उनके ज़्यादातर पुरुष सहकर्मी एक महिला को अपने विभाग के प्रमुख के रूप में नहीं स्वीकार कर पा रहे थे. लैंगिक भेदभाव से परेशान होकर कमला ने लेडी हार्डिंग कॉलेज से इस्तीफा दे दिया.

इसके बाद उन्होंने न्यूट्रिशन रिसर्च इंस्टीट्यूट, कुन्नूर में सहायक निदेशक के रूप में काम करते हुए विटामिनों के प्रभाव पर शोध किया और अनेक जर्नलों में अपने शोधपत्र भी छपवाए. लेकिन अपने कैरियर में आगे बढ़ने के लिए स्पष्ट अवसरों की कमी को देखते हुए उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. इसी दौरान कमला ने पेशे से एक्चुअरी (बीमा व्यवसायी) माधव वी. सोहोनी से शादी कर ली और 1947 में बंबई (वर्तमान मुंबई) आ गईं.

बंबई में कमला ने रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (वर्तमान इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस) में बतौर प्रोफेसर दलहन और फलियों के पोषण संबंधी पहलुओं और धान के आटे पर भी महत्वपूर्ण काम किया. उन्होंने कुपोषित और गरीब वर्ग के लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए अभूतपूर्व शोधकार्य किए. भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के सुझाव पर कमला ने ‘नीरा’ पर शोध शुरू किया. नीरा ताड़ और खजूर के पेड़ से मिलने वाला एक मीठा और पौष्टिक पेय पदार्थ होता है. कमला ने अपने शोध से यह पता लगाया कि नीरा में विटामिन ए, विटामिन सी और आयरन की महत्वपूर्ण मात्रा पाई जाती है और इसको आहार में शामिल करके कुपोषण और अन्य बीमारियों से लड़ा जा सकता है. कमला के निर्देशन में जब शोधकर्ताओं की एक टीम द्वारा कुपोषित आदिवासी किशोरों और गर्भवती महिलाओं को नियमित रूप से नीरा का सेवन करवाया गया, तो उनकी सेहत में उल्लेखनीय सुधार दर्ज की गई. इस महत्वपूर्ण काम के लिए कमला को डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया.

माना जाता है कि वैज्ञानिक समुदाय में मौजूद लैंगिक पूर्वाग्रहों की वजह से रॉयल इंस्टीट्यूट के निदेशक पद पर उनकी अंतिम नियुक्ति में 4 साल की देरी हुई. आखिरकार जब निदेशक बन गईं, तब कैम्ब्रिज में उनके पहले मार्गदर्शक डॉ. डेरेक रिक्टर ने कहा कि, ‘इतनी बड़ी वैज्ञानिक संस्था की पहली महिला निदेशक बनकर उसने इतिहास रच दिया है!’

वह बॉम्बे आरे मिल्क प्रोजेक्ट फैक्ट्री की सलाहकार भी बनीं और दूध को फटने से रोकने के लिए एक प्रोटोकॉल विकसित किया. कमला एक अच्छी विज्ञान लेखिका भी थीं, उन्होंने अपनी मातृभाषा मराठी में कई किताबें लिखीं. उनकी उल्लेखनीय कृतियों में से एक मराठी में लिखी गई किताब “आहार गाथा” है. इसके अलावा, वह भारत की कंज़्यूमर गाइडेंस सोसाइटी (सीजीएसआई) की संस्थापक सदस्य थीं. 1966 में नौ महिलाओं द्वारा स्थापित, सीजीएसआई भारत का सबसे पहला उपभोक्ता संरक्षण संगठन था. इस तरह उन्होंने एक वैज्ञानिक की सीमाओं से कहीं ज्यादा आगे बढ़कर अपने देश के लोगों की जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने का प्रयास किया.

एक भरपूर जिंदगी जीने के बाद 28 जून, 1998 को 87 साल की उम्र में कमला सोहोनी का निधन हो गया. आज भले ही कमला हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन एक महिला वैज्ञानिक के रूप में लैंगिक भेदभाव के खिलाफ उनके द्वारा लड़ी गई लड़ाई उन हजारों महिलाओं के लिए प्रेरणा का एक स्रोत है, जो अपनी प्रतिभा और मेहनत के दम पर पुरुषों के वर्चस्व वाली विज्ञान की दुनिया में अपनी जगह बनाना चाहती हैं. अस्तु!

   (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)

     ( प्रदीप प्रमुख विज्ञान लेखक, विज्ञान संचारक एवं तकनीक विशेषज्ञ हैं )

      (‘न्यूज़ 18 हिंदी’ के साभार)

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