ललित मौर्या
वैज्ञानिकों ने रक्त में ऐसे नए जैव संकेतक खोजे हैं, जो प्रदूषित हवा के संपर्क में आने के बाद शरीर की कोशिकाओं में होने वाले नुकसान का शुरुआती संकेत दे सकते हैं। क्या आप जानते हैं कि जिस हवा में हम हर दिन सांस लेते हैं, वह केवल फेफड़ों को ही नुकसान नहीं पहुंचाती। इसका असर शरीर के उन हिस्सों तक भी पहुंच सकता है, जिनके बारे में आमतौर पर हम सोचते तक नहीं।एक नए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने वायु प्रदूषण और हृदय रोग के बीच एक ऐसी छिपी कड़ी का पता लगाया है, जो यह समझने में मदद कर सकती है कि प्रदूषित हवा आखिर दिल को कैसे नुकसान पहुंचाती है।यह अध्ययन यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, लॉस एंजिल्स से जुड़े शोधकर्ता द्वारा किया गया है। चूहों और इंसानों में किए अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने उनके रक्त में दो तरह के अणुओं की पहचान की है। इनमें लॉन्ग-चेन डाइकार्बोक्सिलेट एसिड (डीसीए) और मीडियम- से लॉन्ग-चेन एसाइल-कार्निटाइन (एसी) शामिल हैं। प्रदूषित हवा के संपर्क में आने के बाद दोनों अणुओं के स्तर में बढ़ोतरी देखी गई। शोधकर्ताओं के मुताबिक, ये अणु शरीर की कोशिकाओं में होने वाले तनाव और नुकसान के संकेत हो सकते हैं। खासकर ये संकेत देते हैं कि कोशिकाओं के भीतर मौजूद माइटोकॉन्ड्रिया, जिन्हें अक्सर कोशिकाओं का ‘पावरहाउस’ भी कहा जाता है, ठीक से काम नहीं कर रहे हैं।

जब कमजोर पड़ने लगे कोशिकाओं का ‘पावरहाउस’
बता दें कि हमारे शरीर को काम करने के लिए ऊर्जा चाहिए और इस ऊर्जा को बनाने में माइटोकॉन्ड्रिया की अहम भूमिका होती है। शरीर में मौजूद वसा को तोड़कर ऊर्जा बनाने का काम भी इन्हीं कोशिकीय संरचनाओं से जुड़ा है। लेकिन जब वायु प्रदूषण से माइटोकॉन्ड्रिया को नुकसान पहुंचता है, तो वे वसा को सामान्य तरीके से तोड़ नहीं पाते। इसका नतीजा यह होता है कि लॉन्ग-चेन डाइकार्बोक्सिलेट और मीडियम- से लॉन्ग-चेन एसाइल-कार्निटाइन जैसे अणु रक्त में जमा होने लगते हैं। इनका बढ़ा स्तर इस बात का संकेत हो सकता है कि शरीर की कोशिकाएं ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और वसा से जुड़ी क्षति से जूझ रही हैं। यह प्रक्रिया खासकर लिवर में कोशिकीय तनाव पैदा कर सकती है और आगे चलकर हृदय तथा अन्य अंगों से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ा सकती है। अध्ययन के निष्कर्ष प्रतिष्ठित जर्नल आर्टेरियोस्क्लेरोसिस, थ्रोम्बोसिस एंड वैस्कुलर बायोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं। गौरतलब है कि यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के पिछले अध्ययनों में भी वायु प्रदूषण और हृदय रोग के बीच संबंध सामने आया था। हालांकि, प्रदूषण शरीर में किस प्रक्रिया के जरिए हृदय को नुकसान पहुंचाता है, यह अब तक पूरी तरह स्पष्ट नहीं था। नए निष्कर्ष इस सवाल का एक महत्वपूर्ण जवाब देते हैं।

चूहों और इंसानों दोनों में दिखा एक जैसा बदलाव
शोधकर्ताओं ने दो पुराने अध्ययनों के दौरान लिए गए खून के नमूनों का दोबारा विश्लेषण किया। इनमें एक अध्ययन 2013 में चूहों पर और दूसरा 2019 में इंसानों पर किया गया था। इस दौरान चूहों को दो सप्ताह तक डीजल के धुएं के संपर्क में रखा गया। वहीं इंसानों से जुड़े अध्ययन में लॉस एंजिलिस के 26 स्वस्थ और धूम्रपान न करने वाले वयस्कों को शामिल किया गया था। ये लोग 2014 और 2015 की गर्मियों में बीजिंग गए थे और करीब 10 सप्ताह तक उनकी निगरानी की गई। वैज्ञानिकों ने इन लोगों और चूहों के खून में मौजूद अलग-अलग अणुओं यानी मेटाबोलाइट्स का विश्लेषण किया। उन्होंने यह देखा कि प्रदूषित हवा के संपर्क में आने के बाद किन अणुओं का स्तर बढ़ा और किनका घटा। इस विश्लेषण में एक महत्वपूर्ण समानता सामने आई। चूहों और इंसानों दोनों में वायु प्रदूषण के संपर्क के बाद लंबे-श्रृंखला वाले डीसीए और मध्यम से लंबे-श्रृंखला वाले एसी अणुओं का स्तर बढ़ गया। शोधकर्ताओं के मुताबिक, इससे संकेत मिलता है कि प्रदूषण के कारण शरीर में वसा से ऊर्जा बनाने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है और माइटोकॉन्ड्रिया की कार्यक्षमता में गड़बड़ी आ सकती है।

बीमारी से पहले मिल सकते हैं खतरे के संकेत
इस खोज का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ये जैव संकेतक बीमारी के गंभीर रूप लेने से पहले खतरे का संकेत दे सकते हैं। वायु प्रदूषण पूरी दुनिया में स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी चुनौती है। लेकिन प्रदूषित हवा के संपर्क में आने वाले हर व्यक्ति में एक जैसी बीमारी विकसित नहीं होती। कुछ लोगों पर इसका असर अपेक्षाकृत कम होता है, जबकि कुछ में समय के साथ हृदय रोग, मधुमेह, खून में वसा का असंतुलन, फैटी लिवर या यहां तक कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां विकसित हो सकती हैं। अभी ऐसी कोई आसान जैविक पहचान उपलब्ध नहीं है, जिससे यह पता लगाया जा सके कि प्रदूषण के संपर्क में आने के बाद किस व्यक्ति के शरीर पर इसका गंभीर असर पड़ने वाला है। ऐसे में ये नए जैव संकेतक इस दिशा में उम्मीद जगाते हैं। यदि खून में डीसीए और एसी का स्तर बढ़ा मिलता है, तो यह शरीर पर प्रदूषण के शुरुआती असर की चेतावनी दे सकता है, उस समय, जब हृदय या दूसरे अंगों की बीमारी अभी गंभीर रूप नहीं ले पाई हो। वैज्ञानिकों के मुताबिक इस तरह की शुरुआती पहचान भविष्य में डॉक्टरों को ज्यादा जोखिम वाले लोगों की पहचान करने और समय रहते उन्हें बचाव तथा उपचार की दिशा में कदम उठाने में मदद कर सकती है।

सिर्फ सांसों तक सीमित नहीं प्रदूषण का असर
अध्ययन के निष्कर्ष एक बार फिर याद दिलाते हैं कि वायु प्रदूषण की समस्या केवल खांसी, सांस फूलने या फेफड़ों की बीमारी तक सीमित नहीं है। प्रदूषित हवा शरीर के भीतर उन प्रक्रियाओं को भी प्रभावित कर सकती है, जो हमें स्वस्थ रखने के लिए लगातार काम करती हैं। यह सही है कि हर दिन प्रदूषित हवा में सांस लेने वाला व्यक्ति शायद तत्काल कोई बदलाव महसूस न करे। लेकिन कोशिकाओं के स्तर पर होने वाली यह खामोश नुकसान समय के साथ गंभीर बीमारी का रूप ले सकता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि नए जैव संकेतकों की मदद से भविष्य में प्रदूषण से होने वाले नुकसान को बीमारी सामने आने से पहले समझना संभव हो सकता है। इससे चिकित्सा जगत को केवल बीमारी का इलाज करने के बजाय स्वास्थ्य को होने वाली क्षति को उसके शुरुआती चरण में पहचानने और रोकने का एक नया रास्ता मिल सकता है। भारत में वायु प्रदूषण के बारे में ताजा जानकारी आप डाउन टू अर्थ के एयर क्वालिटी ट्रैकर से प्राप्त कर सकते हैं।
(‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )
