मुनेश त्यागी

प्रोफेसर यशपाल कमाल की शख्सियत थे। उन्होंने 24 जुलाई 2017 को अंतिम अंतिम सांस ली थी। वे हमारे सबके प्यारे और आशावादिता से भरपूर इंसान और वैज्ञानिक थे। जैसे वे सर्वज्ञानी हों। वे ज्ञान विज्ञान के सबसे बड़े समर्थक थे। वे सब के लिए विज्ञान की मुहिम के पक्षधर थे।


प्रोफेसर यशपाल सबको मुफ्त शिक्षा, सबको अनिवार्य और आधुनिकतम वैज्ञानिक शिक्षा के पैरोकार थे। वे यूजीसी के चेयरमैन, जेएनयू के वाइस चांसलर थे। उन्हें कई सरकारी साम्मानों से नवाजा गया। वे योजना आयोग के सदस्य रहे। वैज्ञानिक और योजना आयोग के चेयरमैन रहे। क्या कमाल का व्यक्तित्व था उनका। उन्होंने विज्ञान को राजनीति, अर्थशास्त्र और नैतिकता से जोड़ा। उन्हें पदम भूषण, यूनेस्को के कलिंग सम्मान, मारकोनी इंटरनेशनल फैलोशिप, लाल बहादुर राष्ट्रीय पुरस्कार, इंदिरा गांधी पुरस्कार और पदम विभूषण जैसे अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था। उनकी विज्ञान, गणित, भौतिकी और भूगोल में अच्छी खासी रुचि थी। उन्होंने उन सब का गहन अध्ययन किया और बाद में उच्च शिक्षा के लिए भौतिकी को चुना और दुनिया के महान वैज्ञानिकों की कतार में जा बैठे।


उन्होंने साइंस को आम आदमी की भाषा में लाकर जैसे क्रांति ही कर दी हो। उन्होंने जनता में स्वाध्याय की भावना और रुचि पैदा की। वे पाठ को रटने के बजाय, समझने पर विशेष जोर देते थे और यहीं वे दूसरे वैज्ञानिकों से कोसों आगे थे। वे विज्ञान और तकनीक को जन जन तक ले गए।
“टर्निंग प्वाइंट” कार्यक्रम को दूरदर्शन पर ले गए। वे साइंस को जनता के बीच ले गए, सारे देश की जनता के सामने वहां प्रयोग किए, बच्चों और जनता से सवाल आमंत्रित किए और उनके जवाब जनता के सामने, जनता की भाषा में दिए और टीवी को “ईडियट बॉक्स” नहीं, “जनता का दोस्त” बना दिया था। टीवी के माध्यम से साइंस को जनता के बीच ले गए और विज्ञान को जनता के बीच लोकप्रिय बनाया था।


प्रोफेसर यशपाल अंधविश्वासों, धर्मांधता, अज्ञानतापूर्ण मान्यताओं और परिपार्टियों के जबरदस्त मुखालिफ थे। टर्निंग प्वाइंट कार्यक्रम में उन्होंने अंधविश्वासों की पोल खोल दी, जादू टोना-टोटकों का जमकर विरोध किया और जनता का आह्वान किया कि वे भी उनकी मुखालफत करें और अपने जीवन को ज्ञान विज्ञान की रोशनी से सराबोर करें और दुनिया के आधुनिकतम ज्ञानी विज्ञानी इंसान बनें।
टर्निंग प्वाइंट कार्यक्रम में प्रोफेसर यशपाल ने जो कमाल किया, वह था विज्ञान के गूढ़ विषयों को आम जन की भाषा में रोचक बनाकर पेश करना। इसी प्रोग्राम में, करोड़ों लोगों को, प्रोफेसर यशपाल के जरिए, इंद्रधनुष आकाशगंगा और सौर ऊर्जा के रहस्यों को जानने समझने में मदद मिली थी। वे शिक्षा को बिना बोझ महसूस किए पढ़ने और पढ़ाने के प्रवक्ता थे।


वे शिक्षा की मुनाफाखोरी के परम विरोधी थे। इसके खिलाफ उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की थी और उस कानून को रद्द करने की मांग की थी। तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश आरसी लाहोटी की तीन सदस्यीय पीठ ने उनकी याचिका की दलीलों में काफी दम पाया और कानून को खारिज कर दिया।
वे उदारवादी विचारों के प्रबल समर्थक और दावेदार थे। उनके विचार वैज्ञानिक संस्कृति, वैज्ञानिक सोच, अकादमिक स्वाधीनता और हिसाब किताब देयता यानी जिम्मेदारी से ओतप्रोत थे। उन्हें उच्च शिक्षा के पुनर्जीवन के लिए गठित समिति का चेयरमैन बनाया गया। अपनी रिपोर्ट में विश्वविद्यालय के बारे में उनका कहना था कि विश्वविद्यालय वह स्थान है जहां नए विचारों के बीज अंकुरित होते हैं, जड़े पकड़ते हैं और लंबे तगड़े बनते हैं। यह वह अनोखी जगह है जहां रचनात्मक दिमाग मिलते हैं, एक दूसरे से संवाद करते हैं और नई वास्तविकता के लिए भविष का रास्ता बनाते हैं। मगर अफसोस कि आज हमारे विश्वविद्यालयों का गला घोटा जा रहा है, उनमें से कई गुंडागर्दी, हिंसा, जातिवाद और सांप्रदायिकता के गड्ढों में तब्दील कर दिए गए हैं। ऐसे विपरीत समय में प्रोफेसर यशपाल के विचार हमारा सही मार्गदर्शन सकते हैं।


प्रोफेसर यशपाल की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि उन्होंने नौजवान पीढ़ी में नई समझ और ज्ञान का चस्का यानी वैज्ञानिक सोच और रुचि पैदा की। सभी विद्यार्थियों से सवाल आमंत्रित करने का आह्वान किया और कहा कि बच्चों को सवाल पूछने की बुनियादी आजादी होनी चाहिए। उनकी दृढ़ मान्यता थी कि जीवन के सभी क्षेत्रों में तार्किकता हो, विवेक पूर्णता हो, ज्ञान विज्ञान से परिपूर्ण हों और सारा जीवन ज्ञान विज्ञान से परिपूर्ण और शरशार हो।
पिछली सदी के अंतिम दशक में एक बार सुबह सुबह सूर्य ग्रहण पड़ा था। पूर्व कार्यक्रम के अनुसार जनता को इस सूर्य ग्रहण की जानकारी देने के लिए वे सुबह सुबह दूरदर्शन पर आ डटे और सूर्य ग्रहण के बारे में जानकारी देने लगे। उन्होंने यह जोर देकर बताया कि सूर्य ग्रहण में राहु केतु का कोई काम नहीं है। उन्होंने बताया कि अपनी आंखों से देखिए वे कहां है?


उन्होंने बताया कि जब चांद घूमते घूमते सूर्य और पृथ्वी के बीच में आ जाता है तो वह पृथ्वी के कुछ हिस्से पर सूर्य के प्रकाश को आने से रोक लेता है जिस कारण उस भाग पर अंधेरा छा जाता है, इस स्थिति को सूर्यग्रहण कहते हैं। यह कभी आंशिक हो सकता होता है तो कभी पूर्ण ग्रहण हो सकता है और सूर्य ग्रहण अमावस्या के दिन ही होता है। इसमें राहू केतु का कोई रोल नहीं है। राहु और केतु सब काल्पनिक गपोड है और अज्ञान के अलावा और कुछ भी नहीं है। हां इसे कुछ स्वार्थी और लालची लोगों का पेटभरू कारनामा जरूर कहा जा सकता है।
दूसरी दफा का वाकया है कि सारे भारत में गणेश की पत्थर की मूर्ति को दूध पिलाया जा रहा था और मंदिरों के सामने भक्त गणों की लंबी-लंबी लाइनें लग गई थी और हर कोई कहने लगा था कि पत्थर की गणेश की मूर्ति दूध पीने लगी है, तभी प्रोफेसर यशपाल टीवी पर आते हैं और गणेश की मूर्ति द्वारा दूध पीने की हरकतों का जोरदार विरोध करने लगते हैं और बताते हैं कि जब तक दूध से भरे गिलास या चम्मच को, गणेश की मूर्ति की गीली सतह से नहीं मिलाओगे, तब तक दूध नीचे जा ही नहीं सकता और इसे साइफन और सतह के दबाव का सिद्धांत बताया और सारी दुनिया को यह सब टीवी पर ही करके दिखाया दिया। इस प्रकार प्रोफेसर यशपाल ने इसके दैवीय उपक्रम होने की बात और प्रयासों की हवा ही निकाल दी थी।


प्रोफेसर यशपाल ने खासतौर से जोर दिया कि हमें बच्चों से खूब बातें करनी चाहिए, उन्हें सवाल पूछने देना चाहिए और उनके सवालों का जवाब जरूर ही देना चाहिए। हम सवाल पूछने की संस्कृति पैदा करें, बच्चों को सवाल पूछने से न रोकें, सवाल पूछना बच्चों का और मनुष्य का जन्मजात बुनियादी अधिकार होना चाहिए। उनका मानना था कि अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र, नैतिकता और विज्ञान का संगम होना चाहिए, तभी हमारा समाज और देश, सही मायनों में सही प्रगति कर पाएगा, वरना हम विकास की दौड़ में पिछड़ जाएंगे।
मगर जब हम आज अपने चारों ओर नजर डालते हैं तो पाते हैं कि यहां तो चारों और अंधविश्वास और पाखंड के पहाड़ उगा दिए गए हैं, मानव को श्रद्धेय नही, श्रध्दांध बना दिया गया है, उसे ज्ञान विज्ञान से कोसों दूर कर दिया गया है और यहां अंधविश्वासों और वैज्ञानिकता का घनघोर अंधेरा छा गया है और सारी की सारी व्यवस्था ही इसी जनविरोधी और ज्ञान विज्ञान विरोधी उपक्रम में लगी हुई है।


आज प्रोफेसर यशपाल को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके बताए रास्ते पर चलें, जो ज्ञान विज्ञान, तार्किकता और विवेक से परिपूर्ण हो। ज्ञान विज्ञान और तकनीक के संगम से ही हमारा देश और समाज इस अज्ञानता, अंधविश्वास, पाखंडों, धर्मांधता और अविवेकशीलता की वैतरणी को पार कर सकता है और तभी हम अपने संवैधानिक अधिकार और कर्तव्यों का अनुसरण और पालन कर सकते हैं और एक नई वैज्ञानिक संस्कृति और सोच वाले समाज का निर्माण कर सकते हैं, तभी हम एक विकसित देश, विकसित समाज और विकसित मनुष्य होने के अधिकारी कहला सकते हैं।


आज यह हम सब की सबसे बड़ी जिम्मेदारी बन गई है कि भारत के संविधानिक मूल्यों को और ज्ञान विज्ञान की संस्कृति को, आगे ले जाने के लिए प्रोफेसर यशपाल के मिशन को आगे बढ़ाएं, उनके जन्मदिन और पुण्यतिथि पर और विज्ञान दिवस पर विज्ञान को आगे बढ़ाने वाले और धर्मांधता अंधविश्वास और पाखंड का विनाश करने के कार्यक्रम आयोजित करें। प्रोफेसर यशपाल को हमारी यही असली श्रद्धांजलि होगी। नंदन वंदन और अभिनंदन प्रोफेसर यशपाल।

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