साल 1934.सिटी कालेज आफ न्यूयार्क. इसी कालेज का एक लड़का. वह पढ़ने में तेज था. वह वकालत करना चाहता था. परन्तु उसकी मां उसे एक डाक्टर बनाना चाहती थी. मां और बेटे में बहस लंबी चली. वह लड़का हार गया और मां अपनी बात मनवाने में सफल हो जाती हैं.अन्तत: वह लड़का मेडिसीन की पढ़ाई करता है. परन्तु वह लड़का दुनिया में कुछ करना चाहता था. अच्छे अंको से पास करने के बावजूद भी वह डाक्टर बनने के विकल्प के छोड़ देता है.वह अस्पताल में एक एक मरीज को देखने के वजाय वह एक दुनिया में सारे मरीजों का इलाज कर सके. यह उम्र था जिसमें वह सपना देख सकता था और साहस कर सकता है.ऐसे साहस और जोखिम से भरे कदमों से नये विचार आते हैं और खोजें होती हैं. ठीक ही कहा गया है,” सपनों, कल्पनाओं और इन सपनों को वास्तविकता में बदलने की चाहत रखने वालों के साहस-दिलेरी में ही आशा की किरण है.”(There is hope in dreams, imagination, and in the courage of those who wish to make those dreams a reality.) वास्तव में उसी लड़का ने आगे चलकर 26 मार्च1953 को एक रेडियो प्रसारण में घोषणा की कि उन्होंने पोलिमियेलिटीस विषाणु के लिए एक वेक्सिन की खोज कर ली .यह वही विषाणु है जो अपाहिज बनाने वाली पोलियो रोग उत्पन्न करती है. इस प्रकार उसने एक भयंकर बीमारी से इंसानियत को निजात दिलाने के काम में एक महती भूमिका निभाने वाला एक रूसी यहूदी अप्रवासी की संतान जोनास साल्क था. इतना ही नहीं अपाहिज बना देने वाली इस बीमारी की वेक्सिन पर पत्रकार ने पूछा ,” इस वेक्सीन के पेटेन्ट का नाम क्या है.” इसपर उन्होंने जबाब दिया, “मेरा जवाब है जनता के पास. इसका कोई पेटेंट नहीं है, क्या कोई सूरज को भी पेटेंट करवा सकता है?”
बीसवीं शताब्दी में पूरी दुनिया दो युद्धों में मौतों को देख चुका था. अकेले द्वितीय विश्वयुद्ध में पांच करोड़ आदनी मर चुका था. पूरी दुनिया अणु बम से होने वाली तबाही को देख
चुका था. लेकिन पूरा अमेरिका सहित विश्व जिस विश्व युद्ध से हार रहा था वह युद्ध था पोलियो के खिलाफ लड़ाई. पोलियो या पोलियोमेलाइटिस, एक अपंग यानी विकलांग करने वाली घातक बीमारी है. यह जिस वायरस के कारण होती है वह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में संक्रमित होता. यह व्यक्ति के मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी पर हमला कर सकता है, जिससे पक्षाघात होने की आशंका होती है. पक्षाघात की स्थिति में व्यक्ति हाथ, पैर या अन्य किसी अंग से विकलांग हो सकता है.
इस पोलियो के आतंक से पूरी मानवता आतंकित थी. 20 वीं सदी के पूर्व उतरार्द्ध में गर्मी का मौसम बच्चों के लिये एक कहर बन के आता था. यह मौसम पोलियो के मौसम क् रूप में जाना जाता था. यह मौसम बच्चों में इस बीमारी के लिये अनुकूल था जिसे Infant Paralysis कहा जाता था. यह रोग हमारे केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र(central nervous system)को प्रभावित करता है. बच्चें में इस वायरस का असर हल्का रहता था क्योंकि बच्चों के अन्दर इस रोग से लड़ने के लिए उनके शरीर में मातृ रोग प्रतिकारक (Maternal antibody) अधिक होती है. लेकिन जब जवान या बूढ़ों पर इस जीवाणु का हमला होता है उनमें मातृ ऐंटी बोडी कम होने के कारण इस रोग का असर ज्यादा घातक होता था. बड़ों में बच्चों की अपेक्षा कम प्रतिरक्षा क्षमता (Immunity) होती है. अमेरिका के राष्ट्रपति फ्रेंकलिन रूसवेल्ट पर 1921में 39साल की अवस्था में पोलियो का हमला हुआ था. इस बीमारी से लड़ने के लिए टीका विकसित करने के लिए एक संस्थान की स्थापना में उन्होंने प्रमुख भूमिका अदा की.
साल 1950 के शुरूआती दौर में हरेक साल करीब करीब 25000से 50000 नए लोगों पर इस रोग का हमला होता था. 1952में अकेले अमेरिका में लगभग 58000 लोग संक्रमित हुए और करीब 3000लोग अपनी जान गवाएँ. मानवता के सामने बहुत बड़ी चुनौति थी. पोलियो को युद्ध के बाद के दौर का सबसे भयावह स्वास्थ्य समस्या माना जाता था. अभी तक इसके लिए कोई दवा दवा नहीं आयी. डा०जोनास साल्क इस चुनौति को स्वीकार की और इसके लिए वेक्सीन की खोज की. एक तरह से वह मानवता के लिए एक मशीहा बनकर सामने आए. उस वक्त साल्क राष्ट्रीय हीरो बनकर उभरे जिन्होंने मानव के अंदर इस वेक्सीन के द्वारा इस रोग का भय को खत्म करने में कामयाब हुए. उनका वेक्सिन जो ‘मृत(Killed)’ पोलियो वाइरस(inactivated poliovirus vaccine (IPV)या Salk vaccine)से बना था किसी भी व्यक्ति को दिये जाने पर बिना इसे संक्रमित किए उस आदमी में इस रोग के खिलाफ शरीर में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जायेगी. इसे इंजेक्सन के द्वारा दिया जाता था. उस दौर के प्रचलित वैज्ञानिक धारणाओं के विपरित था. हालांकि अलवर्ट सेविन ने भी 1960में जिस वेक्सीन को तैयार किया वह बुंद बुंद के मुख से दिया जाता है. इसलिए इसे oral poliovirus vaccine (OPV) यी सेबिन वेक्सीन के नाम से जानते है.
साल्क पहले इसका प्रयोग बंदर पर किया. वह सफल रहा. फिर इसके बाद वह इस वेक्सीन का उपयोग अपने volunteers पर, खुद पर,अपनी पत्नी तथा अपने बच्चों पर किया. उन्होंने पाया कि सबों में पोलियो विरोधी ऐंटिबाडी उत्पन्न हुआ और इस वेक्सीन का सकारात्मक प्रभाव पड़ा. इसके बाद करीब दस लाख बच्चों को यह वेक्सीन दिया गया. 12 अप्रैल1955 को इसका परिणाम घोषित किया गया. यह वेक्सीन सुकक्षित और प्रभावशाली था. इस वेक्सीन का प्रभाव था कि 1962 आते आते यह संख्या औसतन घटकर 962 हो गयी. सेबिन सबों को अनिवार्य वेक्सीकरण पर बल दिये और कहा कि जन स्वास्थय के प्रति एक नैतिक जिम्म्वारी होनी चाहिए. 1960में उन्होंने the Salk Institute for Biological Studies की स्थापना की. अपने अंतिम समय में उन्होंने एच आई वी(HIV)की वेक्सिन खोज में जीवन व्यतीत की.
1966में न्यूयार्क टाइम्स ने उन्हे जैव दर्शन का पिता (Father of biophilosphy) के रूप में संबोधित किया.
पूरी मानवता के सामने जो अंधकार था उसके बारे सोचकर शरीर कांप जाती है. लेकिन विज्ञान ने मनुष्य को अंधकार से निकलने का रास्ता सुझाया और पूरे दुनिया में मानवतावादी औऎर कलाकारों ने वैज्ञानिकों से मिलकर जो अभियान चलाया तभी कहीं जाकर इस पर विजय पाया जा सका. इसलिये इस पूरे अभियान के जैवदर्शन कहा गया. जैव दर्शन के बारे में उन्होंने अपनी लिखी दो किताबें क्रमशMan Unfolding(1972) औरSurvival of the wisest (1973) मे विस्तारपूर्वक वर्णन किया है. इसके अलावा उन्होंने दो किताबें क्रमश:World Population and Human Values: A New Reality (1981)और Anatomy of Reality: Merging of Intuition and Reason (1983) लिखी.
जोनास साल्क इस वेक्सीन का पेटेन्ट नहीं कराकर मानवता पर जो उपकार किया है उसी के बदौलत दुनिया पोलियो से मुक्त हो पायी है. आज मानवता एक नयी बीमारी कोभिड- 19 से लड़ रही है .पूरी दुनिया में लाखों आदमी मर चुके हैं. दुनियाभर के पूंजीपति इसके वेक्सीन को तैयार करने में पूंजी लगाये हैं ताकि बेचकर मुनाफा कमा सके. इसके लिये
पेटेन्ट करा रहे हैं. भारत में एक बात और हुई कि कोरोना के आड़ में अंधविश्वास भी जमकर फैलाया गया जबकि इससे मुक्ति का उपाय विज्ञान और वैज्ञानिक उपाय में है. ऐसे वक्त में जोनास साल्क की कही बात याद की जानी चाहिए:
“ज़िन्दा वायरस का मुकाबला मुर्दा अंधविश्वास नहीं कर सकता.उसके लिए विज्ञान की ताकत चाहिए होती है.”
28 अक्तूबर, 1914 को अमेरिका की न्यूयॉर्क सिटी में जन्मे डॉ. जोनास साक 23 जून, 1995 को 80 वर्ष की उम्र में अन्तिम सांस लिये.
सुनील सिंह के फेसबुक वॉल से साभार
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One thought on “एक जनवैज्ञानिक जिसने अपने ज्ञान को पेटेन्ट करने से इनकार कर दिया”
  1. नाम बदल कर अच्छा किया। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भ्रम होता था। यह नाम अच्छा है। सामग्री अच्छी प्रस्तुत कर रहे हैं। शुभकामनाएं।

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