जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) ने 2013 के बाद जारी अपनी रिपोर्ट में 14 हजार वैज्ञानिक पेपरों से इनपुट लिए है और इसे अपनी सबसे बड़ी रिपोर्ट बताया है। आईपीसीसी के कार्यकारी समूह-1 ने भौतिक विज्ञान के आधार पर किए गए छठे मूल्यांकन में जलवायु में आए बदलावों को बेहद डरावना बताया। इसमें कहा गया है कि ग्लोबल वार्मिंग कैसे हमारे आज और भविष्य पर नकारात्मक प्रभाव डालने वाली है।   

सोमवार को जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि बढ़ते तापमान से दुनिया भर में मौसम से जुड़ी भयंकर आपदाएं आएंगी. दुनिया पहले ही, बर्फ की चादरों के पिघलने, समुद्र के बढ़ते स्तर और बढ़ते अम्लीकरण में अपरिवर्तनीय बदलाव झेल रही है.पैनल का नेतृत्व कर रहीं वैलेरी मैसन-डेलोमोट ने कहा कि कुछ बदलाव सौ या हजारों वर्षों तक जारी रहेंगे, उन्हें केवल उत्सर्जन में कमी से ही धीमा किया जा सकता है.रिपोर्ट में कहा गया है कि वायुमंडल को गर्म करने वाली गैसों का उत्सर्जन जिस तरह से जारी है, उसकी वजह से सिर्फ दो दशकों में ही तापमान की सीमाएं टूट चुकी हैं.

संयुक्त राष्ट्र के इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) की 42 पन्नों की इस रिपोर्ट को नीति-निर्माताओं के लिए सारांश के रूप में जाना जाता है.ये रिपोर्ट, आने वाले महीनों में सिलसिलेवार आने वाली कई रिपोर्ट्स की पहली कड़ी है जो ग्लासगो में होने वाले जलवायु सम्मेलन (COP26) के लिए बड़े मायने रखेगी. साल 2013 के बाद अपनी तरह की ये पहली रिपोर्ट है जिसमें जलवायु परिवर्तन से जुड़े विज्ञान का व्यापक तौर पर विश्लेषण किया गया है.

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटरेश का कहना है कि ‘आईपीसीसी वर्किंग ग्रुप की पहली रिपोर्ट मानवता के लिए ख़तरे का संकेत है.’संयुक्त राष्ट्र महासचिव का कहना है कि मिल-जुलकर जलवायु त्रासदी को टाला जा सकता है, लेकिन ये रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि इसमें देरी की गुंजाइश नहीं है और अब कोई बहाना बनाने से भी काम नहीं चलेगा.संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने विभिन्न देशों के नेताओं और तमाम पक्षकारों से आगामी जलवायु सम्मेलन (COP26) को सफल बनाने की अपील की है.

इस रिपोर्ट की दस प्रमुख बातें :

1. अगले 20 बरस में वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर जाएगा। पिछला दशक बीते 1.25 लाख वर्षों के मुकाबले काफी गर्म था, जो 1850 से लेकर  1900 के बीच के मुकाबले 2011  से 2020 के दौरान 1.09 डिग्री तापमान अधिक दर्ज किया गया। 

2. यदि वर्तमान की तरह ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन जारी रहा तो 21 वीं सदी के मध्य में ही वैश्विक तापमान 2 डिग्री सेल्सियस सीमा को पार कर जाएगा

3. तापमान में प्रत्येक 1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि भारी से भारी बारिश की घटनाओं की तीव्रता को 7 फीसदी बढ़ा देगी

4. कार्बन डाइऑक्साइड की सांद्रता (कान्सन्ट्रेशन) 20 लाख वर्षों में सबसे अधिक है

5. समुद्री जलस्तर में वृद्धि 3,000 वर्षों में सबसे तेज है

6. आर्कटिक समुद्री बर्फ 1,000 वर्षों में सबसे कम है

7. कुछ बदलावों को हम और भी पलट सकते हैं, कम से कम आने वाले हजारों वर्षों तक

8. अगर हम अपने ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन को नियंत्रित कर भी दें, तब भी अगले 1,000 वर्षों तक बर्फ का पिघलना जारी रहेगा

9. महासागरों का गर्म होना जारी रहेगा, यह 1970 के दशक से 2 से 8 गुना बढ़ गया है

10. समुद्र के स्तर में वृद्धि सैकड़ों वर्षों तक जारी रहेगी

क्यों महत्वपूर्ण है रिपोर्ट ?

  • पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारों के लिए उत्सर्जन कटौती को लेकर यह रिपोर्ट ‘एक बड़े स्तर पर चेताने वाली’ है.
  • जलवायु परिवर्तन के विज्ञान पर IPCC ने पिछली बार 2013 में अध्ययन किया था और वैज्ञानिकों का मानना है कि उन्होंने उसके बाद से बहुत कुछ सीखा है.
  • बीते सालों में दुनिया ने रिकॉर्ड तोड़ तापमान, जंगलों में आग लगना और विनाशकारी बाढ़ की घटना देखी है.
  • पैनल के कुछ दस्तावेज़ बताते हैं कि इंसानों के कारण हुए बदलावों ने असावधानीपूर्ण तरीक़े से पर्यावरण को ऐसा बना दिया है जो कि हज़ारों सालों में भी वापस बदला नहीं जा सकता है.
  • IPCC की इस रिपोर्ट का इस्तेमाल नवंबर में ब्रिटेन (ग्लासगो) में होने वाले संयुक्त राष्ट्र के COP26 (क्लाइमेट चेंज कॉन्फ़्रेंस ऑफ़ द पार्टीज़) सम्मेलन में भी होगा.

रिपोर्ट से उम्मीदें

कई पर्यवेक्षकों के अनुसार, बीते कुछ सालों में विज्ञान में बहुत महत्वपूर्ण सुधार हुए हैं.IPCC की बैठकों में शामिल रहे WWF के डॉक्टर स्टीफ़न कॉर्निलियस कहते हैं, “हमारे मॉडल बेहतर हो गए हैं, हमें भौतिकी, रसायन और जीव विज्ञान की बेहतर समझ है, तो वे अब भविष्य के तापमान परिवर्तन का आकलन करने में सक्षम हैं और बीते कई सालों की तुलना में वे और बेहतर हुए हैं.”“दूसरा परिवर्तन, बीते कुछ सालों में किसी विज्ञान का समर्थन करने वाले कारकों में वृद्धि हुई है. हम अब जलवायु परिवर्तन और बड़ी मौसमी घटनाओं के बीच में संबंध बता सकते हैं.” 2013 में प्रकाशित हुई.

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