अरविंद अंजुम 

मनुष्य की अदभुत कल्पना है-स्वर्ग। वास्तव में यह महज कल्पना नहीं, बल्कि ख्वाहिशें हैं, जिनकी स्वर्ग के ठिकाने के रूप में कल्पना की गयी है। 21वीं शताब्दी से पहले तक यह कोई सोच भी नहीं सकता था कि मनुष्य स्वर्ग में कल्पित उपलब्ध सारी सुविधाओं को एक दिन हासिल करने की दिशा में अग्रसर हो जायेगा।

स्वर्ग के बारे में सबसे बुनियादी कल्पना व ख्वाहिश है कि मनुष्य मरण से मुक्त होकर अमरत्व प्राप्त कर ले। इसीलिए स्वर्ग में जाने के बाद कोई मरता नहीं है। मनुष्य मरना नहीं चाहता है। पृथ्वी का सबसे बड़ा भय है – मृत्यु। मनुष्य मृत्यु से मुक्त होना चाहता है। इसी बिना पर कई प्रकार के विचार व दर्शन भी विकसित हुए। तसल्ली के लिए “आत्मा के अमरत्व’ का सिद्धांत आया, पुनर्जन्म की, निर्वाण की कथाएं प्रकट हुई, क्योंकि मनुष्य इस महान भय के नीचे जी नहीं सकता था और जीने के लिए किसी ठोस तसल्‍ली व सहारे की जरूरत थी। ‘स्वर्ग’ इसी मांग की पूर्ति करता है।

बहरहाल, निष्कर्ष यह है कि मनुष्य का अमरत्व हासिल करना ही चरम अभीष्ट है और अगर मनुष्य अमर हो तो फिर वह देवत्व की पदवी प्राप्त कर लेता है।

धर्म व दर्शन ने अपने तरीके से मनुष्य को देवत्व प्रदान करने का आध्यात्मिक प्रयास कर लिया है और अपने स्तर पर संतुष्ट करने की कवायद की सीमा भी तय कर दी है। पर मनुष्य उन प्रयासों से संतुष्ट नहीं हुआ है। अत: अब यह बीड़ा चिकित्सा शास्त्र व विज्ञान ने उठा लिया है कि मनुष्य कभी मरे ही नहीं। इस आश्चर्यजनक चाहत व कल्पना की दिशा में विज्ञान अग्रसर भी है। इन्हीं वैज्ञानिक उद्यमों का परिणाम है कि 19वीं सदी में मनुष्य की औसत आयु 40 वर्ष थी, जो 20 वीं सदी में बढ़कर 70 वर्ष की हो गयी और विज्ञान की ऐसी ही कोशिशें जारी रही तो 21वीं सदी के अंत तक यह आयु 150 वर्ष की हो जायेगी। फिर अगली शताब्दी में अमरत्व प्राप्त कर लिया जा सकता है।

क्या यह आयुवर्धन और अमरत्व की बातें भी स्वर्ग की तरह कल्पना ही हैं या इसका कोई आधार भी है। इन बातों पर विचार करने के पहले एक खबर को जान लिया जाना बेहतर है।

न्यूयॉर्क टाइम्स के सर्वाधिक पढ़े जाने वाले लेखक व उद्यमी हैं-डेव एस्प्रे। उनका लक्ष्य व दावा है कि वे 180 साल तक जिन्दा रहेंगे। फिलहाल वे 47 वर्ष के हैं और इस लक्ष्य के अनुसार वे 2153 तक जीवित रहेंगे। यह दावा किसी तपस्या या किंवदंतियों का मोहताज नहीं है। इसके लिए चिकित्सा शास्त्र के आधुनिक आविष्कारों का प्रयोग किया गया है। डेव के शरीर के बोनमैरो से स्टेम सेल निकालकर उसे फिर से उनके शरीर में प्रत्यारोपित किया गया। इससे शरीर की बायोलॉजिकल्र घड़ी (क्ल्रॉक) उल्टा घूमने लगेगी। इस तकनीक को बायोहैकिंग कहा जाता है। डेव का दावा है कि भविष्य में यह तकनीक आम हो जायेगी और भविष्य में मोबाइल फोन की तरह प्रचलन में आ जायेगी। अपने दीर्घ जीवन के लिए वे कोल्ड क्रायोथेरेपी चैंबर और खास आहार पद्धति का तरीका भी अपना रहे हैं। डेव का मानना है कि यदि 40 वर्ष से कम उम्र वाले इस तरीके को अपना लें तो 100 साल तक वे खुश और खासे क्रियाशील बने रह सकते हैं।

डेव ने अपने भोजन व नींद को नियंत्रित एवं संयोजित कर लिया है। वे कहते हैं कि इन सब तरीकों को अपनाकर और बुढ़ापा रोकने वाले अन्य उपचार करके उन्होंने खुद को इस तरह बना लिया है कि शरीर में कम से कम ज्वलन (इन्फ्लेमेशन) हो। उन्होंने बताया कि जब हम युवा होते हैं, तो शरीर में करोड़ों सेल होते हैं। उम्र बढ़ने लगती है तो ये नष्ट होने लगते हैं। इसलिए वे इंटरीमटेंट अर्थात्‌ अंतराल में भोजन अपनाते हैं। इससे शरीर जब भोजन नहीं पचा रहा होता है तो खुद की मरम्मत करता है। कोल्ड कायोथेरेपी शरीर के क्षतिग्रत उतकों का कम तापमान में उपचार करने की पद्धति है। (7 फरवरी, दैनिक भास्कर)। डेव एस्प्रे ने अपने दीर्घायु जीवन के लिए अपनायी गयी विभिन्‍न पद्धतियों पर 7.4 करोड़ रुपये खर्च किये हैं। स्वाभाविक है कि दीर्घायु या अमरत्व शायद आम नहीं होकर खास हो। वैसे भी धर्म-दर्शन व अध्यात्म भी सबके स्वर्ग व निर्माण का रास्ता कहां खोजता है? इस तरह विज्ञान व अध्यात्म कम से कम इस मामले में समान भूमिका में आ गया है।

चिकित्सा शास्त्र व विज्ञान मनुष्य की आदिम इच्छा को पूरा करने को उद्धत है, भल्ले ही हवा, सूर्य की रोशनी, खेती, अनाज की तरह आयु अर्जन व अमरत्व भी एक व्यापारिक सुविधा बन जाये। जिनके पास धन होगा, वे शताब्दी के बाद किसी भालू पार्क में टहलते हुए नजर आयेंगे तो कोई एक-दूसरे से कहेगा – “देखो, इस व्यक्ति की उम्र 232 वर्ष है।। ‘ आप सोचें कि जब कोई 200 या 300 वर्ष तक जियेगा तो फिर उसका सामाजिक व मनोवैज्ञानिक परिणाम क्या होगा? और ऐसा भी है कि मनुष्य मरेगा ही नहीं। किसी के मारने पर या दुर्घटना में तो मर सकता है, लेकिन स्वाभाविक मृत्यु के दायरे से परे जाकर वह सुपर हयूमन – अति मानव की श्रेणी में आ जायेगा और दूसरी ओर गरीब वर्ग कीड़े-मकोड़े में तब्दील हो जायेंगे। तब क्या होगा ? अपनी कल्पनाओं को उस दिशा में छोड़ दें।

किन्तु यह तथ्य है कि मनुष्य ईश्वर बनने की दिशा में अग्रसर है। बनेगा या नहीं, इसका जवाब अधर में है।

Spread the information

Leave a Reply

Your email address will not be published.

You missed

Download App


 

Chromecast Setup

 

 

This will close in 10 seconds