राहुल शर्मा

यह आजादी का 75 वां वर्ष है। और 28 फरवरी 2022 को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस है। भारत के संविधान ने वैज्ञानिक मानसिकता के विकास को नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों में शामिल किया है पर प्रतिगामी सोच वाली शक्तियां, संकीर्णता, कट्टरता, नफरत, पूर्वाग्रह को बढ़ावा देने तथा विवेक व तर्क की जगह अविवेक एवं कुतर्क को प्रोत्साहित, स्थापित करने में लगी हैं। ऐसे में जन जन तक विज्ञान पहुंचाने तथा लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं लोकतांत्रिक चेतना के विकास का कार्य हमारी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी बन जाती है ताकि मानसिक जड़ता, अविवेक, अंधविश्वास मुक्त, संविधान सम्मत, तर्कशील, समतामूलक, विविधतापूर्ण, धर्मनिरपेक्ष, न्यायपूर्ण, आधुनिक भारत का निर्माण संभव हो सके। प्रस्तुत है इसी विषय वस्तु पर आधारित राहुल शर्मा का महत्वपूर्ण आलेख

गौतम बुद्ध ने कहा था कि “किसी भी चीज़ पर आँखमूँद कर सिर्फ़ इसलिए ही विश्वास मत करो कि वह तुमको बताई गई है या इसलिए कि वह पारंपरिक है या इसलिए भी कि तुमने उसकी कल्पना की है।” प्रकृति को जानने समझने के लिए मनुष्य ने उसको तरह तरह से परखा और न जाने क्या-क्या अंदाज़े किये । उन अन्दाज़ों को सही साबित करने के अनगिनत जतन किये और यही जतन विज्ञान हो गए । इस तरह हम देखते हैं कि आदिकाल से ही घटनाओं को जस का तस मान लेना मनुष्य का स्वभाव नहीं बल्कि पशुओं की प्रवृत्ति है, जबकि मनुष्य का मूल स्वभाव प्रश्न खड़े करना और वाद करना है । मनुष्य प्रश्न और वाद इसलिए करता है क्योंकि उसमें जिज्ञासा और सीखने की गहरी क्षमता है और यही क्षमता उसको अन्य जीवों से अलग करती है । हमारी सवाल उठाने की भावना आस्था और अंधविश्वास के ख़िलाफ़ है जबकि आज हमारे इर्दगिर्द कई ऐसी राजनैतिक और सामाजिक शक्तियां पनप गई हैं जो आस्था और अंधविश्वास की गहरी खाईयों में लोगों को धकेल कर अपने हित साधे रहना चाहती हैं । हम देखते हैं कि प्रकृति और इन्सान के बीच सतत रूप से जारी संघर्ष की जो अवस्था हमारे सामने है उसमें विज्ञान और तकनीक लगातार एक से बढकर एक विस्मयकारी कारनामे कर रहे हैं । इसके साथ यह भी एक तथ्य है कि विकृत और मनुष्यविरोधी व्यवस्थाओं और सत्ताओं में विज्ञान की उपलब्धियों का इस्तेमाल सामाजिक कुरीतियों और सड़ी-गली परम्पराओं को जारी रखने और उन्हें मजबूती देने के लिए किया जा रहा है ।

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पंडित जवाहरलाल नेहरु ने अपने एक पत्र में कहा है कि ‘’यूरोप या कहीं भी अन्यत्र, धर्म के संगठित रूप के साथ तरह-तरह के जड़सूत्र संलग्न रहते हैं, जिनको बिना शक या सवाल के स्वीकार करना उनके अनुयायियों की मजबूरी होती है । जबकि विज्ञान के पास चीज़ों या घटनाओं को देखने का एकदम भिन्न तरीका होता है । इसमें कुछ भी आलोचना के परे नहीं होता और इसमें जड़सूत्र जैसी कोई चीज़ नहीं होती । यह खुले दिमाग को प्रोत्साहित करता है और सच्चाई तक पहुँचने के लिए निरंतर प्रयोग करता रहता है । यह दृष्टिकोण निश्चित रूप से धार्मिक दृष्टिकोण के विरुद्ध है और इसमें कुछ आश्चर्य नहीं कि दोनों के बीच लगातार संघर्ष की स्थिति बनी रहे ।‘’ आज़ादी के 75 वें साल के आते आते हम देख रहे हैं कि यह संघर्ष की स्थिति और भी तीक्ष्ण हुई है । आज पूरे ज़ोर-शोर से ज्योतिष के सामने विज्ञान को दोयम दर्ज़े का बताया जाता है, कोरोना के संक्रमण से बचने के लिए ताली-थाली बजवाई जाती हैं, पूरी बेशर्मी से महान वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन के सिद्धांतों का मखौल बनाया जाता है, गाय को ऑक्सीजन लेने व ऑक्सीजन ही छोड़ने वाला प्राणी बताया जाता है, एक सम्मानित विश्वविद्यालय का प्रोफ़ेसर गाय के गोबर से उपले बनाना सिखा रहा है, आदि ऐसी तमाम बकवासों को हम आये दिन कुपढ़ नेताओं से सुनते रहते हैं । एक तरफ़ हमारे संविधान का अनुच्छेद 51– अ जिसमें कि भारत के नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों की बात हैं कहता है कि ‘’यह प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह वैज्ञानिक सोच या नज़रिए को विकसित करें । यह वैज्ञानिक सोच ही है जो धर्मनिरपेक्षता, मानवतावाद के साथ साथ अन्वेषण और सुधार के मूल भाव को विकसित करती है’’ वहीं दूसरी ओर सत्तापक्ष का पूरा प्रयास है कि अतार्किक और अन्धविश्वासी बातों को फ़ैला कर लोगों को उनके इस कर्तव्य से हर हाल में विमुख किया जाए । वैज्ञानिक नज़रिया एक तरह का आशावाद है । इसमें यह माना जाता है कि मनुष्य स्वयं अपनी नियति के निर्माता हैं । इसी आशावाद को तोड़ने की साज़िशें आज रची जा रही हैं ।

अंधविश्वास पर 'विश्वास' आखिर कब तक?

अक्सर लोग विज्ञान और तकनीक को एक ही मानते हैं जबकि विज्ञान एक रणनीति है तो तकनीकी एक कार्यनीति । जब विज्ञान और तकनीकी के बीच की रिक्ति चौड़ी होती जाती है तब समाज की प्रतिक्रियावादी शक्तियां उसमें अपना डेरा जमा लेती हैं और वहाँ से साम्प्रदायिकता और जातिवाद के ज़हर का फैलना शुरू हो जाता है । पूंजीवादी तंत्र विज्ञान और तकनीक को निजी संपत्ति बना डालता है और विज्ञान के नाम पर पुरानी मान्यताओं को लोगों के मानस में घुसाने के प्रयास करता है । एक तरह से यह कहा जाना चाहिए कि पूंजीवाद चाहता है कि लोग विज्ञान और वैज्ञानिक सोच को भूल कर केवल तकनीक की ओर आकर्षित रहें । ज्योतिष का व्यापक प्रचार, भूतकाल का अतिरिक्त गुणगान करते हुए लोगों में आधारहीन और कुतर्कपन को बढ़ावा देना, इत्यादि को हम अपने आसपास बहुतायत में होता हुआ देख और समझ सकते हैं । विज्ञान के सांगठनिक व संस्थागत ढाँचे में जनतांत्रिक मूल्यों का समावेश होता है और वैज्ञानिक सोच से इसी जनतांत्रिकता को जिया या बरता जा सकता है । इस जनतांत्रिकता की स्थापना हेतु वैज्ञानिक सोच और जनतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखने वाले के लोगों को देश बचाने और संविधान की रक्षा हेतु आज़ादी के इस अमृत महोत्सव के अवसर पर जाग जाना चाहिए । वैज्ञानिक सोच को हमें अपने अन्दर विकसित करने के लिए इतिहास और विज्ञान दोनों का अध्ययन करना और उसको समझना आवश्यक है तभी हम उजालों को अंधेरों की क़ैद से मुक्त कराने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं ।

राहुल शर्मा

( लेखक मध्यप्रदेश भारत ज्ञान विज्ञान समिति से जुड़े हैं )

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