वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले व्यक्तियों को हमेशा ऐसे प्रश्नों से दो-चार होना पड़ता है। हम अंध आस्था रखने के नुकसान भी गिनवा देंगे ।हम वैज्ञानिक सोच के फायदे भी बता देंगे फिर भी मूल प्रश्न अनुत्तरित रह ही जाएगा कि आखिर अधिकतर व्यक्ति ऐसा सोचते ही क्यों है। इस बारे में बहुत लिखा भी जा चुका है आगे भी बहस का विषय यह रहेगा ही। हमें इस विषय पर बार-बार बहस करनी भी पड़ेगी ।अन्य बातों के अलावा हमें सबसे पहले जिस प्रश्न का सामना करना पड़ता है वह यही होता है जब दुनिया में इतनी बड़ी संख्या में लोग मानते हैं तो इसका कुछ मतलब है। सभी बेवकूफ थोड़े ही है ।इसी बीच वे बहुत से बुद्धिमान व प्रसिद्ध व्यक्तियों के नाम गिनवा देंगे जो आस्था रखते थे या रखते हैं ।इस प्रश्न पर कई तरीकों से विचार किया गया है। कुछ ऐसा कह देते हैं कि संज्ञान प्रक्रिया अर्थात ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया की यह कमी रह गई है या यह इसका अधूरापन है जो हमें इस संकल्पना की ओर ले जाता है। तो क्या आज तक संज्ञान प्रक्रिया की इतनी बड़ी सार्वभौमिक कमी पहचानी नहीं गई ?फिर यह कमी या अधूरापन व्यक्तियों को इसी और क्यों ले जाता है।कुछ मनोवैज्ञानिकों ने इस प्रश्न को एक ऐसी सार्वभौमिक मानव प्रवृत्ति बताया है जो बहुविध प्रयोजनवादी सोच रखती है ।इस प्रश्न की बहस की खास बात यही है कि यह बहस इस विश्व में आज तक की सर्वाधिक लंबी बहस है। यह सदियों से चल रही है और आगे भी चलती रहेगी ।चलती रहेगी के मामले में कुछ शोधकर्ताओं का यह कहना है कि साक्ष्य व अध्ययनों के बावजूद भी इस बहस पर पूर्ण विराम नहीं लगेगा। यहां तक की अधिकतर वैज्ञानिकों व दार्शनिकों का यही मत है कि यह बहस बहुत कम व्यक्तियों को ही आश्वस्त कर सकती है अधिकांश के दिमागों पर यह प्रभाव हीन ही रहेगी।


हम प्रश्न को कुछ आसान बना लेते हैं ।हम प्राय देखते हैं कि बहुत से व्यक्ति वैकल्पिक इलाज, यति, उड़नतश्तरी, दिव्यचक्र आदि अनेक बातों में यकीन रखते हैं। इस प्रकार के विश्वासों में एक बात सामान्य है कि प्रमाण सहित व्याख्या देने के बाद कुछ लोगों का विश्वास कम हो जाता है। इस मामले में तो यह कहा जा सकता है कि संज्ञान प्रक्रिया की भूलों या कमियों को दुरुस्त करते हुए कुछ लोगों को समझाया जा सकता है। यह भूल या कमी वैज्ञानिक विधियां अपनाते हुए कम या दूर की जा सकती है। अर्थात विज्ञान विधि कई प्रकार के विश्वासों की जड़ता को ढीली कर सकती है। विज्ञान की पढ़ाई का एक मतलब यही होता है। लेकिन बात जब ईश्वर पर विश्वास की आती है तो यह विधि ज्यादा कारगर होती नहीं दिखती । कुछ वैज्ञानिक तो यही कह देते हैं कि ईश्वर के बारे में जानने परखने का विषय उनका कार्यक्षेत्र है ही नहीं।विश्वास का यह क्षेत्र काफी कठिन है ।हमें यहां कुछ और प्रश्नों को साथ लेना पड़ेगा। हो सकता है हमारे पास काफी पुख्ता सबूत न भी हों तो क्या यह मान लिया जाए कि अमुक बात गलत ही होगी ।बहुत से व्यक्ति बहुत सी बातों को ठीक भी मानते हैं जिनके पीछे भी कोई ठोस सबूत नहीं होते ।अधिकांश व्यक्ति इसी श्रेणी में आते हैं।यदि तर्क या साक्ष्य किसी सुप्रीम शक्ति के बारे में पूरी व्याख्या नहीं दे पाते हैं तो मानव स्वभाव में यह निहित है कि वह उस पर विश्वास करेगा। इसका अर्थ हुआ कि संज्ञान प्रक्रिया में ही स्वतः कुछ ऐसा है जो इस विशेष प्रकार के आग्रह या ऊर्जा को रखे हुए हैं की मान ही लेना चाहिए। अब तक की सभ्यता के इतिहास में यह आग्रह मनुष्य के दिमाग पर हावी रहा है ।अर्थात हमें प्रश्न को किसी और कोण से देखना पड़ेगा। संज्ञान प्रक्रिया से इसका हल निकलने वाला नहीं है। बेशक संज्ञान प्रक्रिया की सटीक समझ ही हमें प्रश्नों का उत्तर देने के योग्य बनाती है। मनोवैज्ञानिकों ने भी इस प्रश्न पर बहुत काम किया है। इन्होंने इस प्रश्न के आधे अधूरे उत्तर निकालने की कोशिश भी की है। ये सभी मिलकर बात को कुछ सिरे चढ़ा सकते हैं ।


मृत्यु का भय ।
हम मनुष्यों को चेतना मिली है। यह सर्वाधिक अनुपम उपहार प्रकृति द्वारा केवल और केवल मनुष्य को मिला है ।इसके साथ एक शर्त अनिवार्य रूप से जुड़ गई है ।हम अपनी मृत्यु के बारे में सचेत हो गए हैं। दूसरे अर्थों में कहा जाए तो इस चेतना रूपी दौलत पाने के लिए हमें मृत्यु के भय के रूप में बहुत बड़ी कीमत देनी पड़ी है। यह बात निम्न श्रेणी के जीवो में नहीं है। इसकी एवज में मनुष्य को स्वभ्रम में रखने के लिए अगले जन्म के नाम से एक प्रोत्साहन सामग्री दे दी गई है। इसके साथ यह बोनस भी जोड़ दिया गया है कि मरने के बाद व्यक्ति अपने पूर्वजों से जा मिलेगा। यदि इस व्यवस्था का विश्लेषण किया जाए तो भी ईश्वर के होने व इसमें विश्वास करने का कोई सीधा संबंध नहीं लगता। अभी तो उपरोक्त व्याख्या में बहुत सी बातें रह भी गई हैं स्वर्ग- नरक ,पाप -पुण्य का फल, सहायक सामग्री के रूप में प्रार्थनाएं व विभिन्न कर्मकांड आदि के स्पष्टीकरण अभी बचते हैं ।इनसे केवल इतना ही निष्कर्ष निकलता है कि मरने वाला व्यक्ति यही सोचेगा कि मृत्यु उपरांत मेरी चेतना का स्वरूप क्या हो सकता है l लेकिन मृत्यु तो नास्तिक और आस्तिक सभी की होती है। मृत्यु को नास्तिक या आस्तिक की कोई पहचान नहीं होती न ही वह कोई अंतर करती ।बाद के जीवन की मान्यता अभी तक प्रमाणिक नहीं है ।हां , मृत्यु के मामलों में एक चीज अच्छी तरह काम करती है। वह है जुनून में आकर आत्महत्या करना जो इस विश्वास में यह कदम उठाते हैं कि जिहाद की सूरत में उन्हें जन्नत मिलेगी, इसमें प्रेमी -प्रेमिका के मिलन का विषय भी शामिल हो सकता है या कुछ भावनाएं ऐसी भी होती है कि मैं दुनिया को दिखा जाऊंगा आदि- आदि। जबकि ये सभी बातें आधारहीन है परंतु क्षणिक तीव्र आवेग इनके पीछे काम करता है ।


नित्से (घोर नास्तिक) का यह कहना था कि ईश्वर की संकल्पना एक विशेष क्षेत्र के छोटे इलीट वर्ग के लिए बहुसंख्यक अंधविश्वासी लोगों पर नियंत्रण रखने के लिए उनके बहुत काम की चीज है ।धार्मिक विश्वास के लोगों में यह सदियों से देखा जा सकता है। हम अपने चारों ओर कितने ही तथाकथित स्वामी व गुरुओं को देखते हैं तथा उनकी अंधी भेड़ों को भी देखते हैं। हम यह भी देखते हैं कि इस नियंत्रण रखने के लिए उन्हें नित नए स्वांग रचने पड़ते हैं। लेकिन लोगों पर नियंत्रण रखने का एकमात्र तरीका ईश्वर में विश्वास ही तो कतई नहीं है ।राजतंत्र में राजा भी तो अपनी प्रजा पर राज्य करता है। तथापि यह दोनों नियंत्रण एक जैसी प्रकृति के नहीं है। पहले मामले में आस्था के वशीभूत अनुयायी स्वैच्छिक रूप में गुलामी स्वीकार करते हैं, जबकि दूसरे मामले में यह भय आस्था का न होकर कानून -कायदों ,सजा ,दमन आदि के रूप में होता है। बेशक किसी समय में राजा को ईश्वर का अवतार ही माना गया हो। इसके खिलाफ तो बगावत भी हो सकती है लेकिन ईश्वर आस्था के खिलाफ बगावत की बात हम अभी नहीं सोच सकते।कुछ व्यक्ति ऐसे जरूर मिल जाएंगे जो अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर ईश्वर के होने के दावे रख देंगे। हम समझते हैं कि मानसिक भ्रम की स्थिति में वे ऐसा कह सकते हैं ।उनके ये अनुभव विभिन्न दवाओं के सेवन से हो सकते हैं ।कुछ व्यक्ति मृत्यु के निकट के अनुभवों का वर्णन करते हैं।वे अपने -अपने अनुसार यमराज के दरबार की कहानियां गढ़ देंगे ।यदि आप गौर से देखेंगे तो पाएंगे की ऐसी सभी कहानियां उनके सांस्कृतिक परिवेश के इर्द-गिर्द घूमती नजर आएंगी ।लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि इन बातों को कहने वाले कम तथा सुनकर मानने वाले ज्यादा मिलते हैं ।जब ऐसे व्यक्तियों की मनोवैज्ञानिक या न्यूरोलॉजिकल जांच या अध्ययन किया जाता है तो इसके आधार समझ आने लगते हैं।

 

विकासवाद का इनाम
हम समझते हैं कि मानव विकास का इतिहास मानव मस्तिष्क के विकास का इतिहास भी है। मस्तिष्क के विकास ने नया खोजने ,दूर तक की कल्पना करने ,व्यक्तियों को त्रुटिहीन व संपूर्ण देखने और एक उच्चतम श्रेष्ठ स्तर तक पहुंचने के सपने देखे हैं ।इन सब के फलस्वरूप ईश्वर की अवधारणा तक जाना स्वाभाविक है। प्राकृतिक चयन के साथ -साथ यह एक प्रकार का सांस्कृतिक विकास का चयन मॉडल भी है। इसमें तार्किक व जड़ सोच की दोनों प्रवृतियां साथ- साथ विकसित हुई है ।अभी इस बारे अध्ययन चल ही रहे हैं ।मस्तिष्क में ईश्वरी क्षेत्रजब मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को समझने के लिए एम आर आई या पी इ टी जैसे परीक्षण किए गए तो नए अध्ययन सामने आए। ये अध्ययन उन व्यक्तियों पर किए गए जो ध्यान की अवस्था ,अनुभवातीत अनुभव व प्रार्थना अवस्था आदि में एकाग्र चित्त थे। इनमें पाया गया कि ऐसे व्यक्तियों के मस्तिष्क का एक विशेष क्षेत्र सक्रिय हो उठता है। कुछ विश्लेषण कर्ताओं ने इसे मस्तिष्क का ईश्वरीय स्पोट कह दिया। लेकिन इन दावों में कोई खास दम नहीं निकला ।अल्कोहल या कुछ अन्य ड्रग्स के प्रभाव में भी कुछ विशेष क्षेत्र अधिक सक्रिय होते हैं ।यह सब तंत्रिका तंत्र की कार्य प्रणाली का हिस्सा है वहां बायोइलेक्ट्रिकल करंट तथा रासायनिक पदार्थों के स्रावों की भूमिका अहम है।

 


जीवन का अर्थ ।
मनुष्य के जीवन का क्या अर्थ है? यह एक संज्ञानात्मक संकल्पना है ।यह संकल्पना एक उच्चस्तरीय सचेत प्राणी में ही हो सकती है निम्न श्रेणी के जीवो में यह संकल्पना नहीं होती। जीवन का उद्देश्य होना या अर्थ होने का मतलब केवल तभी है जब हम इसे कोई अर्थ देते हैं। सामान्य लोग इसी प्रकार अर्थ करते हैं कि खुश रहा जाए, जरूरतमंदों की सहायता की जाए ,मानवता की सेवा की जाए आदि-आदि ।लेकिन यह अर्थ व्यक्ति दर व्यक्ति बदलते हैं। कुछ ऐसे भी अर्थ देने वाले मिल जाएंगे कि नर्क से बचना है, ईश्वर की शरण में जाना है ,उसकी सेवा करना है आदि आदि। सवाल यही उठता है कि कौन आदमी किस प्रकार जीवन के अर्थ करता है ।बोस्टन विश्वविद्यालय की मनोवैज्ञानिक केलेमन ने बच्चों पर कुछ शोध किए हैं ।इनका कहना है कि हर बच्चा किसी भी वस्तु को इस दृष्टि से देखता है कि यह सब क्या है और यह किस काम का है। वह उसके पीछे प्रयोजन समझना चाहता है ।इस तरह प्रयोजनवाद या हेतुवाद बच्चे में पहले प्रवेश करता है व कारण प्रभाव के संबंध पर वह बाद में जाता है। उदाहरण के लिए जब वर्षा होती है तो बच्चा इस बात पर नहीं जाएगा की वर्षा कैसे होती है ,बादलों में क्या कुछ घटता है आदि- आदि। वह इस बात पर जल्दी चला जाएगा की वर्षा का मतलब क्या है। जबकि यहां यह कैसे का सवाल ज्यादा महत्व रखता है। लगभग 10 वर्ष की आयु तक सब सीखने की प्रवृत्ति हावी रहती है ।अब यदि शिक्षण पर ध्यान दिया जाए तो बड़े होने पर सोच में अलग अंतर साफ नजर आएगा। केलेमन की शोध इस ओर इशारा करती है कि बच्चे के अभिभावक व उसका परिवेश इस सब प्रयोजनवाद की अवधारणा के वाहक हैं। वे आगे कहती है कि कम उम्र के बच्चों के दिमाग में डाला गया यह प्रयोजनवाद आगे चलकर उनकी संज्ञान प्रक्रिया पर हावी हो जाता है। बाद में बेशक कितनी भी विज्ञान की शिक्षा दे दी जाए यह प्रयोजनवाद सोच के विकल्प का स्थान नहीं ले सकती ।हां, कुछ हद तक इस सोच को दबा सकती है । बचपन में ही एक स्वतंत्र एवं वैज्ञानिक सोच आगे चलकर आशा की किरण जगा सकती है। एक मजेदार कहावत है– जब मैं बच्चा था तो बच्चों की तरह बोलता था। बच्चों की तरह सोचता था ।बच्चों की तरह प्रश्न करता था। भय कम था ।अब मैं बड़ा हो गया हूं ।मैंने बच्चों की तरह होना छोड़ दिया है।

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