मध्य प्रदेश विज्ञान सभा की ओर से विज्ञान संचारक को सादर श्रधांजलि…….

विज्ञान सभा के साथी कुमार द्विवेदी के अनुसार देश, प्रदेश एवं जिले के विख्यात नवाचारी शिक्षक डॉ विभु मिश्र को 24 अप्रेल की रात, कराल-काल कोरोना ने हमसे छीन लिया । मेडिकल कॉलेज शहडोल के कोविड वार्ड में पिछले दिन, देर रात कोरोना से लड़ते – लड़ते उनकी सांस टूट गई । जीवन भर प्रतिकूलताओं से लड़ने और कभी हार नहीं मानने वाला यह अकादमिक योद्धा एक अनजान वायरस कोविड-19 के सामने निरुपाय हो गया । शासकीय हायर सेकेंडरी विद्यालय सुंदरदादर में प्रिंसिपल के पद पर पदस्थ डॉ विभु मिश्र विज्ञान खासकर भौतिकशास्त्र , खगोल शास्त्र और पर्यावरण के क्षेत्र में अपने नवाचारों के लिए न सिर्फ जिले में बल्कि राष्ट्रीय स्तर में विख्यात थे । विज्ञान एवं खगोल से सम्बद्ध प्रदेश एवं देश स्तर की कई संस्थाओं से वे गहरे जुड़े थे तथा उनकी अकादमिक एवं शैक्षणिक गतिविधियों में हमेशा आमंत्रित किए जाते थे । इन गतिविधियों का उनके लिए कितना महत्व था इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कई बार इन सेमीनारों में शामिल होने की विभागीय स्वीकृति नहीं मिलने पर वह अवैतनिक अवकाश लेकर भी उनमें शामिल होते थे ।
प्रोफेसर यशपाल के सानिध्य में काम करने वाले डॉक्टर विभु ने खगोलीय परिघटनाओं को लेकर जनमानस में रूढ़ हो चुके मिथ को दूर करने के लिए छात्रों और नागरिकों के बीच उल्लेखनीय कार्य किया । ग्रहण के समय उन्होंने जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए और ग्रहण की खगोलीय परिघटना को वैज्ञानिक उपकरणों के जरिए समझाने और खगोलीय चश्मे से खुले मैदान में सूर्यग्रहण दिखाने का अभियान चलाया । विज्ञान एवं खगोल से जुड़े किसी भी अवसर को वे यूं ही जाने नहीं देते थे । उसे शिक्षकों छात्रों और नागरिकों के लिए नया जानने – सीखने का जरिया बना देते थे । उनके द्वारा जिले में आयोजित – संचालित कार्यक्रमों की एक लंबी श्रंखला है जिसमें अंतरराष्ट्रीय प्रकाश पर्व पर आयोजित संगोष्ठी एवं विज्ञान प्रदर्शनी , राष्ट्रीय विज्ञान सेमिनार , राष्ट्रीय विज्ञान दृष्टिकोण दिवस, जीरो शैडो डे ( जीरो छाया दिवस ) आदि मुख्य हैं । राष्ट्रीय विज्ञान दिवस को वे अलग-अलग थीम पर मनाते थे । एक बार उन्होंने राष्ट्रीय विज्ञान दिवस पर “विकलांगों के लिए तकनीक” विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं प्रदर्शनी का आयोजन किया । डेढ़ साल पहले उन्होंने “स्टूडेंट सोलर एम्बेसडर वर्कशॉप ” आयोजित की , जो बहुत चर्चित रही । इस वर्कशॉप में बच्चों ने सोलर लैंप बनाये भी । जल संरक्षण और स्वच्छता सम्बन्धी प्रतियोगिताएं और पर्यावरण जागरूकता कार्यक्रम भी वे नियमित रूप से कराते थे । उनके मार्गदर्शन में जिले के तमाम छात्रों ने संभाग एवं प्रदेश स्तर पर विज्ञान के मॉडल्स में प्रशस्तियां बटोरीं । बायो टेक्नोलॉजी अवेयरनेस फॉर एसटी-एससी स्टूडेंट्स के लिए उन्होंने एक एक्सपोजर विजिट भी आयोजित किया । चौरी हायर सेकेंडरी के छात्रों को भोपाल लेकर गए । ऐसे अनेक उदाहरण हैं लेकिन उन्हें ताउम्र इस बात की शिकायत रही कि शिक्षा विभाग उनके काम का कभी सही मूल्यांकन नही कर सका । मुझे याद है कई बार मुझे जिले के कलेक्टरों को डॉ विभु मिश्र के होने का मतलब और उनके काम का महत्व समझाना पड़ा ।
विज्ञान शिक्षण में नवाचार एवं खगोल विज्ञान को जनाभिमुख बनाने के उनके प्रयासों को दूर-दूर तक न सिर्फ सराहना मिली बल्कि उन्हें कई अवार्ड और प्रशस्ति पत्र भी मिले । टीचिंग लर्निंग मैथेड और मैटीरियल बनाने में भी वे उस्ताद थे । घरेलू चीजों और प्लास्टिक के कचरे से नए मॉडल्स बना लेते थे । इलेक्ट्रॉनिक्स के वे इतने माहिर थे कि बड़े से बड़े विज्ञ भी इस क्षेत्र में उनका लोहा मानते थे । उन्होंने कई इलेक्ट्रॉनिक स्टूमेंट्स बनाए । नई खोज , नए उपकरण , नई मशीनरी उनकी दिलचस्पी के क्षेत्र थे । जब तक वे उसे पूर्ण रूपेण हस्तगत ना कर लें उन्हें चैन नहीं पड़ती थी । स्मार्ट क्लास आज एक पापुलर चीज बन गई है लेकिन जब दूर-दूर तक इसके बारे में कोई जानता नहीं था तब से डॉ विभु इस विषय में सोच रहे थे और सीमित दायरे में उसका प्रयोग कर रहे थे । वैज्ञानिक सोच , खोजी वृत्ति और प्रयोगधर्मी कार्यकलापों के कारण साथी शिक्षक उन्हें “विक्रम सारा भाई” के नाम से बुलाते थे । एक प्रकार से यह संबोधन उनके और उनके काम के प्रति साथियों का सम्मान व्यक्त करने का अपना तरीका था ।
सब कुछ करते हुए अंततः वे शिक्षक थे और छात्रों को विज्ञान फ्रेंडली कैसे बनाना है ? उनका साइंटिफिक टेंपर कैसे डेवलप करना है ? इस दिशा में वे दिन-रात सोचते थे । सोते-सोते आधी रात को भी यदि कोई कंसेप्ट उनके दिमाग में कौंध जाता था तो वह उठकर उसे जब तक फार्मूलेट नहीं कर लेते थे, तब तक सोते नहीं थे ।
शासकीय हा. से. विद्यालय खलेसर के प्राचार्य प्रदीप सिंह गहलोत कहते हैं कि उनका घर, घर कम प्रयोगशाला अधिक था । जो किसी अनजान व्यक्ति को अजायबघर लगता था । साथी मजाक करते थे कि विभु के कमरे में सिर्फ विभु ही सो सकते हैं कोई दूसरा नहीं । जिला विज्ञान प्रभारी, इलेक्शन के मास्टर ट्रेनर और शैक्षणिक समन्वयक के रूप में उनके योगदान को कभी भी भुलाया नही जा सकता ।
जिले के एक अन्य नवाचारी शिक्षक सुशील मिश्र अत्यंत व्यथित मन से कहते हैं विभु जैसा कोई दूसरा नहीं । उनमें अपने ज्ञान और कौशल के प्रति असंदिग्ध आस्था, विश्वास और प्रतिबद्धता थी । वह सजा भुगतने को हमेशा तैयार रहे और भुगते भी लेकिन अपने मूल्यों से कभी समझौता नहीं किया । वे आला दर्जे के मुंहफट थे , जिसे जो कहना है मुंह पर कह देते थे इसलिए लोग उनसे नाखुश रहते थे और बेवजह उनके आलोचक हो जाते थे , किंतु विभु इन सब बातों से हमेशा बेपरवाह ही बने रहे । सुशील मिश्र अत्यंत विनीत भाव से कहते हैं कि मैं जो कुछ भी हूं उसमें 50 फ़ीसदी योगदान डॉक्टर विभु का है । आपने बताया कि डॉ विभु के नेतृत्व में वे चलित विज्ञान प्रयोगशाला ( फन विथ साइंस ) कांसेप्ट पर काम कर रहे थे जो उनके नही रह जाने से अधर में लटक गया ।
शासकीय रणविजय प्रताप सिंह महाविद्यालय के प्राध्यापक डॉ एम. एन. स्वामी का कहना है कि डॉ विभु भले ही हायर सेकंडरी विद्यालय के प्राचार्य थे किंतु उनका अकादमिक दायरा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जैसा विस्तृत था । उनका जाना जिले की अपूरणीय क्षति है ।
शिक्षा व्यवस्था पर डॉ विभु से अक्सर बात होती थी वे मुझसे कहते थे विद्यार्थी आत्मविश्वासी, स्वतंत्र रूप से सोचने वाले , जिम्मेदार एवं मानवीय वृत्ति वाले बनें , इसके लिए जरूरी है वह कार्य संस्कृति जो हम अपने स्कूल व कक्षाओं में स्थापित करते हैं । इसके बाद वे पलट कर यह भी कहते थे कि ऐसी कार्य संस्कृति एक स्कूल में तभी विकसित हो सकती है जब हमारी शिक्षा व्यवस्था की प्रशासनिक संस्कृति शिक्षकों को सशक्त बनाने, उन पर विश्वास करने और उन्हें अधिकार देने वाली हो ।
यूं तो विभु दमोह जिले के थे लेकिन उमरिया जिले को ही उन्होंने अपना घर माना और उसे ही अपनी कर्मभूमि । उनके निधन से शिक्षा जगत में शोक की लहर व्याप्त है । उमरिया जिले के पूर्व कलेक्टर एस. एस. कुमरे, पूर्व जिला शिक्षा अधिकारी के. के. पांडेय , आलोक पाठक , सरिता जैन आदि ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की है । अपने पीछे वे एक बेटी जो नवीं की छात्रा है और पत्नी को छोड़ गए हैं । मैं कृतज्ञ भाव से उन्हें अपनी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ ।

आशीष पारे

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