अंतराष्ट्रीय ख्याति अर्जित करने वाले पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा का शुक्रवार को एम्स, ऋषिकेश में कोविड-19 से निधन हो गया. वह 94 साल के थे. उनके परिवार में पत्नी विमला, दो पुत्र और एक पुत्री है.

9 जनवरी, 1927 को टिहरी जिले में जन्मे बहुगुणा को चिपको आंदोलन के प्रणेता रहे हैं. पद्मविभूषण व कई अन्य पुरस्कारों से सम्मानित बहुगुणा ने टिहरी बांध निर्माण का भी बढ़-चढ़ कर विरोध किया और 84 दिन लंबा अनशन भी रखा था. एक बार उन्होंने विरोध स्वरूप अपना सिर भी मुंडवा लिया था.

सुंदरलाल बहुगुणा का मानना था कि पेड़ों को काटने की अपेक्षा उन्हें लगाना हमारे जीवन के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है. उन्होंने सत्तर के दशक में गौरा देवी और कई अन्य लोगों के साथ मिलकर जंगल बचाने के लिए चिपको आंदोलन की शुरूआत की थी.

चिपको आंदोलन का ही नारा है……

“क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार !
मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार !!

विकास, राष्ट्र और समाज की जरूरतों के अनुरुप होना चाहिए, न कि कॉरपोरेटी पूंजीपतियों की जरूरतों के अनुसार. लाखों पेड़ काट दिए जाते हैं और कंक्रीट सड़कों का जाल बिछ जाता है. जैसे अंग्रेजों ने अपने साम्राज्य का विस्तार करने के लिए ही सड़कें और रेल का जाल बिछाया था. लेकिन सबसे अहम मसला है, “मानव संसाधन का विकास !”

विभिन्न राष्ट्रों के बीच और राष्ट्रों के अन्दर भीषण आर्थिक विषमता (Economic disparity) और पर्यावरण की बर्बादी (Environmental degradation) मानव सभ्यता के सामने दो सबसे बड़े खतरे हैं ! सुनामी, आकस्मिक बाढ़, ग्लोबल वार्मिंग, ग्रीन हाउस इफेक्ट आदि पर्यावरण की दुर्दशा के ही अंजाम हैं, जो मानव-जाति को डायनासोर की तरह एक लुप्त प्रजाति में बदल सकते हैं , इस धरती पर पर्याप्त संसाधन है, जिससे हर किसी की आवश्यकता (need) की पूर्ति संभव है लेकिन कुछ मुट्ठी भर परजीवी धनपिशाचों के अंतहीन लालच (greed) की पूर्ति संभव नहीं है!

 अत: ‘Need’ और ‘Greed’ में हमें फ़र्क करना होगा. पूंजीपति वर्ग के लिए तो प्राकृतिक संसाधन यथा जल, जंगल, जमीन सिर्फ दोहन के लिए है, मानवता सस्ता श्रम का स्रोत और मुनाफ़ा ही उनका परमेश्वर है ! पूंजीवादी व्यवस्था के केन्द्र में मानवता नहीं, बल्कि ‘शुभ लाभ’ होता है ,बीसवीं सदी के महानतम वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने अपने लेख ‘समाजवाद क्यों?’ में दर्शाया है, “पूंजीवाद में उत्पादन लाभ के लिए किया जाता है, न कि उपयोग के लिए.”

यह वैज्ञानिक समाजवाद (scientific socialism) ही है जिससे महामारी पर विजय के साथ साथ प्रकृति, पर्यावरण एवं जैव विविधता (biodiversity) की रक्षा हो सकती है. और तभी बचेगा जीवन और बचेगी धरती !एक ही धरती है जिस पर मानव सहित सारे जीव जन्तु सामंजस्यपूर्वक रहते आ रहे हैं. आज हमारे पास वैज्ञानिक ज्ञान है, तकनीकी उपलब्धियां हैं, मानव संसाधन व अन्य प्राकृतिक संसाधन हैं जिनका बुद्धिमत्तापूर्वक उपयोग कर महामारी सहित भूख, गरीबी, बेरोजगारी, बेबसी का खातमा कर दुनिया के सारे देश मिलकर धरती को स्वर्ग बना सकते हैं.

“सृष्टि-बीज का नाश न हो, हर मौसम की तैयारी है !
कल का गीत लिए होठों पे आज लड़ाई जारी है !
✍️
प्रस्तुति : डॉ सुनील सिन्हा

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