दयानिधि
जलवायु परिवर्तन केवल मौसम नहीं बदल रहा, यह सामाजिक संबंध तोड़कर समुदायों को कमजोर कर रहा है और लोगों में अकेलापन बढ़ा रहा है। आज जब हम जलवायु परिवर्तन की बात करते हैं, तो आमतौर पर हम तापमान बढ़ने, बाढ़, तूफान या सूखे की चर्चा करते हैं। लेकिन एक नई अंतरराष्ट्रीय रिसर्च यह दिखाती है कि इसका असर सिर्फ प्रकृति पर नहीं, बल्कि इंसानी रिश्तों और समाज की बनावट पर भी पड़ रहा है। यह अध्ययन ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी के मैटिल्डा सेंटर के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किया गया है। इसके अनुसार जलवायु परिवर्तन धीरे-धीरे लोगों के सामाजिक जीवन को बदल रहा है और उन्हें एक-दूसरे से दूर कर रहा है। यह अध्ययन ‘नेचर ह्यूमन बिहेवियर’ नामक जर्नल में प्रकाशित हुआ है।

गर्मी और प्रदूषण कैसे बदलते हैं हमारा सामाजिक जीवन
जब हीटवेव यानी अत्यधिक गर्मी पड़ती है, तो लोग घरों से बाहर निकलना कम कर देते हैं। पार्क, बाजार, मोहल्ले और सार्वजनिक जगहें खाली होने लगती हैं। इसी तरह वायु प्रदूषण भी लोगों को बाहर कम जाने के लिए मजबूर करता है। स्कूल बंद हो जाते हैं, कामकाज प्रभावित होता है और रोजमर्रा की मुलाकातें कम हो जाती हैं। ये बदलाव अचानक बड़े नहीं लगते, लेकिन धीरे-धीरे लोगों के बीच की बातचीत और रिश्तों को कमजोर करते जाते हैं। चीन और तुवालु जैसे देशों में हुए अध्ययन बताते हैं कि लगातार जलवायु दबाव से लोग उदास रहने लगते हैं और सामाजिक गतिविधियों से दूरी बना लेते हैं।

आपदाएं सिर्फ घर नहीं तोड़तीं, समुदाय भी बिखरते हैं
बाढ़, चक्रवात और जंगल की आग जैसी आपदाएं केवल घर और संपत्ति को नुकसान नहीं पहुंचातीं, बल्कि पूरे समुदाय को बिखेर देती हैं। जिन जगहों पर लोग मिलते-जुलते थे, वे स्थान भी नष्ट हो जाते हैं। डोमिनिकन रिपब्लिक और जापान में हुए शोध बताते हैं कि आपदा के बाद भले ही लोगों को सुरक्षित जगह पर ले जाया जाए, लेकिन कई लोग पहले से ज्यादा अकेलेपन और खराब मानसिक स्वास्थ्य का सामना करते हैं। ग्रामीण ऑस्ट्रेलिया में लंबे समय तक पड़े सूखे ने भी यही असर दिखाया है। खेती और आय प्रभावित होने के साथ-साथ गांवों में सामाजिक गतिविधियां कम हो गईं और लोग अलग-थलग पड़ गए।

हर किसी पर समान असर नहीं पड़ता
इस अध्ययन का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि जलवायु परिवर्तन का असर सभी लोगों पर बराबर नहीं पड़ता। गरीब लोग, कमजोर आवास में रहने वाले, दिव्यांग लोग और हाशिए पर मौजूद समुदाय अधिक प्रभावित होते हैं। उनके पास न तो पर्याप्त संसाधन होते हैं और न ही मजबूत सामाजिक सहारा, जिससे वे जल्दी टूट जाते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार यह स्थिति एक “सामाजिक स्वास्थ्य अंतर” पैदा कर रही है। एक तरफ वे लोग हैं जो मुश्किलों के बावजूद जुड़े रहते हैं, और दूसरी तरफ वे लोग हैं जो धीरे-धीरे समाज से कटते चले जाते हैं।

सामाजिक संबंध जीवन बचा सकते हैं
2021 में कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया में आई हीट डोम आपदा में 600 से अधिक लोगों की मौत हुई थी। इस दौरान यह देखा गया कि जिन लोगों के सामाजिक संबंध कमजोर थे, उनकी मृत्यु का खतरा ज्यादा था।

समुदाय की ताकत पहले से बनती है
ऑस्ट्रेलिया की “ब्लैक समर” जंगल आग की घटना यह दिखाती है कि जिन लोगों के बीच पहले से मजबूत रिश्ते थे, वे आपदा के बाद जल्दी संभल पाए। आपदा के समय अचानक रिश्ते नहीं बनाए जा सकते। जो लोग पहले से अपने पड़ोस और समुदाय से जुड़े होते हैं, वही मुश्किल समय में एक-दूसरे की मदद कर पाते हैं।

आगे की जरूरत क्या है
इस शोध का सबसे बड़ा संदेश यह है कि सरकारें केवल पुल, बांध और आपात सेवाओं पर ध्यान न दें, बल्कि सामाजिक संबंधों को मजबूत करने पर भी निवेश करें। इसका मतलब यह है कि समाज में जुड़े रहना केवल भावनात्मक सहारा नहीं है, बल्कि यह जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर भी बन सकता है। पार्क, सामुदायिक स्थान, बेहतर आवास योजना और ऐसे शहर जो लोगों को जो, ये सब भी उतने ही जरूरी हैं जितने भौतिक ढांचे। अगर समाज पहले से जुड़ा हुआ होगा, तो वह किसी भी आपदा का बेहतर सामना कर सकेगा और जल्दी उबर पाएगा। जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ पर्यावरण की समस्या नहीं है। यह हमारे रिश्तों, हमारी एकता और हमारे समाज की नींव को भी प्रभावित कर रहा है। अगर हम इसे केवल तकनीकी समस्या मानकर आगे बढ़ते रहे, तो इसका समाधान अधूरा रहेगा। असली मजबूती तब आएगी जब हम प्रकृति के साथ-साथ इंसानी संबंधों को भी बचाने और मजबूत करने पर ध्यान देंगे।
(‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )
