प्रो. राजेंद्र चौधरी

आमतौर पर लोग व्यक्तिगत जीवन में यह मान कर चलते हैं कि हमारा समाज, हमारे आस पास का परिवेश, सामाजिक ढांचा और व्यवस्था तो बदलेगी नहीं, इस लिए हमें इसी व्यवस्था में अपनी जगह बनानी होगी। इसलिये अधिकतर लोगों की सारी ऊर्जा अपना सामाजिक परिवेश बदलने पर नहीं, अपितु उस में अपनी जगह बनाने, सिफ़ारिश ढूँढने या कोई अन्य जुगाड़ करने पर लगती है। उनकी निगाह अपने तक, अपने परिवार तक सीमित रहती है। यहाँ तक कि पढ़ाई, नौकरी या वैवाहिक जीवन में अपने बच्चों की असफलता के लिये लोग आम तौर पर अपने आप को या अपने बच्चों को ही जिम्मेवार ठहराते हैं। शिक्षा प्रणाली या सामाजिक माहौल बदलने पर कम ध्यान जाता है।

ऐसा नहीं है कि परिवेश या परिस्थितियों को बदलने के प्रयास बिल्कुल नहीं होते। रोजाना होने वाले आंदोलन, धरने, जुलूस, चाहे वह मंदिर के लिए हो या वेतन वृद्धि के लिए चाहे गोरक्षा के लिए हो या आरक्षण के पक्ष-विपक्ष में इन सब प्रयासों का लक्ष्य सामाजिक ढांचे और सरकारी नीतियों को बदलना ही तो रहता है। इन में से कुछ व्यापक सामाजिक हित में होते हैं, तो कुछ संकीर्ण निज हित में होते हैं। विज्ञापन आधारित सारे व्यवसाय का, और आज विज्ञापन कहाँ नहीं है, का मुख्य उद्देश्य परिवेश या परिस्थितियों को बदलना ही तो है। चुनावी राजनीति भी अपने परिवेश को बदलने का ही एक तरीका है।

लेकिन आम तौर पर समाज का उच्चतम तबका या उस से नीचे की परत के लोग ही ऐसे सक्रिय प्रयास करते हैं। जो लोग सबसे नीचे हैं, उनकी बात छोड़ें, आम तौर पर मध्यम वर्ग लोगों का जीवन भी मौजूदा परिस्थितियों को स्वीकार कर के उस में अपनी स्थिति बेहतर बनाने तक सीमित रहता है न कि इन सामाजिक परिस्थितियों को बदलने का। हालाँकि मध्यम वर्ग बहुत विस्तृत श्रेणी है। साधारण क्लर्क से ले कर डॉक्टर, इंजीनियर तक सब अपने आप को मध्यम वर्ग में रखते हैं। इसलिये पूरे मध्यम वर्ग के बारे में कुछ भी निश्चित रूप से कहना मुश्किल है परन्तु फिर भी मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि आम तौर पर मध्यम वर्ग अपने आप को परिवेश के अनुकूल ढालने पर ज़्यादा ध्यान देता है उसे बदलने पर नहीं बल्कि समाज के बड़े हिस्से में न केवल सचेत सामाजिक परिवर्तन के प्रति निराशा है, अपितु इस की बात करने वालों को भी वे अविश्वास और शक की नज़र से देखते हैं।

आम जनता अगर अपने से हट कर कुछ करने की सोचती है तो ज्यादातर परोपकार, दान पुण्य और गरीब या असहाय की सहायता करने की सोचती है। ईमानदारी से किए इन प्रयासों के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। आपातकालीन सहारे के तौर पर ये आवश्यक हैं, विशेष तौर पर जब ये मेहनत से कमाए अपने पैसे से किए जाते हैं या अपना श्रमः और समय लगा कर किए जाते हैं। परन्तु परोपकार के ये काम सामाजिक सुधार का स्थान नहीं ले सकते। उदाहरण के लिए किसी गरीब लड़की के लिए दहेज जुटाने में सहायता करने का अपना महत्व है पर यह महिला समानता बिना दहेज के शादी की सामाजिक व्यवस्था बनाने का स्थान नहीं ले सकता।

इसी तरह समय निकाल कर पास-पड़ोस के बच्चों को पढ़ाना एक उपयोगी काम है, पर यह स्कूली शिक्षा में सुधार का स्थान नहीं ले सकता। संक्षेप में ईमानदारी और नेकनीयती से, अपनी कष्ट कमाई से किए गए परोपकार के काम, मदर टेरेसा सरीखे कामों को न नकारते हुये, ये कहना होगा कि ये नाकाफी हैं। ऐसे काम सामाजिक परिवर्तन का स्थान नहीं ले सकते। दूसरे शब्दों में समाज सेवा और सामाजिक परिवर्तन के काम के अंतर को समझना होगा। यह अंतर आम तौर पर समझा नहीं जाता। हरियाणा में तो कई बार उस व्यक्ति तक को बहुत सामाजिक कहा जाता है जो सब के यहाँ व्याह शादी और मृत्यु के अवसर पर जाता हो. भले ही वो कामचोर और भ्रष्ट हो।

कई लोग मनुष्य को सुधारने के चरित्र निर्माण के प्रयास करते हैं। स्कूली और युवाओं के शिविर लगा कर चरित्र निर्माण के प्रयास कई लोग करते हैं। सब लोग अपना आपा सुधार ले तो समाज अपने आप सुधर जाएगा इस कोशिश का सब से प्रचलित संदेश है वास्तविकता यह है कि हमारा जीवन कैसा होगा, यह हमारी अपनी कोशिश और हमारे परिवेश या परिस्थितियां, दोनों का मिलाजुला परिणाम होता है। हमारा जीवन इन दोनों में से किसी एक पर निर्भर नहीं करता। बहुत से मेहनती और होशियार बच्चों को पिछड़ता हम रोज़ देखते हैं। बहुत बार नेक माँ-बाप की संतान बिल्कुल दूसरे रास्ते पर चलती है। दूसरी ओर अगर परिस्थितियां ही निर्णायक होती तो हम किसी गरीब या विकलांग बच्चे को सफल होते नहीं देखते। आपाधापी के इस माहौल में किसी को ईमानदार और निस्वार्थ काम करते नहीं पाते।

हमें अपने आप को तो सुधारना ही चाहिए, अपनी कथनी और करनी में अंतर न रखें पर केवल उस से काम नहीं होने वाला केवल ईमानदार होना काफी नहीं है, बेईमानी के खिलाफ लड़ना भी होगा। चरित्र निर्माण के माहौल में केवल अपनी या अपने परिवार की महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती। अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देने की कोशिश कर के आप यह सुनिश्चित नहीं कर सकते कि वो सही रास्ते पर ही चलेंगे। समाज का भी तो आप के बच्चों पर प्रभाव पड़ेगा। उनका चरित्र वो जो अपने आसपास होता देखते हैं, उस से भी तो प्रभावित होता है, केवल माँ-बाप और अध्यापकों के उपदेशों से नहीं। इस लिए ‘चरित्र निर्माण के साथ साथ सामाजिक परिवर्तन के प्रयास भी करने ही होंगे।

ऐसा नहीं है कि आम जनता के हित में सामाजिक परिवर्तन हेतु प्रयास होते ही नहीं। ऐसे प्रयास भी होते हैं। कई राजनैतिक-सामाजिक आन्दोलन और कई अन्य तरह की संस्थायें भी ऐसे प्रयास करती हैं। कई एनजीओ भी आम जनता के पक्ष में परिस्थितियों को बदलने का प्रयास करती है। जगह जगह बनते विखरते संगठन है परन्तु ऐसे प्रयास कुल मिला कर कम ही है और थोड़े से लोग ही इनमें शामिल होते हैं। आम जनता का बहुसंख्यक हिस्सा दी हुई परिस्थितियों में अपना जीवन चलाने का प्रयास करता है। भीड़ भरी बस में केवल अपनी सीट कानू करने की कोशिश करता है। कई बार लोग इन परिस्थितियों में अपने प्रयासों की नियंकता पहचानते भी है परन्तु अकेले अकेले अपने परिवेश को बदलने में अपने आप को अपंग पाते हैं।

परिणामः इस तरह के व्यवहार के परिणाम क्या हैं? आज मध्यम वर्ग के उच्च और संपन्न हिस्से भी संतुष्ट और सुरक्षित नहीं महसूस करते। उन्हें दो वक्त कि रोटी की चिंता भले ही न हो परन्तु शिक्षा, स्वास्थ्य, शादियों और मकान पर बढ़ते खर्चे, काम के बढ़ते घंटे, काम-धंधे और भविष्य की अस्थिरता, परस्पर अविश्वास, उन्हें असुरक्षित और असंतुष्ट बनाते हैं। उनके जीवन में, आम तौर पर, कहीं पर भी, न परिवार में न पड़ोस में और न दफ्तर में, भरोसे लायक सम्बन्ध हैं। उनका न सरकार में भरोसा है और न यहाँ के प्राइवेट सेक्टर में उनमें से बहुत से तो इस देश में रहना भी नहीं चाहते। इन से नीचे का एक तबका भूखा तो नहीं रहता परन्तु आर्थिक रूप से सुरक्षित भी नहीं है। इस तबके की बाकी उपरोक्त दिक्कतें तो हैं ही। फिर बहुत बड़ी तादाद उस तबके की है जिसके पास तो रोटी की सुरक्षा भी नहीं है। भुखमरी है, बदबूदार झोपड़ पट्टी में या खुली सड़क पर उसका निवास है। छोटी मोटी बीमारी के इलाज के पैसे भी नहीं हैं। भय, हिंसा, शोषण, भेदभाव और विस्थापन भी झेलना पड़ता है। कुल मिला कर कह सकते हैं कि जब समाज कि ऊँची पादानों पर खड़े लोग, भी देश छोड़ने कि इच्छा रखते हों तो स्पष्ट है कि हालात अच्छे नहीं हैं।

जाहिर है इन परिस्थितियों को इस सामाजिक परिवेश को बदलने के प्रयास करने होंगे वरना मुक्ति नहीं है। भीड़ भरी बस में सीट कब्जाने के प्रयास के साथ बसों की संख्या बढ़ाने की कोशिश भी करनी होगी, अपने खेत की बाडबंदी करने के साथ साथ आवारा पशुओं की भी इलाज सोचना होगा बुनियादी समस्या का चाहे वर्तमान सामाजिक परिवेश में अपनी स्थिति मजबूत करने के हम कितने ही प्रयास कर लें, व्यापक असुरक्षा के माहौल में व्यक्तिगत सुरक्षा अपवाद ही हो सकती है, घटते रोजगार के अवसरों के चलते बेरोजगारी और बेकारी से बचना बहुत मुश्किल है, महिलाओं के प्रति सामाजिक रवैये के चलते अपनी, अपनी बहन बेटी की सुरक्षा सुनिश्चित करना और भेदभाव रहित माहौल देना आम तौर पर संभव नहीं होता और अब तो शुद्ध हवा, पानी और भोजन भी दुर्लभ हो रहा है। बहुत बार हमें केवल अपनी समस्याओं और दिक्कतों का एहसास होता है, पर थोड़ा विचार करने पर पाएंगे कि समस्या कहीं व्यापक है, सब की भले ही न हो पर अधिकांश की है। अगर समस्या अकेले की नहीं है तो निदान भी अकेले न हो कर सामूहिक प्रयासों से होगा। सामूहिक प्रयास मतलब परिवेश को बदलने के प्रयास, वर्तमान परिवेश में अपनी जगह बनाने का प्रयास, मतलब व्यक्तिगत प्रयास।

हालांकि मौजूदा परिस्थितियों और परिवेश में भी अपने लिए। जगह बनाने के प्रयास भी करने पड़ते हैं, बस में सीट कब्जाने की कोशिश करनी ही पड़ती है, आखिर जिंदा रहने की, रोजमर्रा के जीवन की अपनी बन्दिशें होती हैं जो निभानी पड़ती हैं, पर केवल इन तक सीमित न रह कर परिवेश बदलने के प्रयास भी करने होंगे। पूरा न सही थोड़ा समय और ऊर्जा इस काम में भी लगानी होगी और लोग लगाते हैं। चाहे प्रतिशत में कम हो पर उनकी संख्या भी हजारों-लाखों में है जो बिना सामाजिक परिवेश को बदले, व्यक्तिगत प्रयासों की सीमाओं को भी पहचानते हैं और सामाजिक परिवर्तन के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। (इन परिवर्तनकामी लोगों को ऊपर की बाले अनावश्यक लग सकती हैं पर यह आलेख आम आदमी औरत को भी मुखातिब है केवल परिवर्तनकामी लोगों. को नहीं, इस लिए ऐसी बाते भी जरूरी हैं।

आगे भी इस आलेख में कुछ ऐसे हिस्से होंगे, जो मुख्य तौर पर परिवर्तनकामी लोगों को मुखातिब होंगे और कुछ हिस्से आमजन को दोनों तरह के पाठक दोनों तरह के हिस्से पढ़ें तो बहुत अच्छा होगा, नहीं तो अपनी पसंद से कुछ हिस्से पढ़ सकते हैं और कुछ हिस्से छोड़ सकते हैं। इसी तरह इस लेख के कुछ पाठक उच्च शिक्षित वर्ग से हो सकते हैं और कुछ ऐसे भी होंगे जो स्कूल से आगे न पढ़ पाएँ हो। भाषा और शैली में दोनों तरह को ध्यान रखने की कोशिश की है। इस लिए किसी को कोई अंश और किसी को कोई और वाक्य अटपटा लग सकता है।) बाकी लोगों को भी इन प्रयासों से जुड़ना होगा, पूरी नहीं तो कम से कम अपनी कुछ ऊर्जा और समय परिवेश बदलने में लगानी होगी। पर समाज को क्या दिशा देने की कोशिश करें? सामाजिक परिवर्तन के किस प्रयास से जुड़े, सामाजिक परिवर्तन की कौन से राह गलत है और कौन सी सही? यह सवाल मुश्किल है परन्तु इसका जवाब ढूँढना आवश्यक हैं। बाकी के इस आलेख में यही प्रयास किया गया है।

अवकाश प्राप्त प्रोफेसर राजेंद्र चौधरी, प्रमुख अर्थशास्त्री, एम. डी. यूनिवर्सिटी, रोहतक हरियाणा के अर्थशास्त्र विभाग के पूर्व प्राध्यापक एवं संप्रति कुदरती खेती अभियान, हरियाणा के सलाहकार हैं।

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One thought on “सामाजिक परिवर्तन : समाज और अपने परिवेश के बारे में दो नज़रिये”
  1. अच्छा आलेख.बहुत अच्छे शब्दों में व्यक्तिगत और सामाजिक प्रयासों को समझने की कोशिश की गई है .
    सार्थक परिणाम की दिशा में दोनों का अपना महत्व है . प्रस्तुत आलेख में कई क महत्वपूर्ण अर्थशास्त्रीय और सामाजिक सिद्धांत यहां समाहित है. बहुत-बहुत धन्यवाद एक अच्छे आलेख के लिए

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