ललित मौर्या

नागालैंड विश्वविद्यालय से जुड़े वैज्ञानिकों के नेतृत्व में किए अध्ययन से पता चला कि शरीर की रक्षा करने वाली मैक्रोफेज कोशिकाएं कैसे हालात बदलने पर कैंसर के फैलाव में मददगार बन जाती हैं। स्तन कैंसर, जो हर साल दुनियाभर में लाखों महिलाओं की जान ले रहा है, शरीर में उसके फैलाव के पीछे छिपी एक बड़ी जैविक साजिश को भारतीय वैज्ञानिकों ने उजागर किया है।

भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा किए नए अध्ययन में सामने आया है कि कैसे हालात बदलने पर शरीर की रक्षा करने वाली प्रतिरक्षा कोशिकाएं ही कैंसर की सबसे बड़ी सहयोगी बन जाती हैं। नागालैंड विश्वविद्यालय के नेतृत्व में देश के प्रमुख शोध संस्थानों के वैज्ञानिकों ने स्तन कैंसर की शुरुआत और उसके फैलाव (मेटास्टेसिस) में ट्यूमर माइक्रोएनवायरमेंट यानी कैंसर के आसपास मौजूद कोशिकीय वातावरण की भूमिका का विस्तार से विश्लेषण किया है। यह शोध इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि स्तन कैंसर न केवल महिलाओं में सबसे अधिक सामने आने वाला कैंसर है, बल्कि महिलाओं में कैंसर से होने वाली कुल मौतों में करीब 15 फीसदी के लिए जिम्मेदार है। ऐसे में इसके पीछे के जैविक तंत्र को समझना और उपचार की नई रणनीतियां विकसित करना बेहद जरूरी हो जाता है। चिंता की बात है कि दुनिया भर में कैंसर तेजी से पैर पसार रहा है। महिलाओं में देखें तो स्तन कैंसर की समस्या बेहद आम है, जो हर साल लाखों जिंदगियों को निगल रही है।

यह बीमारी कितनी घातक है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसकी वजह से 2022 में 670,000 महिलाओं को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। अंतराष्ट्रीय जर्नल नेचर मेडिसिन में प्रकाशित एक अध्ययन में सामने आया है कि 2022 में दुनिया भर में स्तन कैंसर के 23 लाख नए मामले सामने आए थे। वहीं 670,000 महिलाएं इस बीमार से अपनी जिंदगी की जंग हार गई थी। मतलब की हर 20 में से एक महिला स्तन कैंसर का शिकार बन रही है। वहीं 70 में से एक महिला की मृत्यु जीवनकाल में इस बीमारी से हो सकती है।

कैंसर के आसपास की दुनिया और उसकी चाल

इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने ट्यूमर के माइक्रोएनवायरमेंट पर ध्यान दिया है। यह एक ऐसा जीवंत कोशिकीय तंत्र होता है जो कैंसर के बढ़ने या रुकने में निर्णायक भूमिका निभाता है। खासतौर पर वैज्ञानिकों ने ट्यूमर से जुड़ी मैक्रोफेज नामक प्रतिरक्षा कोशिकाओं का अध्ययन किया है। आमतौर पर मैक्रोफेज शरीर की रक्षा करते हैं और हानिकारक कोशिकाओं को नष्ट करते हैं। लेकिन अध्ययन में सामने आया है कि जब यही कोशिकाएं एक खास रूप ‘एम2 फिनोटाइप’ में बदल जाती हैं, तो वे कैंसर को रोकने के बजाय उसका साथ देने लगती हैं। ये एम2 मैक्रोफेज कोशिकाएं ट्यूमर को बढ़ने, नई रक्त वाहिकाओं के निर्माण, ऊतक के पुनर्गठन, कैंसर कोशिकाओं के फैलाव और उन्हें अन्य अंगों तक पहुंचने में मदद करती हैं। इस अध्ययन का नेतृत्व नागालैंड विश्वविद्यालय से जुड़े शोधकर्ता प्रोफेसर रंजीत कुमार और डॉक्टर प्रणय पुंज पंकज तथा बनस्थली विश्वविद्यालय से जुड़ी शोधकर्ता अलीशा सिन्हा द्वारा किया गया। इस अध्ययन के नतीजे ‘ब्रैस्ट ग्लोबल जर्नल’ में प्रकाशित हुए हैं।

कैंसर कैसे करता है प्रतिरक्षा तंत्र का इस्तेमाल

वैश्विक स्तर पर प्रकाशित शोधों की व्यवस्थित समीक्षा के जरिए वैज्ञानिकों ने समझाया है कि कैसे आक्रामक स्तन कैंसर कोशिकाएं साइटोकाइन और केमोकिन जैसे संकेतों के जरिए मैक्रोफेज के व्यवहार को अपने पक्ष में मोड़ लेती हैं। इन संकेतों में कोलोनी-स्टिमुलेटिंग फैक्टर जैसी प्रक्रियाएं शामिल हैं, जो मैक्रोफेज को एम2 रूप में ढाल देती हैं। इसका नतीजा यह होता है कि कैंसर कोशिकाएं बनी रहती हैं और ट्यूमर को बढ़ावा देने वाली गतिविधियां तेज हो जाती हैं।

इलाज की नई उम्मीदें

शोधकर्ताओं का कहना है कि इन प्रतिरक्षा-संबंधी रास्तों को निशाना बनाकर भविष्य में नई और अधिक सटीक इम्यूनोथेरेपी विकसित की जा सकती है। प्रोफेसर रंजीत कुमार के मुताबिक, “यदि एम2 मैक्रोफेज के निर्माण को रोक दिया जाए या उन्हें दोबारा कैंसर-रोधी भूमिका में बदला जाए, तो स्तन कैंसर की बढ़ने और उसके प्रसार को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इससे मौजूदा उपचारों के साथ कम हानिकारक और अधिक प्रभावी विकल्प मिल सकते हैं।“

डॉक्टर प्रणय पुंज पंकज ने प्रेस विज्ञप्ति में कहा है कि अध्ययन में आगे के शोध की स्पष्ट रूपरेखा भी दी गई है। इसमें मैक्रोफेज के बदलते रूप से जुड़े आणविक संकेतकों की पहचान, कैंसर को बढ़ावा देने वाले प्रतिरक्षा संकेतों को रोकने वाली दवाओं का विकास, और व्यक्तिगत उपचार के लिए ट्यूमर के आसपास के वातावरण की जांच करने वाले उपकरण विकसित करना शामिल हैं। कुल मिलाकर यह अध्ययन दिखाता है कि स्तन कैंसर से लड़ाई सिर्फ ट्यूमर को निशाना बनाने तक सीमित नहीं रह सकती। कैंसर के आसपास मौजूद प्रतिरक्षा तंत्र को समझे बिना न तो सटीक इलाज संभव है और न ही बीमारी पर स्थाई नियंत्रण पाया जा सकता है। भारतीय वैज्ञानिकों की यह खोज स्तन कैंसर के इलाज में मील का पत्थर साबित हो सकती है।

       (‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )

Spread the information