ललित मौर्या
दो सदियों के आंकड़े गवाही देते हैं कि कुपोषण बच्चों की किस्मत नहीं, सही नीतियां, संवेदनशील नेतृत्व और समग्र विकास मिलकर उनकी पूरी जिंदगी की दिशा बदल सकते हैं। आज दुनिया में करीब 15 करोड़ बच्चे नाटेपन यानी स्टंटिंग से जूझ रहे हैं। लेकिन एक सदी पहले यही हाल उन देशों का था, जिन्हें आज हम विकसित, समृद्ध और स्वस्थ समाज के रूप में देखते हैं। मतलब कि ये देश भी कभी इस समस्या को झेल चुके हैं।

इतिहास गवाह है, कुपोषण किस्मत नहीं, इसे बदला जा सकता है। यह चौंकाने वाला खुलासा एक नई अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में हुआ है, जो दर्शाता है कि नाटेपन को दुनिया से खत्म करना न केवल संभव है, बल्कि इतिहास में यह पहले भी हो चुका है। लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस से जुड़े शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किए इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल बीएमजे ग्लोबल हेल्थ में प्रकाशित हुए हैं। ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, कुपोषण और अवरुद्ध विकास के कारण हर साल 10 लाख बच्चे अपनी पांचवीं वर्षगांठ से पहले ही दम तोड़ देते हैं। लेवल्स एंड ट्रेंड्स इन चाइल्ड मालन्यूट्रिशन 2023 नामक रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय बच्चों में भी नाटेपन की समस्या बेहद गंभीर है। आंकड़ों के मुताबिक देश में पांच वर्ष से कम उम्र के 31.7 फीसदी बच्चे नाटेपन (स्टंटिंग) का शिकार हैं।

15 करोड़ बच्चों का वर्तमान, 200 साल का इतिहास
गौरतलब है कि नाटापन यानी स्टंटिंग वह स्थिति है जब लंबे समय तक कुपोषण और बार-बार बीमार पड़ने के कारण बच्चे अपनी उम्र के हिसाब से पर्याप्त ऊंचाई को हासिल नहीं कर पाते और नाटे रह जाते हैं। यह सिर्फ कद का मामला नहीं, बल्कि उनके दिमागी विकास, पढ़ाई, काम करने की क्षमता और जीवन भर की सेहत से जुड़ा मुद्दा है। आंकड़ों के मुताबिक 2022 में दुनिया भर में करीब 14.81 करोड़ बच्चे नाटेपन से जूझ रहे थे। हालांकि 1985 में यह दर 47.2 थी, जो 2022 में घटकर 22.3 फीसदी रह गई है। हालांकि 1980 के दशक से पहले हालात कितने गंभीर थे, इसकी स्पष्ट तस्वीर उपलब्ध नहीं थी। इस कमी को दूर करने के लिए शोधकर्ताओं ने 900 से अधिक ऐतिहासिक अध्ययनों की समीक्षा की और 19वीं सदी की शुरुआत से लेकर आज तक 122 देशों में बच्चों की लंबाई के आंकड़ों को फिर से तैयार किया है।

आज के कमजोर देशों जैसे कभी अमीर देशों में भी थे हालात
अध्ययन में सामने आया कि आज के कई अमीर देश भी 20वीं सदी की शुरुआत में नाटेपन की बेहद ऊंची दर से जूझ रहे थे। यह दर करीब वैसी ही है जैसी आज कई कमजोर और मध्यम आय वाले देशों में देखी जा रही है।

नतीजों के मुताबिक पश्चिमी और दक्षिणी यूरोप में 1900 के आसपास नाटेपन की दरें आज दुनिया में दर्ज सबसे खराब स्तरों के करीब थीं। तेजी से होता शहरीकरण, गंदा पानी, खराब सफाई व्यवस्था और संक्रामक बीमारियां इसके मुख्य कारण थे। लेकिन जैसे-जैसे साफ पानी की उपलब्धता बढ़ी, स्वच्छता की आदतें सुधरीं और सार्वजनिक स्वास्थ्य उपाय मजबूत हुए, नाटेपन की दर तेजी से गिरने लगी। यह बदलाव उस दौर में भी हुआ, जब आधुनिक दवाएं और उन्नत स्वास्थ्य सेवाएं व्यापक रूप से उपलब्ध नहीं थीं।

जापान और दक्षिण कोरिया की प्रेरक कहानी
1900 के शुरुआती वर्षों में जापान और दक्षिण कोरिया में बच्चों में नाटेपन की दर 70 फीसदी से भी ज्यादा थी। लेकिन 1980 के दशक तक इन देशों ने इस समस्या को करीब-करीब पूरी तरह खत्म कर दिया। खासकर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान में स्टंटिंग घटने की रफ्तार दुनिया में दर्ज सबसे तेज गिरावटों में से एक रही। 1950 के दशक में जापान में प्रति व्यक्ति आय हर साल 8.2 फीसदी की दर से बढ़ी, इसके साथ ही औसत आयु में आठ साल की वृद्धि हुई। आहार में विविधता आई और पशु प्रोटीन की मात्रा बढ़ी। इन सभी बदलावों ने मिलकर बच्चों के स्वास्थ्य में बड़ा सुधार किया। 1900 से 1970 के बीच जन्म के समय शिशु के औसत वजन में 250 ग्राम की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह संकेत देता है कि मातृ स्वास्थ्य, पोषण और लैंगिक समानता में सुधार बच्चों की लंबाई और सेहत पर गहरा असर डालता है। इसीलिए शोधकर्ता कहते हैं कि नाटेपन की समस्या को खत्म करने के लिए केवल कुपोषण या केवल स्वच्छता पर काम करना काफी नहीं है। इसके लिए व्यापक और संतुलित विकास जरूरी है। शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है कि केवल भोजन या स्वच्छता पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। व्यापक आर्थिक विकास, स्वास्थ्य सुधार, बेहतर आहार और सामाजिक बदलाव, इन सभी ने मिलकर इतिहास में यह परिवर्तन संभव किया।

आनुवांशिक कारण नहीं, सामाजिक परिस्थितियां जिम्मेदार
अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि अलग-अलग देशों में लोगों की लंबाई में अंतर आनुवांशिक कारणों से होता है।लेकिन पूर्वी एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों में नाटेपन में आई तेज गिरावट बताती है कि आज के कमजोर और मध्यम आय वाले देशों में नाटेपन की ऊंची दरें महज किसी “जीन” का परिणाम नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियों का नतीजा हैं।

मौजूदा नीतियों के लिए बड़ा संदेश
अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता प्रोफेसर एरिक श्नाइडर का कहना है, “इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण सबक यह है कि आज के समृद्ध देश हमेशा से स्वस्थ और पोषित नहीं थे। कभी वहां भी बच्चों में नाटेपन की दर उतनी ही ऊंची थी जितनी आज कमजोर देशों में है और उन्होंने कुछ दशकों में इसे कम कर दिया। यह हमें याद दिलाता है कि आज भी बदलाव संभव है।” शोधकर्ताओं के अनुसार, नाटेपन को खत्म करने के लिए केवल पोषण योजनाएं या बुनियादी ढांचा ही काफी नहीं है। जरूरी है हर घर तक स्वच्छ पानी पहुंचे और सफाई व्यवस्था मजबूत हो। लोगों की रोजमर्रा की आदतों में स्वच्छता को शामिल किया जाए। सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली इतनी सशक्त हो कि हर बच्चे और हर परिवार तक समय पर इलाज और देखभाल पहुंच सके और सबसे बढ़कर, माओं के स्वास्थ्य और पोषण पर विशेष ध्यान दिया जाए, क्योंकि स्वस्थ मां ही स्वस्थ बचपन की नींव रखती है। चिंता की बात है कि आज भी करीब 15 करोड़ बच्चे नाटेपन से प्रभावित हैं। लेकिन इतिहास गवाह है कि जब समाज मिलकर प्रयास करता है, तो कुछ ही दशकों में तस्वीर बदल सकती है। यह अध्ययन सिर्फ अतीत का विश्लेषण नहीं, बल्कि भविष्य के लिए उम्मीद का दस्तावेज है। यह उन करोड़ों बच्चों के बेहतर भविष्य की उम्मीद है, जो सही पोषण और स्वस्थ बचपन के हकदार हैं।
(‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )
