डी एन एस आनंद

यह आजादी का 75 वां वर्ष है। यानी देश ने अपनी आजादी के करीब 74 वर्ष पूरे कर लिए। आजादी के 75 वें वर्ष में प्रवेश को केंद्र सरकार ने काफी महत्व दिया है तथा इसके उपलक्ष्य में देश भर में आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। देश विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम के अपने सपूतों को याद कर रहा है। ऐसे में यह जरूरी है कि हम विभिन्न क्षेत्रों में देश की कमजोरियों एवं उपलब्धियों की चर्चा करें, ताकि विगत खट्टे-मीठे अनुभवों से सबक लेकर भविष्य की यात्रा तय की जा सके।

स्वास्थ्य के क्षेत्र की दशा- दिशा
हाल ही में जारी नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार देश के 15 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के अस्पतालों में प्रति एक लाख की आबादी पर हॉस्पिटल बेड की संख्या 22 से भी कम है, जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 24 है। दरअसल देश के 707 जिला अस्पतालों में किए गए एक अध्ययन को रिपोर्ट का आधार बनाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार इस सूची के सबसे निचले पायदान पर झारखंड एवं बिहार है।


यदि तथ्यों पर गौर करें तो देश के जिला अस्पतालों में प्रति एक लाख की आबादी पर औसतन 24 बेड हैं। अब आंकड़ों में समझें तो देश के निम्नलिखित राज्यों में बेड की संख्या औसत से भी नीचे है। यह संख्या इस प्रकार है – मध्य प्रदेश – 20, छत्तीसगढ़ – 20, पश्चिम बंगाल – 19, गुजरात – 19, राजस्थान – 19, पंजाब – 18, असम – 18, महाराष्ट्र – 14, उत्तर प्रदेश – 13, झारखंड – 09, एवं बिहार – 06 । इस मामले में केंद्र शासित प्रदेशों की स्थिति निश्चय ही भिन्न है। उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि पुडुचेरी में एक लाख की आबादी पर 222 बेड हैं।

इसी प्रकार यह संख्या अंडमान-निकोबार में 200, लद्दाख में 150, अरुणाचल प्रदेश में 102 तथा दिल्ली में 59 है। ये आंकड़े अपनी कहानी खुद ही बयां कर रहे हैं।स्वभावत: इस स्थिति ने चिकित्सा क्षेत्र में निजीकरण को बढ़ावा दिया है। निजी अस्पताल का मंहगा इलाज आम आदमी की पहुंच से लगातार दूर होता जा रहा है। साथ ही निजी स्वास्थ्य सेवाओं में लूट एवं निर्मम दोहन का सिलसिला भी लगातार जारी है, जिसे सत्ता – व्यवस्था का प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष समर्थन एवं सहयोग हासिल है।

इस मामले में कहाँ खड़ा है झारखण्ड
झारखंड राज्य ने पिछले दिनों 15 नवंबर को अपना स्थापना दिवस मनाया। इस अवसर पर कार्यक्रम आयोजित किए गए तथा केंद्र एवं राज्य सरकारों ने कई घोषणाएं की। लेकिन झारखंड की सच्चाई किसी से छिपी नहीं है। खासकर स्वास्थ्य के क्षेत्र में यहां की स्थिति काफी बदतर है।
नीति आयोग के अनुसार भी झारखंड के अस्पतालों में प्रति एक लाख की आबादी पर हॉस्पिटल बेड की संख्या राष्ट्रीय औसत 24 के मुकाबले महज 9 है। अब डॉक्टरों की संख्या पर गौर करें तो झारखंड की करीब 3.50 करोड़ की आबादी पर महज 2300 सरकारी डॉक्टर हैं, जबकि चाहिए लगभग 12 हजार। स्वभावत: इसका काफी बुरा प्रभाव पड़ रहा है। हालात यह है कि डॉक्टरों की कमी के कारण राज्य में कई अस्पताल बन कर तैयार हैं, लेकिन वे शुरू नहीं हो पा रहे हैं।

कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र महज एक डॉक्टर के भरोसे चल रहे हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार झारखंड में कुल 203 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं, इनमें से 140 में महज एक एक डॉक्टर हैं, 14 में तीन तीन हैं तो 42 में दो दो डॉक्टर कार्यरत हैं। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 7 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में कोई डॉक्टर ही नहीं हैं। यही नहीं, लगभग एक सौ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बिना लैब तकनीशियन, 117 बिना फर्मासिस्ट तथा 55 बिना किसी महिला डॉक्टर के चल रहे हैं। यही नहीं, करीब 3500 अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सहिया तथा एएनएम के भरोसे चल रहे हैं।


इस क्रम में यदि राज्य के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों की स्थिति पर एक नजर डालें तो इसमें डॉक्टरों के 1903 पद सृजित हैं, उनमें से महज 859 डॉक्टर ही कार्यरत हैं। यानी करीब 1056 पद खाली हैं। इस स्थिति से निपटने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने एक नई योजना तैयार की है। इसके तहत अब यहां के डॉक्टरों को अपने अस्पताल के साथ साथ दूसरे अस्पतालों एवं चिकित्सा केन्द्रों की जिम्मेदारी भी दी जाएगी। यानी अब यहां के डॉक्टरों को एक साथ दो- तीन अस्पतालों में काम करना होगा। स्वास्थ्य विभाग ने उक्ताशय का निर्देश जारी कर दिया है। हालांकि झारखंड हेल्थ सर्विसेज एसोसिएशन (झासा ) ने इसका विरोध करते हुए कहा है कि यह इस गंभीर समस्या का समाधान नहीं है। निश्चय ही यह स्थिति कत्तई अच्छी नहीं है। आजादी के करीब 74 साल बाद भी देश की आबादी का काफी बड़ा हिस्सा अब भी न्यूनतम स्वास्थ्य सुविधाओं से भी वंचित है।

अब तक अधूरे हैं झारखण्ड वासियों के सपने 

झारखंड राज्य की स्थापना के लगभग दो दशक पूरे हो गए। झारखंड राज्य अब 21 वर्ष का युवा हो गया। लेकिन झारखंड वासियों की दशा नहीं सुधरी। झारखंड संविधान की पांचवीं अनुसूची में शामिल है। यहां करीब 26 प्रतिशत से अधिक आदिवासी आबादी है। यहां की जनजातीय आबादी को ध्यान में रखते हुए उनके लिए विशेष कानूनी प्रावधान भी किये गए। लेकिन न तो आजादी के 74 वर्षों के बाद भी झारखंड के निवासियों की दशा बदली न ही अलग झारखंड राज्य की स्थापना से यहां के लोगों के सपने पूरे हुए। संवैधानिक प्रावधानों एवं कानूनी व्यवस्था के बावजूद यहां के प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों की लूट का सिलसिला जारी है। स्थानीय आबादी विस्थापन एवं पलायन की पीड़ा झेलने के लिए मजबूर हैं। बंद होते सरकारी स्कूल, बदहाल अस्पताल, कुपोषण, पर्यावरण प्रदूषण अपनी कहानी खुद ही कह रहे हैं। यहां आदिवासी आबादी में स्कूली बच्चों की ड्रापआउट रेट बहुत ज्यादा है जबकि महिला शिक्षा की दर भी अपेक्षाकृत कम है।


अशिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली ने लोगों की सोच में पिछड़ापन एवं अंधविश्वास को बढ़ावा दिया है। डायन हत्या जैसे जघन्य कृत्य यहां 21 वीं सदी के मौजूदा ज्ञान विज्ञान के दौर में भी जारी हैं। बल्कि एक हद तक उसे सामाजिक स्वीकृति भी प्राप्त है। ऐसे में आजादी के 75 वें वर्ष को सरकारी स्तर पर अमृत महोत्सव मनाने की महज औपचारिकताएं पूरी नहीं हों, बल्कि यहां के हालात को सुधारने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं। इस मामले में राज्य सरकार की जिम्मेदारी भी कुछ कम नहीं है। उन्हें भी महज घोषणाएं करने अथवा चुनावी लाभ हानि को ध्यान में रखकर कोई कदम उठाने से अलग झारखंड एवं झारखंड के निवासियों की दशा बदलने के लिए ठोस कदम उठाना चाहिए।

डी एन एस आनंद

पत्रकार, विज्ञान संचारक, साइंस फार सोसायटी, झारखंड के महासचिव एवं वैज्ञानिक चेतना नेशनल साइंस वेब पोर्टल, जमशेदपुर के संपादक हैं 

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