ललित मौर्या

यह सिर्फ बीमारी या विकार नहीं, बल्कि ऐसा मौन संकट है जो परिवारों, रिश्तों और इंसानी जीवन की खुशियों को धीरे-धीरे निगल रहा है। कभी अकेलेपन का डर, कभी भविष्य की चिंता और कभी भीतर ही भीतर टूटते रिश्तों का दर्द—दुनिया भर में करोड़ों लोग हर दिन ऐसे मानसिक द्वंद्व से गुजर रहे हैं, जिन्हें अक्सर देखा नहीं जा सकता। लेकिन अब एक नई वैश्विक रिपोर्ट ने इस छिपे संकट की भयावह तस्वीर सामने रखी है।

प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल द लैंसेट में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक आज दुनिया में करीब 120 करोड़ लोग किसी न किसी मानसिक विकार का शिकार हैं। मतलब की दुनिया का हर सातवां इंसान इन समस्याओं से जूझ रहा है। चिंता की बात है कि पिछले 34 वर्षों में यह आंकड़ा बढ़कर दोगुणा हो चुका है। आपको जानकर हैरानी होगी कि मानसिक रोग अब दुनिया में विकलांगता और खराब स्वास्थ्य का सबसे बड़ा कारण बन चुके हैं। मतलब कि अब मानसिक बीमारियां इंसानी शरीर को कैंसर या दिल के दौरे से भी ज्यादा लाचार और अपंग बना रही हैं।

शरीर से ज्यादा ‘मन’ को लाचार बना रही हैं बीमारियां

यह आंकड़े इस बात का सबूत हैं कि दुनिया इस वक्त एक ऐसे अदृश्य दर्द से गुजर रही है, जो अंदर ही अंदर इंसानी चेतना को खोखला कर रहा है। सच कहें आज हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां तकनीक इंसानों को करीब तो ला रही है, लेकिन भीतर का अकेलापन और गहराता जा रहा है। इस स्टडी रिपोर्ट को इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्युएशन (आईएचएमई) और यूनिवर्सिटी ऑफ क्वींसलैंड से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा मिलकर तैयार किया गया है। यह स्टडी 1990 से 2023 के बीच 204 देशों और क्षेत्रों के आंकड़ों पर आधारित है और इसे मानसिक स्वास्थ्य पर अब तक का सबसे व्यापक विश्लेषण माना जा रहा है। इस अध्ययन में 12 प्रमुख मानसिक विकारों का विश्लेषण किया गया। इनमें चिंता संबंधी विकार (एंग्जायटी डिसऑर्डर) और अवसाद से जुड़े विकार (मेजर डिप्रेसिव डिसऑर्डर) शामिल थे। यह दुनिया भर में 304 बीमारियों और चोटों के बीच बीमारी के बोझ के लिहाज से क्रमशः 11वें और 15वें स्थान पर रहे।

युवा सपनों पर भारी पड़ता अवसाद

रिपोर्ट में पाया गया कि 15 से 19 साल के किशोरों और महिलाओं में मानसिक बीमारियों का बोझ सबसे ज्यादा है। मतलब कि जिन युवाओं की आंखों में सुनहरे सपने और उड़ने की चाह होनी चाहिए, वे दुनिया में सबसे ज्यादा मानसिक तनाव झेल रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह उम्र जीवन की दिशा तय करने वाली होती है, जहां शिक्षा, करियर और रिश्तों की नींव बनती है और इसी मोड़ पर अवसाद (डिप्रेशन) और एंग्जायटी युवाओं को अपनी गिरफ्त में ले रहे हैं। ऐसे में मानसिक तनाव युवाओं के भविष्य पर गहरा असर डाल सकता है। युवाओं के साथ-साथ हर उम्र की महिलाएं इस सामाजिक और मानसिक प्रताड़ना की मूक गवाह बनी हैं। आंकड़ों पर नजर डालें तो 2023 में दुनिया भर में करीब 62 करोड़ महिलाएं मानसिक विकारों से प्रभावित थीं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा करीब 55 करोड़ दर्ज किया गया। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) द्वारा जारी रिपोर्ट “मेन्टल हेल्थ ऑफ चिल्ड्रन एंड यंग पीपल” में भी सामने आया है कि दुनिया का हर सातवां बच्चा (दस से 19 वर्ष) अवसाद, बेचैनी जैसी मानसिक समस्याओं से जूझ रहा है।

क्यों पुरुषों से ज्यादा महिलाएं हो रही शिकार?

अगर हम इसके कारणों की तह में जाएं, तो महिलाओं में मानसिक बीमारियों का बोझ अधिक होने के पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण हो सकते हैं। उदाहरण के लिए महिलाओं के घरेलू हिंसा और यौन शोषण का शिकार होने का खतरा अधिक रहता है। इसके अलावा, बच्चों, बुजुर्गों और परिवार की देखभाल की अतिरिक्त जिम्मेदारियां भी अक्सर उन पर ही होती हैं। इसी तरह लैंगिक भेदभाव और सामाजिक असमानताएं भी महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डालती हैं। मानसिक विकार जीवन के हर चरण में लोगों को प्रभावित करते हैं, लेकिन उम्र के साथ उनकी प्रकृति और प्रभाव बदलते रहते हैं। बचपन के शुरुआती वर्षों में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर, अटेंशन-डेफिसिट/ हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (एडीएचडी), व्यवहार संबंधी विकार और बौद्धिक विकास से जुड़ी समस्याएं सबसे अधिक देखी जाती हैं। ये समस्याएं लड़कियों की तुलना में लड़कों में ज्यादा पाई जाती हैं। वहीं, जैसे-जैसे बच्चे किशोरावस्था में प्रवेश करते हैं, चिंता (एंग्जायटी) और अवसाद (डिप्रेशन) मानसिक स्वास्थ्य पर सबसे बड़ा बोझ बनकर उभरते हैं। अध्ययन के अनुसार, किशोरों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का बढ़ता प्रभाव एक गंभीर चिंता का विषय है।

 

महामारी के बाद बढ़ा मानसिक संकट: एंग्जायटी में 47 फीसदी का उछाल

रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले कुछ दशकों में चिंता (एंग्जायटी) और अवसाद (डिप्रेशन) मानसिक बीमारियों में सबसे तेजी से बढ़े हैं। कोविड-19 महामारी के बाद इनसे जुड़े मामलों में भारी उछाल देखा गया। नतीजे दर्शाते हैं कि 2019 के बाद से गंभीर अवसाद के मामलों में करीब 24 फीसदी और घबराहट, बेचैनी या चिंता संबंधी विकारों (मेजर डिप्रेशिव डिसऑर्डर) में 47 फीसदी से ज्यादा वृद्धि दर्ज की गई। वैज्ञानिकों का कहना है कि महामारी के दौरान बढ़ा तनाव, आर्थिक असुरक्षा, अकेलापन, हिंसा और सामाजिक संबंधों में कमी इसके बड़े कारण हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई)

17 करोड़ स्वस्थ जीवन वर्ष हुए बर्बाद

2023 में मानसिक विकारों के कारण दुनिया भर में 17.1 करोड़ से ज्यादा स्वस्थ जीवन वर्षों यानी डिसेबिलिटी-एडजस्टेड लाइफ ईयर्स का नुकसान हुआ। बता दें कि ‘डिसेबिलिटी-एडजस्टेड लाइफ ईयर्स’ किसी बीमारी से होने वाले कुल स्वास्थ्य नुकसान को मापने का एक पैमाना है। इसमें बीमारी या विकलांगता के साथ बिताए गए वर्षों के साथ-साथ समय से पहले हुई मौतों के कारण खोए गए जीवन वर्षों को भी शामिल किया जाता है। यह आंकड़ा बताता है कि लोग कितने साल बीमारी और खराब स्वास्थ्य के साथ जी रहे हैं। हैरान कर देने वाली बात है कि इसके साथ ही मानसिक बीमारियां वैश्विक स्तर पर बीमारी के कुल बोझ की पांचवीं सबसे बड़ी वजह बन गई हैं। रुझानों में यह भी सामने आया है कि मानसिक बीमारियों के कारण महिलाओं में 9.26 करोड़ स्वस्थ जीवन वर्षों का नुकसान हुआ है। वहीं पुरुषों में यह आंकड़ा 7.86 करोड़ दर्ज किया गया। यह स्पष्ट तौर पर दर्शाता है कि मानसिक विकारों का कुल बोझ महिलाओं पर कहीं अधिक है। आंकड़ों पर नजर डालें तो दुनिया भर में विकलांगता या बीमारी के साथ बिताए गए कुल वर्षों में 17 फीसदी से अधिक हिस्सा मानसिक विकारों का है। यानी हृदय रोग, कैंसर और हड्डी-मांसपेशियों की बीमारियों से भी ज्यादा असर मानसिक रोग डाल रहे हैं। यह दर्शाता है कि मानसिक बीमारियां न केवल बड़ी संख्या में लोगों को प्रभावित कर रही हैं, बल्कि उनका बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है और वे वैश्विक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुकी हैं। चौंकाने वाली बात यह भी है कि यह समस्या सिर्फ कमजोर या विकासशील देशों की नहीं है, बल्कि ऑस्ट्रेलिया और पश्चिमी यूरोप जैसे दुनिया के सबसे अमीर और विकसित इलाकों में भी मानसिक बीमारियों का भारी बोझ दर्ज किया गया है।

इलाज के नाम पर सिर्फ औपचारिकता

इस पूरी त्रासदी का सबसे स्याह पहलू इलाज के स्तर पर दिखने वाली गंभीर लापरवाही है। रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि मानसिक बीमारियों से जूझ रहे अधिकांश लोगों को सही इलाज नहीं मिल पा रहा। आपको जानकर हैरानी होगी कि दुनिया में गंभीर अवसाद से पीड़ित महज 9 फीसदी लोगों को ही न्यूनतम जरूरी उपचार मिल रहा है। करीब 90 देशों में तो स्थिति इतनी बदतर है कि महज पांच फीसदी मरीजों को भी ठीक से डॉक्टर या दवा नसीब नहीं हो रही। वहीं केवल कुछ मुट्ठी भर समृद्ध देशों, जैसे ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और नीदरलैंड में ही 30 फीसदी से अधिक मरीजों तक उपचार पहुंच पा रहा है। यह आंकड़े उपचार की उपलब्धता में मौजूद वैश्विक असमानता को भी दर्शाते हैं। यह एक ऐसी खाई है जिसे जल्द से जल्द पाटने की जरुरत है। अध्ययन में कहा गया है कि मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बढ़ाना अब वैश्विक प्राथमिकता बन चुका है, खासकर कमजोर और मध्यम आय वाले देशों के लिए तो यह बेहद जरुरी है। देखा जाए तो मानसिक संकट अब सिर्फ एक व्यक्तिगत या पारिवारिक समस्या नहीं रह गया। यह परिवारों को आर्थिक रूप से तोड़ रहा है, दफ्तरों में काम करने की क्षमता को घटा रहा है और स्वास्थ्य प्रणालियों पर भारी बोझ डाल रहा है।

क्या है समाधान

विशेषज्ञों का कहना है कि मानसिक स्वास्थ्य को अब किसी ‘टैबू’ या व्यक्तिगत कमजोरी के रूप में देखने का दौर समाप्त होना चाहिए। इसे एक गंभीर वैश्विक स्वास्थ्य संकट मानते हुए सरकारों को मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं और उपचार प्रणालियों में बड़े पैमाने पर निवेश करना होगा, ताकि हर जरूरतमंद तक समय पर सही इलाज पहुंच सके। ऐसे में यदि मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार और उन पर निवेश बढ़ाने के लिए तत्काल कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और गंभीर रूप ले सकता है तथा इसका सामाजिक और आर्थिक बोझ भी बढ़ेगा। 120 करोड़ लोगों की यह कहानी महज आंकड़ों की कहानी नहीं है। इसके पीछे अनगिनत ऐसे चेहरे हैं, जो हर दिन चुपचाप चिंता, अवसाद, अकेलेपन और असुरक्षा के बोझ तले जी रहे हैं। यह एक ऐसा संकट है जो अक्सर दिखाई नहीं देता, लेकिन भीतर ही भीतर लोगों के जीवन, रिश्तों और सपनों को प्रभावित करता रहता है। आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि मानसिक स्वास्थ्य संकट कितना बड़ा हो चुका है, बल्कि यह है कि दुनिया इसे एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती के रूप में कब स्वीकार करेगी। यदि मानसिक स्वास्थ्य को अब भी हाशिए का मुद्दा समझकर नजरअंदाज किया गया, तो इसका असर सिर्फ अस्पतालों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि घरों, स्कूलों, कार्यस्थलों और पूरे समाज में और गहराई से महसूस किया जाएगा। क्योंकि जब मन बीमार पड़ता है, तो उसका दर्द सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, उसकी आंच परिवारों, समुदायों और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचती है। ऐसे में समय की मांग है कि मानसिक स्वास्थ्य को उतनी ही प्राथमिकता और संवेदनशीलता दी जाए, जितनी किसी शारीरिक बीमारी को दी जाती है। आखिरकार, किसी भी स्वस्थ और मजबूत समाज की नींव स्वस्थ मन पर ही टिकी होती है।

       (‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )

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