17 मार्च 2022 को ऊर्जा मंत्री ने लोकसभा में कहा कि देश के बिजली घरों की कुल उत्पादन क्षमता 395.6 गीगावाट है। अधिकतम मांग केवल 203 गीगावाट रही है। मौजूदा संकट की वजह अचानक बढ़ी मांग को बताया गया। हालांकि, ये अधिकतम मांग 207.11 गीगावाट है। यानी, सरकार द्वारा बताई गई उत्पादन क्षमता 395.6 गीगावाट से काफी कम। इस संकट की एक बड़ी वजह बिजली कंपनियों का बकाया भी है। एक ओर बिजली वितरण कंपनियों ने बिजली उत्पादन कंपनियों के करोड़ों रुपये का भुगतान नहीं किया है। वहीं, दूसरी ओर बिजली उत्पादन कंपनियों का भी कोयला कंपनियों का करोड़ों का बकाया है। रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि ये बकाया करीब 1.23 ट्रिलियन रुपये तक का है।

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आखिर क्या है बिजली संकट की वजह?

भारत करीब 200 गीगावॉट बिजली यानी करीब 70% बिजली का उत्पादन कोयले से चलने वाले प्लांट्स से करता है, लेकिन इस समय ज्यादातर प्लांट्स बढ़ती हुई बिजली की मांग और कोयले की कमी की वजह से कम बिजली सप्लाई कर पा रहे हैं।

  • देश के कोयले से चलने वाले बिजली प्लांट्स के पास पिछले 9 सालों में सबसे कम कोयले का भंडार बचा है। यानी बिजली की डिमांड ज्यादा है, लेकिन कोयले की कमी की वजह से प्लांट्स जरूरत के मुताबिक बिजली का उत्पादन नहीं कर पा रहे हैं।
  • कोल इंडिया बिजली प्लांट्स के लिए रोजाना 16.4 लाख टन कोयले की सप्लाई कर रहा है, जबकि कोयले की मांग प्रतिदिन 22 लाख टन तक पहुंच गई है।
  • कोयले की खपत इस साल 8% बढ़ी है, लेकिन कोल इंडिया ने कोयले का उत्पादन नहीं बढ़ाया है। देश में कोयले का 80% उत्पादन कोल इंडिया ही करता है।
  • देश में पीक आवर में बिजली की डिमांड इस साल कोरोना महामारी की वजह से दो साल बाद बढ़ी है।
  • रॉयटर्स के मुताबिक, अप्रैल के पहले 27 दिनों में बिजली सप्लाई डिमांड से 1.88 अरब यूनिट यानी 1.6% कम रही। ये पिछले 6 वर्षों में किसी एक महीने में सबसे ज्यादा बिजली की कमी है।
  • देश में पिछले हफ्ते 62.3 करोड़ यूनिट बिजली की कमी हुई। यह पूरे मार्च महीने में हुई बिजली की कमी से भी ज्यादा है।
  • यही वजह है कि जम्मू-कश्मीर से लेकर आंध्र प्रदेश तक देश के लगभग हर हिस्से में 2-8 घंटे तक की बिजली कटौती झेलनी पड़ रही है।

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  • सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (CEA) के मुताबिक, देश के कोयले से चलने वाले 150 बिजली प्लांट्स में से 86 में कोयले का स्टॉक बेहद कम हो गया है। इन प्लांट्स के पास अपनी सामान्य जरूरतों का 25% स्टॉक ही बचा है।
  • इस समय देश भर में स्थित थर्मल बिजली प्लांट्स में 2.12 मिलियन टन कोयला उपलब्ध है, जोकि सामान्य स्तर 6.63 करोड़ टन से काफी कम है।
  • पिछले साल अक्टूबर में भी कोयले की कमी की वजह से बिजली संकट पैदा हुआ था, लेकिन इस बार ये संकट गर्मियों के महीने में पड़ने की वजह से और ज्यादा गहरा है।
  • बिजली संकट की एक और वजह कोयले की ढुलाई न हो पाना है। दरअसल, कोयला कंपनियों से बिजली प्लांट्स तक कोयला पहुंचाने के लिए रेलवे के पास पर्याप्त कोच नहीं थे।
  • बिजली संकट गहराने पर बिजली प्लांट्स तक कोयला ले जाने वाली ट्रेनों को रास्ता देने के लिए रेलवे ने ट्रेनों के 670 फेरे रद्द कर दिए हैं।
  • रेलवे बिजली प्लांट्स तक कोयला पहुंचाने के लिए 415 कोच उपलब्ध करवा रहा है। हर मालगाड़ी से करीब 3500 टन कोयला ले जाया जा सकता है।
  • कोयला ढुलाई में कमी के आरोपों के बीच रेलवे का कहना है कि उसने वित्त वर्ष 2022 में कोयले के ट्रांसपोर्टेशन में 11.1 करोड़ टन की बढ़ोतरी करते हुए 65.3 करोड़ टन कोयला ढोया। साथ ही रेलवे ने अप्रैल के पहले दो हफ्ते में कोयला ढोने वाले कोचों की संख्या को 380 से बढ़ाकर 415 कर दिया है।

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कोयला संकट कैसे गहराया?

इस संकट की एक और वजह है कोयले का आयात घटना। दुनिया के दूसरे सबसे बड़े कोयला आयातक भारत ने पिछले कुछ वर्षों से लगातार अपना आयात घटाने की कोशिश की है। लेकिन इस दौरान घरेलू कोयला सप्लायर्स ने उतनी ही तेजी से अपना उत्पादन बढ़ाया नहीं है। इससे सप्लाई गैप पैदा हुआ। अब इस गैप को सरकार चाहकर भी नहीं भर सकती क्योंकि रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से इंटरनेशनल मार्केट में कोयले की कीमत 400 डॉलर यानी 30 हजार रुपए प्रति टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं।

देश में कोयले के उत्पादन के अतिरिक्त सालाना करीब 20 करोड़ टन कोयला इंडोनेशिया, चीन और ऑस्ट्रेलिया से आयात होता है। लेकिन अक्टूबर 2021 के बाद इन देशों से आयात घटना शुरू हो गया और अब भी इन देशों से आयात पूरी तरह प्रभावित है। इसका नतीजा ये हुआ कि बिजली कंपनियां कोयले के लिए अब पूरी तरह कोल इंडिया पर ही निर्भर हो गईं।

इस संकट की एक और प्रमुख वजह ये है कि राज्यों ने कोल इंडिया को जरूरत से एक महीने पहले कोयले की मांग ही नहीं भेजी। साथ ही कई राज्यों ने निर्धारित समय पर कोयले का उठाव भी नहीं किया। गर्मी बढ़ने से बिजली की खपत भी तेजी से बढ़ी और कोयला कम पड़ने लगा और अचानक बिजली संकट खड़ा हो गया। इस संकट के अगले दो महीने तक बने रहने की आशंका है।

दरअसल, राज्यों का कोल इंडिया के साथ सालाना करार होता है। इसी के अनुसार हर राज्य को हर महीने निर्धारित कोयले का उठाव करना होता है। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। कई राज्यों पर तो कोयले का उठान नहीं करने के लिए कोल इंडिया ने जुर्माना भी लगाया। सभी राज्य आने वाले 3-4 महीनों में कोयले की आवश्यकता का आकलन करने में चूक गए।

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गर्मी ने कैसे गहरा किया बिजली संकट?

आमतौर पर मॉनसून में कोयले की कमी होना सामान्य बात है, क्योंकि बारिश की वजह से कोयला खनन प्रभावित होता है। इस बार हीट वेव बढ़ने से गर्मी में ही कोयले की कमी हो गई है, क्योंकि तेज गर्मी से भी खनन कम हो पाता है।

इस साल अप्रैल में राजधानी दिल्ली में सबसे ज्यादा गर्मी का पिछले 72 सालों का रिकॉर्ड टूट गया है। 11 अप्रैल को ही दिल्ली में तापमान 42.6 डिग्री तक पहुंच गया था।

बढ़ते हुए तापमान को बिजली संकट की प्रमुख वजह माना जा रहा है। अप्रैल में ही राजस्थान के चुरू का तापमान 50 डिग्री तक पहुंच गया है, जबकि आमतौर पर इस समय वहां इतना तापमान नहीं होता है।

बढ़ते तापमान से बिजली की मांग बढ़ी है और ज्यादा बिजली पैदा करने के लिए कोयले की जरूरत भी बढ़ी है।

एक और सबसे बड़ी समस्या है, कोल पावर प्लांट्स में गर्मी की वजह से पानी की कमी। यानी अगर बिजली प्लांट्स के पास पर्याप्त कोयला हो तो भी पानी की कमी की वजह से बिजली का उत्पादन कम ही हो पाएगा। इससे पहले 2015 में बिजली प्लांट्स ऐसे ही संकट से गुजर चुके हैं।

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आगे कितनी और बिजली कटौती होने की संभावना है?

इस समय उत्तर प्रदेश, पंजाब, महाराष्ट्र, हरियाणा, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के लोग सबसे ज्यादा बिजली कटौती का सामना कर रहे हैं।

  • बिजली की कमी का सामना कर रहे 12 राज्यों में से आंध्र प्रदेश की स्थिति सबसे खराब है। आंध्र ने इंडस्ट्रियल सप्लाई में 50% की कमी की है और डोमेस्टिक यूजर्स के लिए बड़े पैमाने पर बिजली कटौती की है।
  • गुजरात ने 500 मेगावॉट की कमी को पूरा करने के लिए इंडस्ट्री को हफ्ते में एक बार बंद रखने को कहा है। महाराष्ट्र पिछले 2-3 हफ्तों से औसतन 3,000 मेगावॉट से अधिक की कमी का सामना कर रहा है। इसके लिए उसने बिजली उत्पादन करने वाली कंपनियों को जिम्मेदार बताया है।
  • साउथ एशिया के क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क के डायरेक्टर संजय वशिष्ठ बताते हैं कि हमें आगे और बिजली कटौती का सामना करना पड़ सकता है। कोयला एनर्जी की बढ़ती मांग को पूरा नहीं कर सकता। हम अपने प्रोडक्शन वाले एरिया को बिजली नहीं दे पाएंगे, जिससे प्रोडक्शन पर और असर पड़ेगा।
  • संजय कहते हैं कि हमने हमेशा कोयले को एनर्जी का एक विश्वसनीय स्रोत माना है, लेकिन पानी की कमी बढ़ती गर्मी के चलते कोयला भी हमारी पहुंच से दूर होता जा रहा है।
  • बिजली की मांग बढ़ने के कारण भारत में कोयले की भी बहुत ज्यादा कमी देखी जा रही है। गुरुवार यानी 28 अप्रैल को देश में बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर थी और अगले महीने यह 8% और बढ़ सकती है।

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क्या यह संकट कोयले की कमी से है या पेमेंट नहीं करने की सजा है ?

कोयला खनन कंपनियों से लेकर बिजली उत्पादन करने वाले प्लांट और बिजली डिस्ट्रीब्यूट करने वाली कंपनियों तक हर कोई बकाया भुगतान नहीं होने से जूझ रहा है।

  • सरकारी कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड यानी CIL दुनिया की टॉप कोयला उत्पादक कंपनियों में से एक है। देश में कोयले का 80% खनन कोल इंडिया ही करती है। CIL पर बिजली उत्पादन कंपनियों का लगभग 7918.72 करोड़ रुपये का बकाया है और फिर भी यह अपने कस्टमर्स को कोयला बेच रही है।
  • इसमें भी सबसे ज्यादा बकाया महाराष्ट्र की बिजली उत्पादन कंपनी MAHAGENCO का है। इस पर 2608.07 करोड़ रुपए का बकाया है।
  • वहीं पश्चिम बंगाल की WBPDCL पर 1066.40 करोड़ रुपए, झारखंड की TVNL पर 1018.22 करोड़ रुपए, तमिलनाडु की TANGEDCO पर 823.92 करोड़ रुपए और मध्य प्रदेश की MPPGCL पर 531.42 करोड़ रुपए है।
  • बिजली उत्पादक कंपनियों पर बिजली डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों यानी डिस्कॉम का 1.1 लाख करोड़ रुपये से अधिक का बकाया है और फिर भी वे उन्हें बिजली बेचना जारी रखे हुए हैं।
  • इसी तरह डिस्कॉम को 5 लाख करोड़ रुपये से अधिक का घाटा हुआ है। हालांकि इसके बावजूद भी उन्होंने बिजली डिस्ट्रिब्यूशन जारी रखा है।
  • ICRA सीनियर वाइस प्रेसिडेंट गिरिश कुमार कदम कहते हैं कि बकाया पेमेंट्स या पेमेंट्स में देरी के कारण कुछ विशेष कंपनियों के लिए कोयले की आपूर्ति में कमी आई है।
  • बिजली मंत्री आरके सिंह ने 28 अप्रैल को कहा था कि कुछ राज्यों में बिजली की कमी है, क्योंकि उत्पादन कंपनियों को भुगतान नहीं किया गया है।
  • सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी यानी CEA के अनुसार, 150 घरेलू कोयला वाली यूनिट्स में से 86 के पास काफी कम स्टॉक है जो उनकी सामान्य आवश्यकताओं के 25% से भी कम है।
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