दयानिधि
विश्व स्वास्थ्य संगठन के नए चर्चा पत्र में स्वास्थ्य नीति निर्माण में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की बढ़ती भूमिका, उससे जुड़े अवसरों, खतरों और प्रभावी शासन व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने हाल ही में एक नया चर्चा पत्र (डिस्कशन पेपर) जारी किया है, जिसमें बताया गया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) स्वास्थ्य नीति निर्माण की प्रक्रिया को किस तरह प्रभावित कर रही है। अब तक एआई पर होने वाली अधिकांश चर्चा अस्पतालों, डॉक्टरों और मरीजों की देखभाल तक सीमित रही है। लेकिन डब्ल्यूएचओ का कहना है कि एआई का प्रभाव केवल चिकित्सा सेवाओं तक नहीं है, बल्कि यह उन नीतियों को भी प्रभावित कर रहा है जिनके आधार पर स्वास्थ्य संबंधी फैसले लिए जाते हैं। डब्ल्यूएचओ के अधिकारियों के अनुसार, यह जरूरी है कि देशों के पास ऐसा ढांचा हो जो स्वास्थ्य नीति के पूरे चक्र में एआई के उपयोग को सही दिशा दे सके। इसी उद्देश्य से यह चर्चा पत्र तैयार किया गया है।

नीति निर्माण के हर चरण में एआई की भूमिका
डब्ल्यूएचओ ने अपने अध्ययन में स्वास्थ्य नीति निर्माण को तीन प्रमुख चरणों में बांटा है। पहला चरण समस्या को समझने का है। इस स्तर पर एआई बड़ी मात्रा में उपलब्ध आंकड़ों का विश्लेषण कर सकता है और स्वास्थ्य संबंधी नई चुनौतियों की पहचान करने में मदद कर सकता है। दूसरा चरण समाधान तैयार करने का है। एआई विभिन्न विकल्पों का अध्ययन कर सकता है और यह अनुमान लगा सकता है कि कौन-सी नीति अधिक प्रभावी साबित हो सकती है। इससे नीति निर्माताओं को बेहतर निर्णय लेने में सहायता मिल सकती है। तीसरा चरण नीति को लागू करने, उसकी निगरानी करने और आवश्यक सुधार करने का है। एआई वास्तविक समय में जानकारी जुटाकर यह बता सकता है कि कोई नीति अपेक्षित परिणाम दे रही है या नहीं।

अवसरों के साथ मौजूद हैं कई खतरे
डब्ल्यूएचओ का कहना है कि एआई कई लाभ प्रदान करता है, लेकिन इसके साथ कुछ गंभीर जोखिम भी जुड़े हुए हैं। यदि एआई को गलत या पक्षपाती आंकड़ों पर प्रशिक्षित किया गया है, तो वह समस्या की गलत तस्वीर पेश कर सकता है। इससे नीति निर्माण की शुरुआत ही गलत दिशा में हो सकती है। इसी तरह, एआई अक्सर उन बातों पर अधिक ध्यान देता है जिन्हें आसानी से मापा जा सकता है। इससे सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय पहलुओं की अनदेखी होने का खतरा रहता है। परिणामस्वरूप ऐसी नीतियां बन सकती हैं जो तकनीकी रूप से प्रभावी दिखें, लेकिन समाज के सभी वर्गों के लिए समान रूप से लाभकारी न हों।

‘एपिस्टेमिक अन्याय’ की चिंता
चर्चा पत्र में एक महत्वपूर्ण मुद्दे को भी उठाया गया है, जिसे “एपिस्टेमिक अन्याय” कहा गया है। इसका अर्थ है कि एआई आधारित प्रणालियां अक्सर केवल उन जानकारियों को महत्व देती हैं जो डिजिटल रूप में उपलब्ध हों या जिन्हें आंकड़ों में बदला जा सके। इसके कारण स्थानीय समुदायों के अनुभव, आदिवासी ज्ञान, लोगों की वास्तविक समस्याएं और जमीनी स्तर की समझ पीछे छूट सकती है। डब्ल्यूएचओ का मानना है कि नीति निर्माण में केवल आंकड़ों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। लोगों के अनुभव और स्थानीय परिस्थितियां भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।

मौजूदा ढांचों का उपयोग करने की सलाह
डब्ल्यूएचओ ने सुझाव दिया है कि देशों को एआई के लिए पूरी तरह नए नियम बनाने की आवश्यकता नहीं है। वे पहले से मौजूद नीति और नैतिक ढांचों का उपयोग कर सकते हैं। इनमें पारदर्शिता, जवाबदेही, मानव अधिकारों की रक्षा और जोखिम आधारित निगरानी जैसे सिद्धांत शामिल हैं। संगठन का कहना है कि एआई के उपयोग में जनता की भागीदारी और निर्णय प्रक्रिया की स्पष्टता बनाए रखना बेहद आवश्यक है। इससे लोगों का भरोसा भी कायम रहेगा।

इंसान की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण
चर्चा पत्र का सबसे प्रमुख संदेश यह है कि एआई को इंसानों की सहायता करने वाला उपकरण माना जाना चाहिए, न कि उनका विकल्प। अंतिम निर्णय हमेशा मनुष्यों के हाथ में रहना चाहिए। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, एआई बड़ी मात्रा में जानकारी का विश्लेषण कर सकता है, लेकिन किसी नीति के नैतिक, सामाजिक और मानवीय प्रभावों का आकलन करने की जिम्मेदारी इंसानों की ही होगी। इसलिए नीति निर्माण में मानव विवेक, अनुभव और विभिन्न समुदायों की भागीदारी को बनाए रखना आवश्यक है।

आगे की राह
डब्ल्यूएचओ का यह चर्चा पत्र सरकारों, शोधकर्ताओं, तकनीकी विशेषज्ञों और नागरिक समाज के बीच आगे की बातचीत के लिए एक आधार तैयार करता है। जैसे-जैसे एआई तकनीक विकसित होगी, वैसे-वैसे उसके उपयोग और नियंत्रण से जुड़े नए सवाल भी सामने आएंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि एआई का उपयोग सही नियमों और निगरानी के साथ किया जाए, तो यह स्वास्थ्य नीति निर्माण को अधिक प्रभावी, तेज और साक्ष्य-आधारित बना सकता है। लेकिन इसके लिए यह सुनिश्चित करना होगा कि तकनीक मानव निर्णय, पारदर्शिता और सामाजिक न्याय की जगह न ले, बल्कि उन्हें और मजबूत बनाए।
(‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )
