कम समय में अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए किसान खेतों में रसायनिक खाद का अंधाधुंध प्रयोग कर रहे हैं। रसायनिक खाद से पैदा होने वाली ये फसल सभी के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकती हैं। स्वामीनाथन आयोग से लेकर आईसीएआर के भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान, मोदीपुरम की हालिया सिफारशों में हरियाणा-पंजाब जैसे गहन कृषि के क्षेत्रों को जैविक खेती से दूर ही रखा जाता है। इस का सब से बड़ा कारण यह मान्यता रही है कि भले ही जैविक खेती टिकाऊ हो, जैविक उत्पादों की गुणवत्ता बेहतर हो एवं ये पर्यावरण के लिए सुरक्षित हों, पर जैविक खेती की उत्पादकता कम होती है। इस साल हरियाणा में जैविक विधि से बोए गए गेहूं ने रसायनिक उर्वरक से अधिक पैदावार दी है। रासायनिक गेहूं का उत्पादन प्रति बीघा साढ़े तीन से चार क्विंटल प्रति बीघा तक रहा है जबकि जैविक विधि से बोया गया गेहूूं एक बीघा में साढ़े चार से पांच क्विंटल तक निकल रहा है। जैविक खेती से कम लागत में भी अच्छी फसल होती है।

डाउन टू अर्थ में छपी रिपोर्ट के अनुसार हरियाणा, जो तथाकथित ‘हरित क्रांति’ के केंद्र में हैं। वहां के आत्मनिर्भर जैविक खेती करने वाले किसानों का अनुभव इसके विपरीत है। कुदरती खेती अभियान दवारा कोरोना काल में फ़ोन सर्वे में पाया गया कि रबी 2020 में हरियाणा के आत्मनिर्भर जैविक खेती करने वाले किसानों में से 45 फीसदी को राज्य की सब से महत्वपूर्ण फ़सल, गेहूँ में रसायनिक खेती की राज्य औसत से ज़्यादा पैदावार मिल रही है। इस लिए सर्वे के लिए गेहूं को ही चुना गया।। गेहूं में औसत से ज्यादा पैदावार एक-दो किसान नहीं अपितु 100 के करीब (98) किसानों ने हिस्सा लिया। इससे पहले 2019 के सर्वेक्षण में यह अनुपात ज्यादा था (60%) था हालाँकि ऐसे किसानों की कुल संख्या आधी थी।

मिलता है ज्यादा मूल्य
बाजार में गेहूं के दाम 1860 रुपये प्रति क्विंटल तक हैं। जैविक तरीके से पैदा हुआ गेहूं बाजार में 40 से 50 प्रतिशत अधिक रेट पर बिकता है। हालांकि तीन साल तक किसी खेत में रसायनिक खाद प्रयोग न करने पर किसान की फसल को पंजीकृत किया जाता है, लेकिन इस फसल को बेचने में किसानों को कोई समस्या नहीं होगी।

 

ऐसे होती है जैविक खेती
जिन किसानों ने जैविक विधि से गेहूं की खेती की थी उन्होंने खेतों में गोबर की खाद डाली थी। साथ ही खेतों में देशी गाय के मूत्र में गोबर, लहसुन, गुड़ का घोल बनाकर उसे दस दिन तक सड़ाकर स्प्रेकर किया था। इस स्प्रे से फसल में कोई रोग नहीं लगता व पोषक तत्वों की भी पूर्ति होती है। जिन किसानों के पास देशी गाय नहीं थी, उन्होंने अन्य नसलों की गाय के गोबर व मूत्र का ही प्रयोग किया।

क़ुदरती खेती अभियान का नजरिया भिन्न था। अभियान के पास किसानों को बाज़ार उपलब्ध कराने के संसाधन नहीं थे। किसी प्रोजेक्ट की तरह अभियान किसी सीमित क्षेत्र में सक्रिय न हो कर पूरे हरियाणा में काम करने का इच्छुक था। पूरे हरियाणा में फैले किसानों को बिक्री में सहायता करना संभव नहीं था। बिना बिक्री या आर्थिक सहायता के कोई किसान कम पैदावार के साथ खुद खाने के लिए तो जैविक खेती अपना सकता है पर बिक्री के लिए जैविक खेती तभी करेगा, जब पैदावार में गिरावट या तो न हो या बहुत कम हो जिस की भरपाई लागत में हुई कमी से हो जाए। अभियान दवारा जैविक खेती में उच्च पैदावार को लक्षित करने का एक अन्य बुनियादी कारण भी था। उच्च दाम पर कम पैदावार की जैविक खेती किसान के लिए तो लाभकारी हो सकती है पर कम पैदावार की कृषि पद्धति अर्थ शास्त्रीयों और नीति निर्धारकों को आकर्षित नहीं करेगी क्योंकि उन के लिए देश की अन्न सुरक्षा का मुद्दा महत्वपूर्ण है।

अब सभी फसलों पर स्प्रे
किसान पहले उत्पादन बढ़ाने में केवल गन्ने या सब्जी में ही रसायनों का स्प्रे करते थे। लेकिन अब किसान गेहूं, चारा आदि में भी रसायनों का स्प्रे कर रहे हैं। इससे फसलों में रसायन मिलने की स्थिति आगे चलकर भयावह हो सकती है।

जिन कारणों से कुदरती खेती अभियान बिक्री सहयोग न कर के केवल तकनीकी जानकारी उपलब्ध कराने तक सीमित रहा, उन्हीं कारणों से अभियान ने आत्मनिर्भर जैविक खेती या कुदरती खेती को अपनाने का निर्णय लिया। क्योंकि अभियान का कार्यक्षेत्र किसी एक सीमित इलाके तक महदूद नहीं था, इसलिए यह आवश्यक था कि अभियान उन जैविक तौर तरीकों को बढ़ावा दे जो एक अलग थलग पड़ा किसान भी अपना सके। अगर जैविक किसान को बाज़ार में उपलब्ध जैविक उर्वरकों या अन्य उत्पादों पर निर्भर रहना आवश्यक हो तो दूर दराज़ का अकेला किसान जैविक खेती नहीं कर सकता क्योंकि बाज़ार इक्का-दुक्का किसानों की ज़रूरतों की पूर्ती नहीं करता। प्रारम्भ से अभियान की रणनीति जैविक खेती के ऐसे उपाय अपनाने की थी जो एक आम किसान दवारा अपनाए जा सकें।

तथाकथित ‘हरित क्रांति’ के केंद्र में स्थित हरियाणा में जैविक खेती को मिली सफलता ने साबित कर दिया है कि जैविक खेती कुछ विशेष इलाकों, फ़सलों या उपभोक्ताओं के लिए नहीं बल्कि पूरे देश के लिए है। जैविक खेती की ओर किसानों को जोड़ने की मुहिम के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। जैविक विधि से बोई फसल का कोई जोड़ नहीं है। यह एकदम प्राकृतिक फसल की तरह है। इन फसलों का सेवन करने से किसी तरह की कोई बीमारी होने की संभावना नहीं रहती है।

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