प्रदीप कुमार शर्मा

देश को आजाद हुए 75 वर्ष बीत गए। इस उपलक्ष्य में देश भर में अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। पर 21 वीं सदी के, विज्ञान एवं तकनीक के, मौजूदा दौर में भी अकूत प्रकृतिक संपदा का स्वामी, झारखंड न सिर्फ भूख, कुपोषण पर्यावरण प्रदूषण का संकट झेल रहा है बल्कि डायन हत्या, अंधविश्वास के दुष्चक्र से भी यह अब तक बाहर नहीं निकल पाया है। डायन हत्या जैसी कुप्रथा को यहां के ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की मिल रही स्वीकृति चिंता पैदा करने वाली है। प्रस्तुत है झारखंड में मौजूद डायन प्रथा के बदसूरत चेहरे को सामने लाता प्रदीप कुमार शर्मा का यह महत्वपूर्ण आलेख।

आज के अति आधुनिक युग में बर्बरता युग की याद दिलाती डायन प्रथा मानव समाज को शर्मसार करती है. झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में डायन बिसाही के संदेह में लाचार और गरीब औरतें मारी जा रही है. पहले  उन्हें सरे आम नंगा करके पूरे गांव में घुमाया जाता है. पशु या मानव मल को जबरदस्ती खिलाया जाता है. उनके साथ बलात्कार किया जाता है. इतने से भी मन नहीं भरता.

उन्हें लाठी डंडों से मार मार कर जघन्य हत्या कर दी जाती है. और तो और हत्यारों के चेहरे पर जरा भी भय का भाव नहीं होता बल्कि क्रूरता की  हद तब हो जाती है जब गांव के लोग औरतों की हत्या के बाद तहकीकात कर रही पुलिस अधिकारियों के आमने सामने खड़े होकर कहते हैं कि नहीं मारते तो वे डायने पूरे गांव को खा जाती. कारण गांव के लोगो में शिक्षा का घोर अभाव है. झारखंड का सुदूर देहाती इलाका अंधविश्वास के बलिवेदी पर बैठा हुआ है.

गांव में किसी बच्चे, बड़े या युवा की बीमारी से मृत्यु होने पर उसका सारा दोष बेकसूर औरतों के सर पे मढ़ दिया जाता है. गांव में प्रचारित कर दिया जाता कि फलाने की औरत ने डाईन कर दी है जिसके कारण बच्चे की मौत हो गई. इस संदेह की पुष्टि के लिए गांव में पंचायत बैठाई जाती है जिसमें एक ओझा को बुलाया जाता है. उक्त ओझा बताता है कि गांव में कौन कौन सी औरतें डायन हैं. उसके चिंहित करने के बाद गांव के लोग एक एक कर उन औरतों को उनके घरों से जबरदस्ती घसीटकर बाहर निकालते हैं और गांव से बाहर ले जाकर उन्हें निर्वस्त्र घुमाया जाता है.

ऐसी क्रूरतम घटनाएं होना झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में आम बात हो गई है. डाईन बिसाही के संदेह में खासकर उन महिलाओं को निशाना बनाया जाता है जो कि देखने में उम्रदराज व कुरूप लगती हैं अथवा विधवा हैं. जिसके परिवार में कोई सदस्य उसके आगे पीछे नहीं है. जिसके पास संपत्ति के नाम पर कुछ बीघा जमीने हैं. पुलिस तफशीस से पता चलता है कि डायन के आरोप में मारी गई औरतों के पास काफी जमीने थी जिसपर रिश्तेदारों तथा गांव के दबंगों की नजरें लगी हुई थी.

पहले तो बहला फुसलाकर उनकी जमीने हड़पने की कोशिश की जाती हैं और जब सीधी उंगली से घी नहीं निकलता है तो उंगली टेढ़ी कर लेते हैं. अपनी दबंगई के बल पर गांव में इस तरह से अफवाह फैलाते हैं कि उसने खुद उस औरत को रात के अंधेरे में गांव से दूर पीपल पेड़ के नीचे बैठकर डाईन सीखते देखा है. ऐसे लोग अपने साथ वैसे लोगों को भी मिला लेते हैं जो उनकी हां में हां कर सके और फिर शुरू  होता  है बेबस और लाचार औरतों को सरेआम प्रताड़ित करने का कुत्सित खेल भरे समाज में निर्दोष औरत को डायन करार दे दिया जाता है. 

झारखंड के देहाती क्षेत्रों में जहां आज भी ठीक से आवागमन के साधन नहीं हैं वैसे इलाकों में डायन बिसाही की घटनाएं सबसे ज्यादा घटती हैं. डायन बिसाही का शिकार वैसी औरतें भी होती हैं जो दिखने में थोड़ा आकर्षक लगती हैं. उसे दबंग लोग अपनी हवस का शिकार बनाने के लिए तरह तरह से डोरे डालते हैं और जब अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाते तब बदला लेने के लिए उसे डायन बताकर मरवा दिया जाता है. उस औरत का दोष बस इतना था कि वह दिखने में आकर्षक थी.

झारखंड में किसी स्त्री का सुंदर होना. उसपर भी गरीब और अकेला होना उसके लिए अभिशाप है. बुरी नजरों से अपनी इज्जत बचाने के चक्कर में वह अपनी जान से हाथ धो बैठती है. पुलिस भी ऐसे मामलों में अकर्मण्यता दिखाती है. पहले जांच पड़ताल के नाम पर दो चार गिरफ्तारियां करती हैं. कुछ दिनों बाद मामला शांत हो जाने पर उसे ठंडे बस्ते में डाल देती है. अगर पीड़िता के परिवारवालों के तरफ से कोई क़ानूनी कार्रवाई होती है. मामला ऊपर तक जाता है. तब वे सक्रियता दिखाते हुए आरोपी को पकड़ते है.

सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में जहां पुलिस नहीं पहुंच पाती. अनगिनत ऐसी घटनाएं होती हैं. इसका जिक्र सरकारी रिकार्ड में नहीं आ पाता. दूसरा झारखंड का तमाम ग्रामीण इलाका नक्सल प्रभावित है जहां पुलिस जाने से कतराती है. इस तरह से साफ अभियुक्त बच जाते हैं. डायन बिसाही को हवा देने में खासकर ओझा गुणियों की भूमिका सबसे ज्यादा होती है. झारखंड के आदिवासियों में अंधविश्वास इस कदर हावी है कि किसी बच्चे अथवा जवान के मरने से उसका सीधा संबंध डायन बिसाही से जोड़कर देखने लगते हैं.

यहां के आदिवासियों में ओझा द्वारा झाड़ फूंक सबसे ज्यादा प्रचलित है. किसी बीमारी अथवा फोड़ा फुंसी होने पर ये डॉक्टर के पास नहीं जाते. इनके लिए गांव का ओझा ही डॉक्टर है. यहां के जनजातियों व पिछड़े इलाकों में ओझा गुणियों अथवा झोला छाप डाक्टरों की ही चलती है. इन क्षेत्रों में घोर गरीबी व अशिक्षा व्याप्त है. गरीबी के कारण माँ बाप अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेज पाते. जिंदगी भर अशिक्षित रह जाते हैं. इसी का नाजायज फायदा दबंग व ओझा गुणी उठाते हैं.

भुत प्रेत, डायन बिसाही या ऊपरी हवा का भय दिखाकर उसका निवारण के नाम पर खंसी, मुर्गा की बलि चढ़वाते हैं. फोकट का हंड़िया शराब पीते हैं.  उन्हें कर्ज के मकड़जाल में फंसाकर अपने मतलब का काम निकलवाते हैं. ये गुणियां गांव के टोलो में घुमते रहते हैं. झोला छाप डॉक्टर सुदूर देहात में अपना दुकान लगाकर बैठे रहते हैं. जैसे ही कोई मरीज इनके पास आता है. ये उन्हें पहले खूब डराते हैं. फिर उनका लम्बा ईलाज चलाने के नाम पर खुब पैसा वसूलते हैं. उन्हें पाई पाई को मोहताज कर देते हैं. जब मरीज पैसा देने की स्थिति में नहीं रहता. कर्ज से लद जाता है. ये लोग उनकी जमीन जायदाद हड़पने का खेल शुरू करते हैं. डायन बिसाही इनके इसी खेल का हिस्सा होता है. 

अंधविशवास का जड़ वहीं पनपता है जहां उसे उपयुक्त खाद पानी मिलता है. जहां गरीबी है. अशिक्षा है. वहीं ओझा गुणियों की पूछ है. मनोवैज्ञानिकों के अनुसार डायन एक प्रकार का मन में उपजा काल्पनिक भय है. डाईन बिसाही से सशंकित व्यक्ति एक तरह से मानसिक रोगी होता है जिसको खुद ही ईलाज की जरूरत होती है. चूँकि गांव में डॉक्टर नहीं मिलते इसलिए अशिक्षित व मूढ़ प्रवृति के लोग ओझा गुणियों का सहारा लेते हैं.

शातिर ओझा भी इसका भरपूर फायदा उठाता है. देहाती क्षेत्रों में इतनी जघन्य घटना के बाद भी किसी ग्रामीण व्यक्ति के चेहरे पर कोई दशहत के भाव नहीं होते बल्कि वे खुशी मनाते हैं कि उन्हें डायन के प्रकोप से छुटकारा मिल गया. डाईन बिसाही से छुटकारा दिलाने के लिए कुछ संस्थाओं का गठन हुआ भी लेकिन फिर भी ऐसी घटनाएं घट रही है. इसके लिए जरूरी है झारखंड के ग्रामीण इलाकों में जन जागरण अभियान चलाया जाना चाहिए. वैसे लोगों की पहचान की जानी चाहिए जो बहुत गरीब है. उसके पास जमीन जायदाद है. उसका देखभाल करने वाला कोई नहीं है. ऐसे लोगो को चिन्हित कर उनपर विशेष ध्यान रखना होगा. उन्हें मुख्य धारा में लाना होगा ताकि उसपर गलत निगाहें रखने वालों को तुरत पहचानकर सजा दिलाया जा सके.

नुक्कड़ नाटकों द्वारा ग्रामिणों को समझाया जाय. उन्हें बताया जाना चाहिए कि डाइन बिसाही मन का वहम है, यह एक अंध विश्वास है. किसी गरीब आदमी या औरत की जमीन हड़पने की चाल है. उन्हें पुर्व में हुए ऐसी घटनाओं का उदाहरण देकर समझाया जाना चाहिए. उन्हें बताया जाना चाहिए कि ओझा गुणी बीमारी का इलाज नहीं करता. वह चालाकी से  झाड़ फूंक के नाम पर सीधे सादे लोगों को फांस कर अपना अपना पेट पालता है. उन्हें वैज्ञानिक तरीके से बताया जाना चाहिए कि ऐसे लोग काला जादू दिखाकर ठगते हैं जो कि मात्र हाथ की सफाई है. ऐसा एक साधरण जादूगर भी दिखा सकता है. नुक्कड़ नाटक में कुछ ऐसे जादू का शो भी किया जाना चाहिए जो सीधे ग्रामीणों के मन को प्रभावित कर सके. उन्हें लगे कि सचमुच ओझा गुणी उन्हें ऐसे ही करके ठगता था. तब जाकर उनके विचारों में परिवर्तन आ सकता है.

गांवों में चलन्त चिकित्सा वाहन चलाया जाना चाहिए. उसमें डाक्टर, नर्स, कम्पांउडर के अलावा एक ऐसा व्यक्ति रहना चाहिए जो गांव में घूम घूमकर डाइन बिसाही के विरोध में दिवारों पर सचित्र पोस्टर लगाए, पम्पलेट बांटे ताकि ग्रामिण उसे देखकर अपनी आंखे खोल सके. चलन्त चिकित्सा वाहन का स्टाफ घर घर जाकर बीमार व्यक्ति का पता लगाए. उसका ईलाज करे. डॉक्टरी ईलाज का लाभ बताए. यह भी बताया जाय कि उन्हें सरकार के तरफ से फ्री ईलाज मुहैया होता है जिसका फायदा उन्हें लेना चाहिए. उनके साथ कदापि दुर्व्यवहार न करें. उनके साथ बैठकर बातें करें. उन्हें विश्वास में लें. उसके मन में बैठा वहम को दूर करने की कोशिश करे. तभी इसका निवारण हो सकेगा.  

झारखंड में पिछले 15 वर्षों में लगभग 1500 से अधिक महिलाओं की  डायन बताकर हत्या कर दी गई. झारखंड में लागू डायन बिसाही कानून के अंर्तगत किसी को सिर्फ डायन करार देने पर संबंधित व्यक्ति को 3 माह की सजा हो सकती है या 1000रू. का जुर्माना. डायन के नाम पर शारीरिक या मानसिक शोषण करने वालों को 6 माह की सजा या 2000रू. जुर्माना है. इस कार्य पर उकसाने वाले व्यक्ति को भी अधिनियम के अनुसार 3 महिने की सजा और 1000रू. का जुर्माना है.

इसके बावजूद झारखंड का कोई भी जिला आज इससे अछूता नहीं है. अशिक्षा और अंधविश्वास के कारण लोग अपनों की ही हत्या कर करा दे रहे हैं. 2015 से 2020 तक लगभग पूर्वी  व पश्चिमी सिंहभुम, राँची, गुमला, सिमडेगा, चतरा, हजारीबाग, गढ़वा, गिरिडीह व कोडरमा को मिलाकर डायन बिसाही की 4658 से ज्यादा घटनाएं घट चुकी हैं. ऐसी कुरीतियों को जड़ से खत्म करने के लिए समाज के पढ़े लिखे युवा वर्ग जिसमे डॉक्टर से लेकर शिक्षक तक हों. आगे आना होगा. इसे रोजगार की दृष्टि से भी देखा जा सकता है. जो लोग गांव से आज कटे हुए हैं. उनके लिए वहां भविष्य में अपार सम्भावनाएं हैं. सरकार द्वारा भी ऐसे लोगो को वहां काम करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए.  

चाहें तो युवा भी एडवेंचर के नाम पर एक टीम बनाकर सुदूर देहातों में जा सकते हैं. अशिक्षित गांव वालों को पढ़ने लिखने का महत्व बता सकते हैं. जन जागरूक अभियान चलाकर गांव वालों को निर्देश कर सकते हैं कि किसी भी तरह की बीमारी होने पर अस्पताल जाना चाहिए. डॉक्टर ईलाज करके दवा देगा. झाड़फूंक कराना खतरनाक है. उससे जान भी जा सकती है. इन्हीं कार्यक्रमों के द्वारा उनमें बदलाव होना सम्भव है अन्यथा वे ओझा गुणिओं के हाथों कत्ल होते रहेंगे.  

प्रदीप कुमार शर्मा

 

 

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