दयानिधि

एआई आधारित मैमोग्राम तकनीक से अब स्तन कैंसर के पांच साल के खतरे का अनुमान लगाकर शुरुआती पहचान और उपचार संभव। नेशनल कॉम्प्रिहेंसिव कैंसर नेटवर्क (एनसीसीएन) ने 2026 के लिए स्तन कैंसर की जांच और उपचार से जुड़े अपने दिशा-निर्देशों में एक बड़ा बदलाव किया है। अब इन नए दिशा-निर्देशों में इमेज-आधारित आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को एक महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में शामिल किया गया है। इसका मतलब है कि अब साधारण मैमोग्राम से ही भविष्य में स्तन कैंसर होने के खतरे का अनुमान लगाया जा सकता है।

क्या है नया बदलाव

पहले स्तन कैंसर के खतरे को जानने के लिए डॉक्टर परिवार के इतिहास, जेनेटिक जानकारी और मरीज से जुड़े सवालों पर निर्भर रहते थे। लेकिन अब एआई तकनीक सीधे मैमोग्राम की तस्वीरों का विश्लेषण करके यह बता सकती है कि अगले पांच साल में कैंसर होने का कितना खतरा है। नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, यदि किसी महिला में पांच साल का खतरा 1.7 फीसदी या उससे अधिक है, तो उसे “उच्च जोखिम” वाले समूह में रखा जाएगा। यह खतरा एआई द्वारा मैमोग्राम की तस्वीरों के आधार पर तय किया जाता है।

एआई कैसे काम करता है?

एआई मॉडल मैमोग्राम की तस्वीरों के हर छोटे हिस्से को बहुत गहराई से जांचता है। यह उन सूक्ष्म बदलावों को भी पहचान सकता है जो इंसानी आंखों से दिखाई नहीं देते। इन बदलावों के आधार पर एआई यह अनुमान लगाता है कि भविष्य में कैंसर होने की संभावना कितनी है। सबसे खास बात यह है कि इस तकनीक को किसी अतिरिक्त टेस्ट की जरूरत नहीं होती। जो मैमोग्राम पहले से किया जा रहा है, उसी से यह जानकारी मिल जाती है।

क्यों महत्वपूर्ण है?

अब तक कई महिलाएं ऐसी थीं जिनमें न तो परिवार में कैंसर का इतिहास था और न ही कोई जेनेटिक समस्या, फिर भी उन्हें स्तन कैंसर हो जाता था। ऐसे मामलों को “स्पोराडिक” कैंसर कहा जाता है और यह लगभग 85 फीसदी मामलों में देखा जाता है। एआई आधारित जांच इस समस्या को हल करने में मदद करती है क्योंकि यह केवल व्यक्ति की जानकारी पर नहीं, बल्कि शरीर के अंदर मौजूद पैटर्न पर ध्यान देती है। इससे उन महिलाओं की पहचान भी संभव हो जाती है जो पहले सामान्य मानी जाती थीं।

इलाज और जांच में बदलाव

नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, अगर किसी महिला को उच्च जोखिम वाला पाया जाता है, तो डॉक्टर कुछ अतिरिक्त कदम उठा सकते हैं। इसमें एमआरआई या अल्ट्रासाउंड जैसी अतिरिक्त जांच शामिल हो सकती है। साथ ही, डॉक्टर खतरे को कम करने के लिए दवाइयों या जीवनशैली में बदलाव की सलाह भी दे सकते हैं। एक और महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि अब खतरे की पहचान 40 साल की उम्र के बजाय 35 साल से ही शुरू की जा सकती है। इससे बीमारी को पहले ही पकड़ने में मदद मिल सकती है।

शोध और परीक्षण के परिणाम

एआई मॉडल की उपयोगिता को साबित करने के लिए बड़े स्तर पर अध्ययन किए गए हैं। एक अध्ययन में लाखों मैमोग्राम की जांच की गई और पाया गया कि जिन महिलाओं को एआई ने भारी खतरे में रखा, उनमें अगले पांच साल में कैंसर होने की आशंका काफी ज्यादा थी। यह भी देखा गया कि केवल स्तन की घनत्व के आधार पर खतरे का अनुमान उतना सटीक नहीं था जितना एआई द्वारा किया गया विश्लेषण।

आगे की दिशा

हालांकि यह तकनीक काफी प्रभावशाली है, फिर भी इसके ऊपर और शोध चल रहा है। वैज्ञानिक यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या एआई के आधार पर किए गए बदलाव वास्तव में मरीजों की जिंदगी बचाने में मदद करते हैं। भविष्य में यह संभव है कि हर महिला का मैमोग्राम सिर्फ जांच का साधन न होकर, एक भविष्यवाणी करने वाला उपकरण बन जाए। एआई आधारित स्तन कैंसर जोखिम मूल्यांकन चिकित्सा क्षेत्र में एक नई दिशा दिखाता है। यह तकनीक न केवल बीमारी का जल्दी पता लगाने में मदद कर सकती है, बल्कि हर व्यक्ति के लिए व्यक्तिगत इलाज का रास्ता भी खोलती है। हालांकि अभी और शोध की जरूरत है, लेकिन यह बदलाव स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सटीक और प्रभावी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

       (‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )

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