ललित मौर्य

पिछले 453 महीनों में कोई भी महीना ऐसा नहीं रहा जब तापमान सामान्य से नीचे दर्ज किया गया हो। यह स्पष्ट तौर पर बदलती जलवायु और वैश्विक तापमान में होती वृद्धि को इंगित करता है. सितम्बर 2022 के साथ जलवायु इतिहास में एक और नया रिकॉर्ड दर्ज हो गया जब पांचवा सबसे गर्म सितम्बर का महीना इस साल दर्ज किया गया। देखा जाए तो इस साल सितम्बर के महीने का तापमान सामान्य से 0.88 डिग्री सेल्सियस ज्यादा दर्ज किया गया। यहां औसत तापमान की गणना 20वीं सदी के औसत तापमान के आधार पर की गई है जोकि 15 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया है।

गौरतलब है कि इससे पहले वर्ष 2021 में भी सितम्बर के महीने का औसत तापमान सामान्य से 0.88 डिग्री सेल्सियस ज्यादा दर्ज किया गया था। देखा जाए तो यह लगातार 46वां सितम्बर का महीना है जब तापमान सामान्य से ज्यादा दर्ज किया गया है। इसी तरह पिछले 453 महीनों में कोई भी महीना ऐसा नहीं रहा जब तापमान सामान्य से नीचे दर्ज किया गया हो।

यह स्पष्ट तौर पर बदलती जलवायु और वैश्विक तापमान में होती वृद्धि को इंगित करता है। यह जानकारी नेशनल ओसेनिक एंड एटमोस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) के नेशनल सेंटर फॉर एनवायर्नमेंटल इंफॉर्मेशन (एनसीईआई) द्वारा जारी नई रिपोर्ट में सामने आई है। इससे पहले सितम्बर 2015, 2016, 2019 और 2020 में तापमान में होती वृद्धि औसत से 0.94 डिग्री सेल्सियस ज्यादा दर्ज किया गया था। वहीं सितम्बर 2021 और 2022 में यह औसत तापमान से 0.88 डिग्री सेल्सियस ज्यादा रहा।


 

हर दिन बन रहे हैं नए जलवायु रिकॉर्ड

इसी तरह पिछले अगस्त का महीना भी 143 वर्षों के रिकॉर्ड में छठा सबसे गर्म अगस्त का महीना था। जब तापमान सामान्य से अगस्त के औसत तापमान से 0.9 डिग्री सेल्सियस ज्यादा दर्ज किया गया था। वहीं यदि जुलाई 2022 की बात करें तो उस माह में तापमान सामान्य से 0.87 डिग्री सेल्सियस ज्यादा दर्ज किया गया था, जोकि उसे मानव इतिहास का छठा सबसे गर्म जुलाई बनाता है।

वहीं यदि क्षेत्रीय स्तर पर देखें तो उत्तरी अमेरिका ने अपने रिकॉर्ड के सबसे गर्म सितम्बर का अनुभव किया था। वहीं एशिया में यह रिकॉर्ड का पांचवा, जबकि अफ्रीका के लिए यह छठा सबसे गर्म सितम्बर का महीना था। वहीं औसत से ज्यादा तापमान होने के बावजूद दक्षिण अमेरिका और यूरोप ने 2013 के बाद से अपने सबसे ठन्डे सितम्बर का अनुभव किया।

इसी तरह यदि जनवरी से सितम्बर के औसत तापमान की बात करें तो इस अवधि में तापमान औसत से 0.86 डिग्री सेल्सियस यानी छठी सबसे गर्म अवधि थी। इस महीने चरम मौसमी घटनाओं की बात करें तो 128 वर्षों के इतिहास में अमेरिका का यह पांचवा सबसे गर्म सितम्बर का महीना था।

वहीं नाइजीरिया में आई भीषण बाढ़ ने 600 से ज्यादा जिंदगियों को लील लिया है, साथ ही एक लाख से ज्यादा लोग अब तक इस बढ़ से विस्थापित हो चुके हैं। वहीं इटली और पुर्तगाल में सूखे और भीषण गर्मी के बाद हुई भारी बारिश के चलते कई इलाके जलमग्न हो गए थे जबकि भूस्खलन की घटनाएं सामने आई हैं।  

इस महीने उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की घटनाएं भी सामान्य से ज्यादा दर्ज की गई। इस दौरान कुल 20 नामित तूफान दर्ज किए गए। इनमें से छह ऐसे तूफान थे जिसमें हवा की रफ्तार 111 मील प्रति घंटे या उससे ऊपर पहुंच गई थी। इनमें दो प्रमुख तूफान फियोना और इयान शामिल थे, जिन्होंने बड़े पैमाने पर क्षति पहुंचाई थी।

पूर्वी और पश्चिमी प्रशांत क्षेत्रों में भी सितम्बर के दौरान औसत से अधिक उष्णकटिबंधीय चक्रवातीय गतिविधि देखी गई। पश्चिम प्रशांत में सात तूफान दर्ज किए गए, जिनमें सभी टाइफून में हवा की रफ्तार 74 मील प्रति घंटे या उससे अधिक दर्ज की गई। विशेष रूप से सुपर टाइफून नोरू ने इस दौरान व्यापक नुकसान पहुंचाया था। जो  उत्तरी फिलीपींस में टकराने से पहले 2022 का केटेगरी 5 का दूसरा उष्णकटिबंधीय चक्रवात बन गया था।

वैश्विक स्तर पर यह आठवां मौका है जब सितंबर 2022 में बर्फ की मात्रा इतनी कम दर्ज की गई थी। इस दौरान आर्कटिक में भी जमा बर्फ की सीमा 18.8 लाख वर्ग मील दर्ज की गई जोकि 1981 से 2010 के औसत की तुलना में 5.95 लाख वर्ग मील कम थी।

देखा जाए तो 44 वर्षों के इतिहास में यह 11वां मौका है जब सितम्बर के महीने में आर्कटिक में बर्फ की सीमा इतनी छोटी दर्ज की गई है। इसी तरह अंटार्कटिका ने भी सितम्बर के महीने में अपने रिकॉर्ड की पांचवीं सबसे छोटी समुद्री बर्फ की सीमा को दर्ज किया था। जब यह 69.5 लाख वर्ग मील दर्ज की गई जोकि औसत से 1.9 लाख वर्ग मील कम थी।

साल दर साल तापमान में कब आया कितना बदलाव

1901 से 2000 के औसत तापमान के आधार पर वैश्विक तापमान में आ रही विसंगति ( डिग्री सेल्सियस में )

 

गलत दिशा में आगे बढ़ रही है मानवता

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मानवता जलवायु परिवर्तन के मामले में गलत दिशा में आगे बढ़ रही है और इसके क्या विनाशकारी परिणाम होंगें? हालांकि वैश्विक महामारी के दौरान तालाबंदी के कारण जीवाश्म ईंधन के कारण होते उत्सर्जन में गिरावट देखी गई थी। शुरूआती आंकड़े दर्शाते हैं कि जनवरी से मई 2022 के बीच वैश्विक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के स्तर में 2019 की इसी अवधि की तुलना में करीब 1.2 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है।  इसी का नतीजा है कि मई 2022 में, मौना लोआ वैधशाला में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर 420.99 पीपीएम पर पहुंच गया था।

यदि वैश्विक तापमान में होती वृद्धि को देखें तो वो पहले ही औद्योगिक काल से पहले की तुलना में 1.1 डिग्री सेल्सियस ज्यादा हो चुकी है। मतलब कि वो पेरिस समझौते की तय सीमा  यानी 1.5 डिग्री सेल्सियस पर पहुंचने से केवल 0.4 डिग्री सेल्सियस दूर है। वहीं इस बारे में हाल ही में डब्लूएमओ द्वारा जारी नई रिपोर्ट ‘द ग्लोबल एनुअल टू डिकेडल क्लाइमेट अपडेट’ के हवाले से पता चला है कि इस बात की करीब 48 फीसदी सम्भावना है कि अगले पांच वर्षों में वैश्विक तापमान में होती वृद्धि 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर जाएगी।

वहीं समय के साथ यह आशंका और गहराती जा रही है। रिपोर्ट में इस बात की भी 93 फीसदी आशंका जताई है कि वर्ष 2022 से 2026 के बीच कम से कम कोई एक साल ऐसा हो सकता है, जो इतिहास के अब तक के सबसे गर्म वर्ष के रूप में दर्ज हो जाएगा। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि वर्ष 2016, इतिहास के सबसे गर्म वर्ष के रूप में दर्ज है। जब वार्षिक औसत तापमान 20वीं सदी के औसत तापमान से 0.99 डिग्री सेल्सियस ज्यादा दर्ज किया गया था।

इस बारे में यूएन एजेंसी प्रमुख पेटेरी तालास ने भी चेताया है कि यदि देश ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में लगाम नहीं लगाते  तो तापमान में होती वृद्धि इसी तरह जारी रहेगी। उनका अनुसार इसके साथ ही महासागर गर्म और कहीं अधिक क्षारीय होते जाएंगें। नतीजन समुद्र और ग्लेशियरों में जमा बर्फ पिघलती रहेगी, समुद्र का जलस्तर बढ़ेगा और मौसम की चरम घटनाएं पहले से कहीं ज्यादा विनाशकारी होती जाएंगी।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि सदी के अंत तक तापमान में होती वृद्धि 1.6 डिग्री सेल्सियस से नीचे रहती है तो भी दुनिया में करीब 8 फीसदी कृषि भूमि खाद्य उत्पादन के लिए अनुपयुक्त हो जाएगी। इसका असर पशुधन पर भी पड़ेगा। जो खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर साबित होगा। वहीं यदि तापमान में होती वृद्धि 2 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाएगी तो दुनिया में करीब 300 करोड़ लोग पानी की गंभीर समस्या से त्रस्त होंगें, जबकि 4 डिग्री सेल्सियस पर यह आंकड़ा बढ़कर 400 करोड़ के पार चला जाएगा।

देखा जाए तो वैश्विक तापमान में होती इस वृद्धि से भारत भी नहीं बचेगा। इसपर हाल ही में जारी एक नई रिपोर्ट से पता चला है कि यदि तापमान में होती वृद्धि ऐसे ही जारी रहती है तो अगले 28 वर्षों में भारत की जीडीपी में 15 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है। रिपोर्ट का अनुमान है कि इससे सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि दक्षिण एशिया के अन्य देश बांग्लादेश, पाकिस्तान और श्रीलंका भी बुरी तरह प्रभावित होंगें।

जलवायु में आते बदलावों के चलते कहां किस देश में कितना पड़ सकता है असर

2050 तक पड़ने वाले इन प्रभावों की गणना जलवायु के आरसीपी4.5 परिदृश्य के तहत की गई है। यहां आंकड़े प्रतिशत में हैं।

देखा  जाए तो 2030 के लिये राष्ट्रीय स्तर पर उत्सर्जन में कटौती के जो नए लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं, उनसे उत्सर्जन में कटौती करने की दिशा में कुछ प्रगति जरूर दर्ज की गई है, लेकिन इसके बावजूद वो पैरिस समझौते के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए काफी नहीं है। ऐसे में यदि वैश्विक तापमान में होती वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखना है तो इसके लिए लक्ष्यों में चार गुना वृद्धि करनी होगी, जबकि 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को हासिल करने के लिए हमें अपने लक्ष्यों को सात गुना बढ़ाना होगा।
( ‘डाउन टू अर्थ ‘ पत्रिका से साभार )
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