विकास कुमार

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से करीब 45 km दूर, दक्षिण पूर्व में स्थित भीमबेटका गुफाएं किसी भी इतिहास प्रेमी को अपनी ओर खींच लाती हैं. वजह है हमारे मानव पूर्वजों द्वारा बनाए गए हज़ारों साल पुराने शैलचित्र ( Rockart ) और शैलाश्रय ( Rockshelters ) यहाँ आज भी मौजूद हैं. विंध्याचल के पहाड़ों में स्थित 10 km क्षेत्र में फैली भीमबेटका कोर एरिया में करीब 750 गुफाएं हैं, जिसमें करीब 500  गुफाओं में शैलचित्र मौजूद हैं. इस ऐतिहासिक जगह को UNESCO ने 2003 में विश्व धरोहर घोषित किया था. होशंगाबाद में सामाजिक परिवर्तन शिविर के दौरान देश भर के सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ इस ऐतिहासिक धरोहर को देखने का मौका मिला.  इन शैलचित्रों से 10,000 साल पहले शिकारी संग्रहक समाज / पशुपालक  समाज के जीवन से लेकर 2500 साल पहले राजशाही व्यवस्था के उदय की गतिविधियों की झलक भी यहाँ देखने को मिली. भीमबेटका में बनाए गए चित्रों में नृत्य, संगीत, शिकार, घोड़े और हाथियों की सवारी, विभिन्न पशु-पक्षी आदि को हज़ारों की संख्या में देखा जा सकता है.

सामाजिक परिवर्तन शिविर के दौरान हुआ भीमबेटका का स्टडी टूर

21-28 अगस्त तक होशंगाबाद, मध्यप्रदेश प्रदेश में श्रुति संस्था द्वारा सामाजिक परिवर्तन शाला के दूसरे शिविर का आयोजन किया गया. पहले शिविर का आयोजन जून महीने में झिरी राजस्थान में किया गया था. इस बार देश के 10 राज्यों के जमीनी संगठनों के जमीनी कार्यकर्ताओं की ऊर्जा और उत्साहपूर्वक भागीदारी ने शिविर को अगले पायदान में पहुचाने में मदद की. अब तक हुए दोनों  शिविरों में सहभागी लेक्चर, विभिन्न खेल, ग्रुप एक्टिविटी, फ़िल्म, वीडियो, पोस्टर के माध्यम से यूनिवर्स/धरती की उत्पत्ति, मानव विकास क्रम, प्रभुत्व वर्ग का विकास, समाज में गैरबराबरी की उत्पत्ति, कर व्यवस्था एवं मुद्रा का विकास आदि के बारे में चर्चा हुई. इस बार शिविर के दौरान ही स्टडी टूर भी शामिल रहा जिसमें प्रतिभागियों को यूनेस्को हेरिटेज साइट भीमबेटका गुफाओं में 10,000 से लेकर 2500 साल पुराने रॉक आर्ट को देखने का मौका मिला, जिससे मानव समाज के उस कालखंड में विभिन्न गतिविधियों को जानने समझने का अवसर प्राप्त हुआ।

इस स्टडी ट्रिप को लेकर संशय की स्थिति तब बनी जब होशंगाबाद में कई दिनों से लगातार बारिश हो रही थी. ऐसे में शिविर के दौरान भीमबेटका गुफाओं की प्रस्तावित यात्रा पर संकट के बादल छाए थे. पर बादल भी शायद छुट्टी के मूड में थी , और सुहावने मौसम ने सामाजिक परिवर्तन शिविर में आए प्रतिभागियों में फिर से मुस्कान ला दी . एक सुबह होशंगाबाद से निकला काफिला भोपाल हाईवे की तरफ बढ़ा. 40 km की यात्रा तय करने के बाद, हाइवे पर ही भीमबेटका विश्व धरोहर के बोर्ड ने हमे बताने की कोशिश की हम अब एक ऐतिहासिक धरोहर के चौखट पर हैं. मध्य प्रदेश अपने खजुराहो मंदिर, सांची जैसे जगहों के लिए दुनियाभर के पर्यटकों को आकर्षित करता है. हाल के वर्षो में, मध्य प्रदेश में, पुरातत्व विभाग द्वारा खोजों से हुए यह निष्कर्ष निकल रहा है कि मध्य प्रदेश सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि विश्व सभ्यता का भी विकास केंद्र रहा है.  हाईवे से करीब 5 किमी की दूरी तय करने के बाद समुद्री तट से 2000 फ़ीट की ऊँचाई पर स्थित था भीमबेटका  रॉकशेल्टर. यह पूरा क्षेत्र विंध्याचल की पहाड़ियों की उपत्यकाओं में स्थित है. घने जंगलों से घिरा हुआ, रातापानी वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी से सटा हुआ. दूर से देखने पर यह हैरतअंगेज़ पहाड़ियां किलेनुमा प्रतीत होती हैं, लेकिन जैसे कि बाद में हमारे गाइड ने बताया यह मानव उत्पत्ति से पुर्व करोड़ो वर्ष पुर्व प्राकृतिक चट्टाने मात्र हैं.

पाषाण काल से मध्य ऐतिहासिक काल तक मानव गतिविधियों का केंद्र

हैरान करने वाली बात है कि इन ऐतिहासिक गुफाओं और शैलचित्र की खोज हुए ज़्यादा समय नहीं हुए. इसकी खोज 1957-58 में पुरतत्ववादी डॉ. विष्णु श्रीधर बाकणकर ने किया. कहा जाता है कि 1958 में वे एक बार रेल से नागपुर की यात्रा कर रहे थे कि मार्ग में उन्होंने कुछ गुफाओं और चट्टानों को देखा. उसके बाद उनमें उत्सुकता हुई और बाद में इन पहाड़ियों का भ्रमण किया और गौरवशाली इतिहास से पर्दा उठाने में उनका योगदान रहा. उन्हें बाद में इस खोज के लिए पद्मश्री से भी नवाज़ा गया था. भीमबेटका क्षेत्र में प्रवेश करते हुए शिलाओं पर लिखी हुई कई जानकारियां मिलती हैं। इसमें करीब 750 शैलाश्रय है जिसमें 500 शैलाश्रय में चित्र मौजूद हैं. लेकिन आज सिर्फ 12 गुफाएं ही आम लोगों के लिए खुली हैं. यह स्थल पूर्व पाषाण काल से मध्य ऐतिहासिक काल तक मानव गतिविधियों का केंद्र रहा है.

करोड़ो वर्ष पुरानी हैं यहाँ की चट्टानें

भीमबेटका की ऊंची चट्टानों के आकार से लग सकता है कि यह मानव निर्मित हैं, लेकिन गाइड बताते हैं कि यह चट्टाने करोड़ों वर्ष तक पानी के नीचे डूबी हुई थी। इसके अलग-अलग कटाव इंसानों द्वारा नहीं, बल्कि यह प्राकृतिक रूप से नदियों द्वारा ही बने हैं। इन चट्टानों पर सफेद निशान, करोड़ों साल पहले यहाँ मौजूद पानी के बहाव को दर्शाते हैं। कमज़ोर पत्थर पानी के साथ बह गए, मजबूत पत्थर बच गए जिन्हें इस वक्त हम देख पा रहे । यहाँ सैंडस्टोन की एक मज़बूत क्वालिटी क्वार्टज़ाइट पत्थर भी मौजूद है। इन गुफाओं में ही हज़ारों साल तक हमारे पूर्वज वास करते थे.

हज़ारो वर्ष पुराने शैलचित्र से दिखा मानव का क्रमिक विकास

भीमबेटका के शैलचित्र को देखकर हज़ारों सालों में मानव के क्रमिक विकास को आसानी से समझा जा सकता है. इन चित्रों को देखकर हमारे मानव पुर्वजों के दैनिक जीवन की कल्पना भी आसानी से की जा सकती है. क्यूंकि अलग अलग कालखंड में इंसान ने गुफाओं को अपना डेरा बनाया. इससे उस समय के सामाजिक-सांकृतिक-राजनीतिक परिपेक्ष्य को भी समझा जा सकता है.

मनुष्य में 70,000 साल पहले संज्ञानात्मक क्रांति ( Cognitive Revolution ) हुई, जिससे मानव में जटिल मस्तिष्क, उपकरण बनाने/उपयोग करने की क्षमता और भाषा की क्षमता विकसित हुई जिससे हम पृथ्वी के सबसे ताक़तवर प्रजाति के तौर पर उभरे हैं . इस विकास का नतीजा है कि मानव में कला की क्षमता का विकास हुआ, इस कला से ही वे कहानियॉं कह सकते थे. यह कहानियॉं उनके आस पास की जीवन की थी. क्योंकि यह जंगल का इलाका है, फ़ल, जड़ीबूटी के अलावा जंगली जानवर भी थे, जिसका शिकार करके पर्याप्त भोजन प्राप्त कर सकते थे, सरप्लस खाने की स्थिति में मानव के पास काफी समय था, जिसमें वे अपनी कलात्मक गुणों को चित्र के माध्यम से इन गुफ़ाओं पर उतार सकते थे.

भीमबेटका में हमने बाघ, सिंह, कुत्तों और घडियालों , जंगली सुअर, हाथियों और बैलों के विशाल चित्रों को देखा. शिकारी समाज , इन जानवरों का शिकार करते हैं , कई जानवर थे जिससे उन्हें भय भी था. पशुपालक समाज के लिए भी जानवर का अपना ही महत्व था जिसे उन्होंने चित्रों में उतारा. यह मानव-प्रकृति संबंध को भी दर्शाता है जो एक दूसरे के पूरक भी थे. इन मानव चित्रों में मानव पुर्वजों के दैनिक गतिविधियों की झलक भी दिखती है. शिकार, नाच गान, युद्ध आदि. भीमबेटका में सामुहिक नाच गान वाले एक चित्र से मुझे झारखंड के आदिवासी समुदाय में अखड़ा की झलक साफ साफ दिखी, जहाँ महिला पुरूष एक साथ दिख जाएंगे.

एक चित्र में युद्ध पर जाता एक बड़ा समूह दिखता है, कई लोग घोड़े पर सवार हैं , साथ में पैदल मार्च करते लोग भी दिखेंगे, जो हाथ में डमरू के आकार का वाद्ययंत्र का प्रयोग कर रहे हैं. एक तेंदुआ भी कोने में दिखता है, जिसका घुड़सवार शिकार कर रहे हैं. मानव समाज में प्रभुत्व वर्ग का विकास इस चित्र से साफ दिखता है.

एक गुफा में एक हाथी का चित्र था, जिसके नीचे ही एक घोड़े का चित्र था , दोनों चित्रों के बीच करीब पांच हज़ार सालों का फर्क था क्योंकि भारत मे घोड़े आर्य सभ्यता के विकास से ही देखे जाते थे , जो मोहेंजोदड़ो सभ्यता के अंत के वक्त ही भारत पहुंचे थे.

भीमबेटका गुफा मानव पलायन के अतीत की कहानी को समझने के लिए भी एक प्रयोगशाला है. क्यूंकि की विभिन्न समूहों ने इन गुफाओं में वास किया , कई समूह दूर दराज इलाकों से भी यहाँ आए होंगे. भीमबेटका में दो सींग वाले गैंडे ( 2-horned rhino ) का चित्र इसी थ्योरी को मान्यता देता है, क्योंकि यह जानवर मध्य भारत में कहीं नहीं पाया जाता, पलायन किए समूह ने ही इस जानवर को संभवतः अपनी स्मृति से बनाया होगा.

भीमबेटका की चित्रों में महिला/पुरूष, बच्चे, हाथी पर बैठा मनुष्य, बैल की सवारी, सैनिक, कुल्हाड़ी पकड़ा आदमी के अलावा जानवर जैसे बकरी, बंदर, भेड़िया, हिरण, खरगोश, गिलहरी, पक्षी जैसे मोर, मुर्गी के भी अनेक चित्र  दिखेंगे जो हज़ारों की संख्या में हैं. हज़ारों साल पहले पत्थर के औज़ार भी यहाँ मिले हैं, इसके अलावा नर कंकाल भी, जिसे भोपाल के स्टेट म्यूजियम में देखा जा सकता है. बीते साल 2021 में  भीमबेटका दुनिया भर में तब चर्चा में आया था जब शोधकर्ताओं को इसके ऑडिटोरियम गुफा की छत पर करीब 57 करोड़ साल पुराने जानवर का जीवाश्म मिला था. इस जानवर का नाम डिकिनसोनिया है.

हज़ारों साल पुराने चित्र कहते हैं पूरी कहानी ?

भीमबेटका से होशंगाबाद वापस लौटने के बाद , सामाजिक परिवर्तन शिविर के एक सत्र में इतिहासकार सुब्रमण्यम  ने भीमबेटका के गुफाओं पर हमसे विस्तार से चर्चा की. हमारे कई सवालों के जवाब देकर उन्होंने कई रहस्यों पर से पर्दा उठाया. उन्होंने बताया कि इस तरह के शैलचित्र अफ्रीका के सहारा रेगिस्तान से लेकर ऑस्ट्रेलिया के गुफाओं में भी देखे गए हैं. इस कारण आम धारणा कि , मानव सभ्यता की उत्पत्ति यहीं से हुई, कहना गलत होगा. एक बड़ा सवाल था कि भीमबेटका के यह चित्र कैसे हज़ारों साल बाद भी बचे रहे. उन्होंने बताया कि भीमबेटका में जो हमने चित्र देखा , वह नमूना मात्र है. इससे भी बड़ी संख्या में वहाँ चित्र मौजूद रहें होंगे , जिसे अनेक रंगों से बनाया गया होगा लेकिन कुछ हज़ार चित्र ही आज बचे हैं. जो चित्र आज हमने देखा उसमे गेरू रंग और लोहे के खनिज पत्थर से बनाये गए हैं , जो दस हज़ार साल तक टिके हुए हैं. उन्होंने कहा कि इससे पता चलता है कि जो हमें इतिहास में सबूत की तरह दिख रहा है, वह एक छोटा सा अंश ही है. इतिहास में मिले साक्ष्य से हम पूरी सच्चाई जान नही सकते, सिर्फ कल्पना ही कर सकते हैं.

इतिहास को समझना हो तो वैज्ञानिक सोच ज़रूरी

इतिहास को समझने के लिए पौराणिक, अंधविश्वास की कथाओं से ज़्यादा वैज्ञानिक सोच ज़्यादा ज़रूरी है. भीमबेटका को लेकर कई सारी झूठी कहानियां प्रसारित की जाती हैं, जिसमें सरकारों के अलावा टूरिस्ट गाइड भी मुख्य भूमिका में रहते हैं. वे इस जगह में पांडवों के वास की कहानी गढ़ते हैं.भीमबेटका को भीमबैठका कह कर बताते हुए कहते हैं कि इस जगह पर महाभारत के किरदार भीम बैठते थे. देश के आदिवासी चित्रकला जैसे महाराष्ट्र की वर्ली, गोंड़ आदिवासी की गोंडी कला को भी भीमबेटका चित्रकला से जोड़ने की कोशिश करते हैं. आम लोगों के बीच वैज्ञानिक चेतना ज़रूरी है ताकि किसी भी सूचना को लोग आंख बंद करके विश्वास ना करें. उसका अध्ययन करें , अनेक सूत्रों से ज्ञान जुटाएं , फिर किसी निष्कर्ष पर पहुँचें. नए तथ्य आने पर , अपनी सोच को बदलें. व्हाटसअप यूनिवर्सिटी की दुनिया के बीच सही सूचना का ग्रहण और प्रसार करना एक मुश्किल काम है, लेकिन हम सबको वैज्ञानिक समाज के निर्माण के लिए लगातार प्रयासरत रहना चाहिए.

विकास कुमार स्वतंत्र पत्रकार , रिसर्चर और प्रगतिशील  सिनेमा आंदोलन से जुड़े हैं . वैज्ञानिक चेतना टीम के साथ भी जुड़े हैं. 

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