मणिपुर में होने वाली तामेंगलोंग संतरे और हाथी मिर्च को मिला जीआई टैग, सीएम वीरेन सिंह ने बताया मील का पत्थर, बोले- किसानों को होगा अत्यधिक फायदा

मणिपुर के किसान तामेंगलोंग संतरे और हाथी मिर्च का बड़े पैमाने पर उत्पादन करते हैं। ये दोनों ही राज्य के बेहद लोकप्रिय और स्पेशल किस्में हैं। मणिपुर के स्थानीय बड़े त्योहारों में इनका खास महत्व भी है। अब खबर आई है कि राज्य के इन खास किस्मों को जियोग्राफिकल इंडिकेशन यानी GI टैग मिल गया है। मुख्यमंत्री एन वीरेन सिंह ने खुद इस बात की पुष्टि की है। मुख्यमंत्री बीरेन सिंह ने ट्वीट करके बताया है कि मणिपुर के लिए दिन की कितनी शानदार शुरुआत! मुझे यह बताते हुए बहुत खुशी हो रही है कि मणिपुर के 2 (दो) उत्पादों जैसे हाथी मिर्च और तामेंगलोंग ऑरेंज को जीआई टैग प्रदान किया गया है. यह मणिपुर के इतिहास में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है जिससे किसानों की आय में अत्यधिक वृद्धि होगी. इस मिर्च की किस्म की खेती झूम प्रणाली के तहत ढलानों पर की जाती है. इस बीच, तामेंगलोंग नारंगी मैंडरिन समूह की एक प्रजाति है जो केवल तामेंगलोंग जिले में पाई जाने वाली एक अनूठी फल फसल है जो राज्य के वार्षिक उत्पादन में 50 प्रतिशत से अधिक का योगदान करती है.

क्या होता है GI टैग

भारतीय संसद ने साल 1999 रजिस्ट्रेशन एंड प्रोटेक्शन एक्ट के तहत ज्योग्राफिकल इंडिकेशन (GI) ऑफ गुड्स लागू किया था। जीआई टैग किसी भी उत्पाद के लिए एक ऐसा प्रतीक है, जो उसकी विशेष भौगोलिक उत्पत्ति, पहचान और गुणवत्ता के लिए दिया जाता है। GI टैग उस प्रोडक्ट की गुणवत्ता और उसकी विशेषता को दर्शाता है। भारत में पहली बार GI टैग साल 2004 में दार्जिलिंग की चाय को दिया गया था।

कैसे मिलता है जीआई टैग

किसी प्रॉडक्ट के लिए के लिए जीआई टैग हासिल करने के लिए चेन्नई स्थित जी आई डेटाबेस में अप्लाई करना पड़ता है. एक बार जीआई टैग का अधिकार मिल जाने के बाद 10 वर्षों तक जीआई टैग मान्य होते हैं. इसके बाद उन्हें फिर रिन्यू कराना पड़ता है. इसके लिए कोई एक व्यक्ति अप्लाई नहीं कर सकता. मान लीजिए की बिहार के पटना में कोई दुकनदार जलेबी बनाता है और वो जीआई टैग के लिए अप्लाई करता है, तो उसे ये नहीं मिलेगा. अगर बिहार में जलेबी बनाने वालों का एक संगठन है और वो अप्लाई कर सकता है. इसके लिए एक असोसिएशन ही अप्लाई कर सकता है.

तामेंगलोंग संतरे और हाथी मिर्च की खासियत

तामेंगलोंग संतरा मूल रूप से मैंडरिन समूह की एक अनूठी प्रजाति है। यह केवल तामेंगलोंग जिले में पाई जाती है। इसे मिठास और अम्लीय स्वाद के लाजवाब मिश्रण के लिए पसंद किया जाता है। ये हर साल अक्टूबर से फरवरी तक उपलब्ध होते हैं। इनका वजन आमतौर पर लगभग 90 से 110 ग्राम होता है। सेहत के दृष्टिकोण से भी इसे बेहद उपयुक्त माना जाता है।

हाथी मिर्च की बात करें तो ये उखरूल जिले के सिराराखोंग गांव में बसे सुदूर तंगखुल नागा के आसपास महादेव पहाड़ियों में ही होते हैं। विशिष्ट स्वाद और रंग के कारण इसे मिर्च के सबसे अच्छी किस्मों में से एक माना जाता है। कहा जाता है कि गांव के बुजुर्गों को पहली बार ये तब मिला था जब वे जंगलों में शिकार कर रहे थे। लोगों ने इसे कहीं और लगाने की खूब कोशिश की। लेकिन सिराराखोंग के अलावा कहीं और वैसा क्वालिटी नहीं उगता। इसलिए सिराराखोंग के ग्रामीण हाथी मिर्च को भगवान का उपहार और तंगखुल का गौरव कहते हैं।

अंतरराष्ट्रीय मार्केट में जीआई टैग

अंतरराष्ट्रीय मार्केट में जीआई टैग को एक ट्रेडमार्क के रूप में देखा जाता है. वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन (WTO) ने इसके तहत कई देशों ने (TRIPS) नाम के एक समझौते पर हस्ताक्षर कर रखा है. इसमें कहा गया है कि TRIPS में शामिल सदस्य जीआई टैग का सम्मान करेंगे और उसी तरह के फेक प्रॉडक्ट को रोकने के लिए कदम उठाएंगे. इस टैग से टूरिज्म और निर्यात को बढ़ावा देने में मदद मिलती है.

चंदेरी की साड़ी, कांजीवरम की साड़ी, दार्जिलिंग चाय और मलिहाबादी आम समेत अब तक 300 से ज्यादा उत्पादों को जीआई मिल चुका है. भारत के कुछ महत्वपूर्ण उत्पाद जिन्हें जीआई टैग प्राप्त है- महाबलेश्वर-स्ट्रॉबेरी, जयपुर -ब्लू पोटरी, बनारसी साड़ी, तिरुपति के लड्डू, मध्य प्रदेश के झाबुआ के कड़कनाथ मुर्गा, कांगड़ा की पेंटिंग, नागपुर का संतरा, कश्मीर की पाश्मीना, हिमाचल का काला जीरा, छत्तीसगढ़ का जीराफूल और ओडिशा की कंधमाल हल्दी इत्यादि.

 

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