भारत में पाई जाने वाली भैंसों की दो और देसी नस्लों का पंजीकरण किया गया है। इनमें ‘धारवाड़ी भैंस’ नस्ल का उद्गम स्थल कर्नाटक है जिसे राष्ट्रीय मान्यता मिली है  धारवाड़ी भैंस कर्नाटक राज्य के बागलकोट, बेलगाम, डहरवाड़, गडग, बेल्लारी, बीदर, विजयपुरा, चित्रदुर्ग, कलबुर्गी, हावेरी, कोपल, रायचूर व यादगित जिलों में पाई जाती है। यह मध्यम आकार की काले रंग की भैंस है जिसका सिर सीधा होता है। सींग अर्ध-गोलाकार होते हुए गर्दन को स्पर्श करती है। इसे मुख्य रूप से दूध के उद्देश्य से पाला जाता है।

राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो, हरियाणा पशुओं के बारे में शोध के बाद उसे मान्यता देता है। धारवाड़ी भैंस को INDIA_BUFFALO_0800_DHARWADI_01018 एक्सेशन नंबर दिया गया है। इस कोड के सहारे इस पर शोध और अध्ययन होगा और उसे पहचान मिलेगी। कृषि विश्वविद्यालय, धारवाड़ के पशुपालन विज्ञान विभाग ने इस स्थानीय नस्ल को मान्यता दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है।

पशुपालन विज्ञान विभाग के हेड डॉ वीएस कुलकर्णी न्यूज़ पोर्टल गाँव कनेक्शन से बात करते हुए कहते है, “धरवाड़ी भैंस यहां पर सैकड़ों सालों से है, जिस तरह से मुर्रा, भिंड या फिर नीली रावी जैसे भैंस की नस्लें पहले किसी के खास एरिया की थी बाद में देश भर में लोग उन्हें जानने लगे उसी तरह ही धरवाड़ी भैंस भी यहां की देसी नस्ल है। दरअसल शुरू में लोगों ने पहले अब ध्यान ही नहीं दिया, हम पिछले कई सालों से धरवाड़ी भैंस को मान्यता दिलाना चाहते थे हमने सोचा की हजारों साल से इसे पाल रहे हैं इसे राष्ट्रीय पहचान तो मिलनी ही चाहिए , अब जाकर राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो से इस नस्ल को मान्यता मिल गई है।”

वो आगे कहते हैं, “इस नस्ल की खास बात ये होती है कि इसे बांध के कभी नहीं खिलाया जाता हा दिन भर चराने के बाद ये अच्छा दूध देती हैं।पहले हमारे यहां गाँव में एक चलन था जिसमें घर में जो भी खाने के बाद बचता था उसे किसी बर्तन में रख दिया जाता था और फिर उसे पशुओं को दे दिया जाता था। इससे घर में कभी खाना नहीं बर्बाद होता था, लेकिन आज भी यहां पर लोग ऐसा करते या रहे हैं घर में जो भी खाना बचता है उसे पशु के लिए रख देते हैं।”

एक ब्यात में देती है 1000 लीटर दूध

डॉ कुलकर्णी कहते हैं, “इतना काम ध्यान देने के बाद भी यह भैंस 1000 लीटर तक दूध देती है। बछड़ियाँ 17-20 महीने मे तैयार हो जाती है। ऐसा नहीं है की यह भैंस सिर्फ धारवाड़ अकेले में ही सफल है, जैसे ही भैंस की दूसरी नस्लें आज पूरे देश में पहुँच गईं हैं और सफल भी हैं इसी तरह ये भी अगर दूसरे क्षेत्र में जाती है तो सफल होगी। जिस तरह से हरियाणा, पंजाब या फिर उत्तर प्रदेश में भैंसों को बांध कर बढ़िया दाना और चारा दिया जाता है अगर धरवाड़ी नस्ल को उस तरह से खिलाया जाए तो धारवाड़ भैंस 1000 से 1500 लीटर तक दूध दे सकती है।

ऐसे कर सकते हैं पहचान

किसी भी भैंस की पहचान उसकी सींग से जी जाती है, धरवाड़ी भैंस की सींग अर्ध चंद्राकार आकार की होती है और इसका रंग गहरा काला होता है। उत्तरी कर्नाटक के 14 जिलों में भैंस की यह नस्ल पाई जाती है, इन जिलों में करीब 14 लाख भैंसे हैं। इसके दूध में वसा (फ़ैट) की 7% होती है।

धारवाड़ पेड़ा से भैंस का कनेक्शन

कर्नाटक का धारवाड़ पेड़ा पूरे देश भर में प्रसिद्ध है। इसका इतिहास लगभग 175 साल पुराना है, उत्तर प्रदेश के उन्नाव के रहने वाले राम रतन सिंह ठाकुर 19वीं शताब्दी के शुरूआती वर्षों में क्षेत्र में प्लेग फैलने के कारण कर्नाटक के धारवाड़ में आकर बस गये और फिर यहीं इस मिठाई का उत्पादन और विकास किया जिस कारण यह तब से धारवाड़ पेड़ा के रूप विख्यात हुई। धारवाड़ पेड़ा को जीआई टैग भी मिला हुआ है। डॉ कुलकर्णी कहते हैं, “यहां का पेड़ा 15-20 दिनों तक खराब नहीं होता है, कहा जाता है की इंग्लैंड की महारानी को यहां से पेड़ा भेजा जाता था, इसे पहुँचने में कई दिन लग जाते थे लेकिन वहां तक पहुंचते पहुंचते भी यह खराब नहीं होता था।”

देश देसी नस्ल की इन भैंसों को भी मिली मान्यता

धारवाड़ी भैंस की तरह ही देश की कई ऐसी देसी नस्लें हैं जिन्हें अब तक मान्यता दी गई है। भदावरी (उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश), जफरबादी (गुजरात), मराठवाड़ी (महाराष्ट्र), मेहसाना (गुजरात), मुर्रा (हरियाणा), नागपुरी (महाराष्ट्र), नीली रावी ( पंजाब), पढ़नपुरी (महाराष्ट्र), सुरती (गुजरात), तोड़ा (तमिलनाडु), बन्नी (गुजरात), चिल्का (ऑडिशा), कालाहांडी (गुजरात), बरगुर(तमिलनाडु), छत्तीसगढ़(छत्तीसगढ़), गोजरी(पंजाब व हिमाचल प्रदेश), मांडा (ऑडिशा)।

 

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