विकास कुमार

आजादी के 70 साल बाद भी आदिवासी समाज आज संघर्षो से जूझ रहा है. देश में 10.4 करोड़ आदिवासी आबादी ( 2011 census ) का बड़ा हिस्सा तथाकथित विकास के मॉडल के कारण आज अपने जल, जंगल ज़मीन को बचाने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहा है. आजादी के बाद सरकार के नेहरूवियन मॉडल से आदिवासियों के हिस्से सिर्फ विस्थापन, पलायन, ग़रीबी और भुखमरी आई. वहीं आदिवासी समाज पर सांस्कृतिक हमले भी तेज हुए हैं, जिससे उनकी भाषा और उनके अस्तित्व को खत्म करने की बड़े पैमाने पर कोशिश की गई. आदिवासी समाज के साथ अकादमिक समाज ने भी धोखा दिया है. अंग्रेजों के बाद राष्ट्रवादी स्कॉलर्स के चश्मे से भी आदिवासियों को अविकसित, पिछड़ा कहा गया. वहीं एक सकारात्मक पहलू यह रहा कि पिछले कुछ वर्षों से विभिन्न यूनिवर्सिटीज में आदिवासी बहुजन समाज की भागीदारी बढ़ी जिसके कारण  आदिवासी इतिहास , संस्कृति पर नए सिरे से शोध कार्य छात्रों द्वारा किए जा रहे हैैं . इसके अलावा आदिवासी समाज में नई चेतना का ही नतीजा है कि अनेक प्रगतिशील मंच भी, ज़मीनी  संघर्षो की आवाज़ों को जगह दे रहे हैैं, जो आदिवासी समाज की दशा की चर्चा के अलावा, उसको दिशा देकर, संघर्ष को आगे बढ़ाने की कोशिश करते दिख रहे हैैं . इसी कड़ी में ‘ मूलनिवासियों की भाषा एवं संस्कृति के विविध आयाम : ‘आदिवासी समाज : दशा और दिशा ‘ विषय पर गोंडवाना स्वदेश (मासिक पत्रिका ) एवं छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग ने रायपुर के शहीद स्मारक भवन में 3 दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया .

कोरोना काल के बाद हुए आदिवासी विमर्श पर यह देश का सबसे बड़ा कार्यक्रम था जिसकी व्यापकता का अंदाज़ा इस बात से होता है कि तीन दिन तक चले कार्यक्रम में कुल लगभग 270 लोगों ने भाग लिया. इसमें २०० शोधार्थी थे.  प्रतिभागियों में रिसर्च स्कॉलर, प्रोफेसर, ज़मीनी कार्यकर्ता शामिल थे. मुख्य मंच पर हुए सेशन के अलावा पैरलल सेशन सहित 15 सत्रों में 200 शोधपत्रों को देशभर के विभिन्न यूनिवर्सिटीज से आए शोधकर्ताओं ने  प्रेजेंट किया . शिक्षा, पारंपरिक स्वास्थ्य प्रद्धति, आदिवासी पारंपरिक ज्ञान, आदिवासी साहित्य, आदिवासी महिलाओं की स्थिति इत्यादि जैसे आदिवासी समाज से जुड़े तमाम विषयों पर अपने शोध का निष्कर्ष बताया. रिसर्च पेपर प्रस्तुति के अलावा 6 थीमेटिक सत्र भी थे जिसमें 15 वक्तागण बोले और 6 अध्यक्षीय भाषण हुए. इसके अलावा कई छत्तीसगढ़ के आदिवासी कैबिनेट मंत्री, विधायक, आदिवासी परिषद के मुख्य पदाधिकारियों ने भी इसमें शिरक़त की और आयोजकों को प्रोत्साहन दिया.

 

अंग्रेजों के काल से ज़्यादा शोषण

उद्धघाटन सत्र के मुख्य वक्ता नामी शिक्षाविद वर्जिनिस खाखा थे जिन्होंने आदिवासी समाज को ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में रखते हुए कहा कि अंग्रेज़ी शासन  से पहले आदिवसियों की स्वशासन व्यवस्था थी. जल, जंगल और ज़मीन पर कब्जा था लेकिन अंग्रेज़ी शासन काल में पहली बार आदिवासी अपने संसाधन पर अपना हक खोने लगे. 1793 के ज़मींदारी सेटलमेंट जैसे कानून ने इस प्रक्रिया को तेज किया. लेकिन आदिवासी विद्रोहों का ही नतीज़ा रहा कि अंगेज़ों ने आदिवासी समाज को अपनी पारंपरिक व्यव्यस्था से गवर्न करने का हक तो ज़रूर दिया लेकिन अंग्रेजों की मार्किट इकॉनमी की व्यव्यस्था ने आदिवासियों को जल जंगल जमीन से बेदखल किया. वहीं 1860 में वन पालिसी से भी आदिवासी अपने जंगल खोते रहे. आजादी के बाद भी राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया में कारखाने और बांध जैसे विकास कार्य की भेंट आदिवासी ही चढ़े. भले ही यह विकास समाजवाद के शब्दावली से किया गया और जो सबकी बराबरी की बात करता था. शोषण की यह प्रक्रिया ब्रिटिश काल से भी ज़्यादा रही. अंग्रेज़ सिर्फ आदिवासी संसाधन लूटते थे, बदले में वापस कुछ नहीं देते थे, सिर्फ मिशनरीज को ग्रांट देते थे. वही पोस्ट कोलोनियल भारत सरकार भी लूट रही थी लेकिन उसने बदले में आरक्षण, राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे संवैधानिक प्रावधान आदिवासियों के हक में ज़रूर दिए. इस व्यव्यस्था ने आदिवासियों का मध्यम वर्ग ज़रूर तैयार किया लेकिन नवउदारवाद से उत्पन्न निजीकरण के दौर में आदिवासी समाज में, जो पहले मिल रहा था वह भी मिलना अब बंद हुआ.

उन्होंने कहा कि आदिवसियों के आगे बढ़ने की दिशा का समाधान यही है की आदिवासी स्वायत्त विकास करे. उन्होंने उत्तर पूर्वी भारत का उदाहरण देकर कहा कि विभिन्न संस्थाओं के कारण राजनीतिक शक्तियां लोगों के पास रही, वही मध्य भारत में आदिवासियों की स्थिति इसके विपरीत है. उन्होंने कहा कि पांचवी अनुसूची वाले क्षेत्रों को भी छठी अनुसूची क्षेत्रों जैसे राज्यों की तरह शक्तियां मिलनी चाहिए. उन्होंने आगे कहा कि एक नए आर्थिक-राजनीतिक ढाँचे की ज़रूरत है जिससे आदिवासी खुद अपने विकास को तय करे ना कि टॉप टू बॉटम व्यवस्था में उलझे रहे.

देशभर से आए शोधार्थियों ने पेपर प्रस्तुत की 

देश के विभिन्न हिस्सों जैसे महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, असम, ओडिशा, झारखंड, दिल्ली इत्यादि से आए छात्रों ने शिक्षा, स्वास्थ्य,आदिवासी पारंपरिक ज्ञान, आदिवासी साहित्य, विस्थापन की समस्या, आदिवासी महिलाओं की स्थिति इत्यादि जैसे आदिवासी समाज से जुड़े तमाम विषयों पर अपने शोध का निष्कर्ष बताया.

वर्धा यूनिवर्सिटी के एक शोधार्थी छात्र ने महाराष्ट्र के अमरावती के मेलघाट टाइगर रिज़र्व में बसे कोरकू जनजाति के सामाजिक आर्थिक स्थिति पर अपना शोध प्रस्तुत किया. छत्तीसगढ़ के एक छात्र ने मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के आदिम जनजाति भारिया द्वारा उपयोग की जा रही जड़ीबूटियों अथार्थ पारंपरिक ज्ञान पर प्रकाश डाला. एक छात्र ने ‘ आदिवासी साहित्य – दिशा और दशा ‘ पर पेपर प्रस्तुत किया. इसमें उन्होंने गैर आदिवासियों द्वारा रचित साहित्य में आदिवासी चित्रण की भी बात की. छत्तीसगढ़ की एक शोध छात्रा ने बस्तर में गोंड़ आदिवासियों के बीच घोटूल परंपरा का जिक्र किया

कूल करीब २०० शोध पत्रों की प्रस्तुति हुई. एक सत्र के बाद सवाल जवाब भी होता था जिसमें ऑडियंस शोधार्थियों से उनके रिसर्च से जुड़े सवाल पूछते थे.

राष्ट्रवादी विद्वानों ने भी आदिवासी समाज को अंग्रेजों के चश्मे से देखा

कार्यक्रम के दूसरे दिन प्रख्यात शिक्षाविद डॉ. बिपिन जोजो मुख्य वक्ता थे और उन्होंने बताया कि कैसे आजादी से पहले अंग्रेजों द्वारा  और आजादी के बाद के समय में राष्ट्रवादी शिक्षाविदों द्वारा आदिवासी इतिहास औपनिवेशिक ढांचे में लिखा गया है। दोनों के द्वारा आदिवासियों को जंगली, पिछड़ा कहा गया , इसका नतीज़ा यह रहा कि आजादी के बाद भी इनके रिसर्च का प्रभाव सरकारों द्वारा बने पॉलिसीस पर भी पड़ा क्योंकि यूनिवर्सिटीज में किए गए शोध ही सरकारों की विचारधारा तय करती है. आदिवासियों को अनुसंधान के लिए डेटा के रूप में भी इस्तेमाल किया गया है और लिंडा स्मिथ के शब्दों को कोट करते कहा कि अनुसंधान ( Research ) आदिवासी समुदाय के लिए एक अभिशाप साबित हुआ है।

उन्होंने बताया कि आदिवासी बच्चों को प्रभुत्व वर्ग द्वारा किस तरह उनके समाज, इतिहास, धर्म , संस्कृति से अलग किया जा रहा. उन्होंने भुवनेश्वर में स्तिथ कलिंग इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज ( KISS ) का उदहारण देकर बताया गया कि किस तरह से आवासीय विद्यालय में हज़ारों आदिवासी बच्चों को सभ्य बनाने और मुख्यधारा में लेकर आने के उद्देश्य से उनको उनकी जड़ो से हटाने का प्रयास हो रहा है.

उन्होंने कहा कि भारत में शोध कार्य में जनजातीय और आदिवासी ज्ञानमीमांसा (epistemology ) की आवश्यकता हैं . यह ज्ञानमीमांसा आदिवासी समुदायों के नजरिए और अनुभवों से उभरनी चाहिए. दुनियाभर में आज रिसर्च में ‘गैर-औपनिवेशीकरण’ की पद्धति को अपनाया जा रहा है. भारत में भी आदिवासी समुदाय पर शोधकार्य में इसी पद्धति की ज़रूरत है.

देशभर से आदिवासी संघर्षो की आवाज़

देशभर में जल जंगल जमीन को बचाने का संघर्ष जारी है. राष्टीय संगोष्ठी ने इन ज़मीनी आवाज़ों को मंच प्रदान किया और देशभर से आए सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने समस्या की जड़ के बारे में बात रखी और अपनी ज़मीनी लड़ाई के बारे में भी विस्तार से चर्चा की. झारखंड के राजनीतिक कार्यकर्ता जेरोम जेराल्ड कुजूर ने झारखंड के पलामू टाइगर रिज़र्व एवं वाइल्ड लाइफ कॉरिडोर प्रोजेक्ट से गांवों के विस्थापन की समस्या पर बात रखी. ओड़िशा के समाजसेवी गोपीनाथ मांझी ने 1955 में ओड़िशा में हीराकुंड डैम के निर्माण से हुए संबलपुर ज़िले में विस्थापन की समस्या की बात की और कहा कि सरकारों द्वारा मुआवज़ा आज तक कई लोगों को नही मिला. आज भी झारसुगोड़ा में व्यापक स्तर पर कोयला माइनिंग हो रही है, जिससे प्रदूषण और विस्थापन की समस्या से आदिवासी समाज प्रभावित है.

असम के काजीरंगा से आए युवा राजनीतिक कार्यकर्ता प्रणव ने कहा कि आज ग्लोबल वर्मिंग और कॉन्सेर्वशन की जब बात हो रही है, तब आदिवासियों की चर्चा हो रही है. उन्होंने कहा कि असम में आज भी वन प्रतिशत बाकी राज्यों के मुकाबले ज्यादा हैं क्योंकि यहाँ समुदाय द्वारा वन संरक्षण की संख्या ज्यादा हैं. लेकिन असम में बढ़ते टूरिज्म से, आदिवासी समाज पर बढ़ रहे संकट पर चिंता जाहिर की. विदेशी फंडिंग से जीव जंतु संरक्षण के नाम पर निर्माण कार्य हो रहे हैं. टूरिज्म के नाम पर रिसोर्ट और फ्लाईओवर बनाए जा रहे हैं. जबकि आदिवासी समुदाय ही सदियों से जानवरों के साथ सहअस्तित्व में रह रहे हैं. लेकिन इस विकास का विरोध भी समुदाय द्वारा किया जा रहा है और टूरिज्म के नाम पर टूरिस्टों के लिए नाच गान करने से वे मना कर रहे हैं.

आदिवासी ज्ञान विज्ञान आधारित

एक सेशन में चाईबासा ( झारखंड ) के समाजसेवी मुकेश बिरुआ ने कहा कि आदिवासी समाज की परंपराएं विज्ञान आधारित हैं. पेशे से इंजीनियर रह चुके बिरुआ ने गोंडवाना समय घड़ी के बारे में कहा की यह घड़ी दाएं से बाएं चलती है लेकिन समय बिलकुल सही बताती है. यह आदिवासी दर्शन और उससे जुड़ी तमाम संस्कृति- परंपरा से जुड़ी हुई है जिसमें आदिवासी हल भी इसी चक्र में जोतते हैं, हाथ की चक्की भी इसी दिशा में चलाते हैं.शादी से लेकर नृत्य भी इसी दिशा में होती हैं. उन्होंने कहा कि प्राकृतिक गतिविधियां भी इसी दिशा में होती है, जैसे पृथ्वी भी इसी दिशा में घूमती है, इलेक्ट्रान, प्रोटोन भी इसी दिशा में घूमते हैं. उन्होंने कहा कि 2004 में भी अंडमान के आदिवासी इसी कारण सुनामी से बच पाए क्योंकि उन्हें प्राकृतिक गतिविधियों की पहले से जानकारी थी. इसके अलावा उन्होंने ऐसी कई आदिवासी मान्यतायों का जिक्र किया जो विज्ञान आधारित है. उन्होंने मुख्यधारा मीडिया पर आदिवासी खान पान के बारे में अज्ञानता का आरोप लगाया, इस कारण पौष्टिक मुंगा साग खाने पर भी उन पर ग़रीबी के कारण घास खाने के सनसनीखेज हैडलाइन बनते हैं.

रायपुर, छत्तीसगढ़ में तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के आखिरी दिन के समापन सत्र में प्रो. सोनाझरिया मिंज, वाइस चांसलर ( सिदो-कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका , झारखंड ) मुख्य वक्ता थी. उन्होंने आदिवासियत को पुनः प्राप्त करने पर जोर दिया. देशभर के आदिवासी को  विभिन्न विविधताओं के बावजूद संविधान में उन्हें ‘ Scheduled’ बताया गया, समय है कि फिर से आदिवासी और आदिवासियत को परिभाषित किया जाए. आदिवासियों को बराबरी का दर्जा मुश्किल से दिया जाता हैं. आज स्ट्रेटेजी के तहत आदिवसियों के अस्तित्व को ही विलुप्त करने की बात चल रही. हमारे इतिहास के आदिवासी नायकों ने अपने समय में आदिवासी की दशा को बखूबी से समझा और संघर्षो को दशा दिया. उनसे आज प्रेरणा लेने की ज़रूरत है. उन्होंने शिक्षा पर जोर देते हुए कहा कि शिक्षा ही मौजूदा व्यवस्था को खारिज करने की क्षमता देता है और हमे विकल्प देता है. आज हमे सिर्फ अपने दुर्दशा पर रोने के बजाय, अपनी ताकत को समझने की ज़रूरत है.आदिवासी समाज के पास आज पारंपरिक और आधुनिक युग के मॉडल दोनों का अनुभव है और इन अनुभवों के आधार पर खुद की दिशा बदलने की क्षमता भी है.

छत्तीसगढ़ सरकार के कला विभाग के मंत्री अमरजीत भगत भी कार्यक्रम के समापन सत्र में उपस्थित थे और आयोजकों को बधाई दी और हर साल सरकार द्वारा इसी तरह कार्यक्रम को समर्थन करने की बात की.

तीन दिन तक चले कार्यक्रम में संस्कृति कर्मियों की भी भागीदारी रही. छत्तीसगढ़ के विख्यात कलाकार घनश्याम सिंह ठाकुर जो तीन बार राष्ट्रपति से पुरस्कृत हो चुके हैैं,  उन्होंने अपनी टीम के लोककला करमा गीत और नृत्य की प्रस्तृति से समा बांधा.

इसके अलावा कार्यक्रम में किताब विमोचन भी हुआ. युवा कवि, लेखक और रमन कुमार द्वारा संपादित ‘हिंदी दलित कविता : आंदोलन और जागृति की पक्षधर’ नामक पुस्तक का विमोचन हुआ.

कार्यक्रम से शोधार्थी हुए लाभान्वित

इस कार्यक्रम में आए देश के प्रमुख संस्थानों से आए शोधार्थी कार्यक्रम से लाभान्वित होने की बात करते हैं.  JNU के समाजशास्त्र के शोधार्थी धीरज कुशवाहा ने तीन दिनों के अनुभव के बारे में बातचीत करते हुए बताया कि इस कार्यक्रम के माध्यम से उन्हें आदिवासी समाज की मौजूदा दशा के बारे में नई जानकारी मिली. कार्यक्रम से यह दिशा भी दी जा रही है कि कैसे आदिवासी समाज के संघर्षो को आगे लेकर जाया जाए और अकादेमिक काम में किस तरह से आदिवासियों का चित्रण किया जाए . उन्होंने आगे कहा कि तथाकथित मुख्यधारा में जो विकास की परिभाषा है, वह आदिवासियों की विकास की परिभाषा से बिल्कुल अलग है और विकास की शब्दवाली को पुनः परिभाषित करने की आवश्यकता है. अंग्रेजों ने जो इतिहास लिखा है, उसे चैलेंज करके दोबारा इतिहास लिखने की ज़रूरत है.

 

महात्मा गांधी हिंदी यूनिवर्सिटी , वर्धा की छात्रा सुकेशनी थोराट भी बताती हैं कि कार्यक्रम में देश भर से आए शोधार्थी और सामाजिक कार्यकर्ताओं को सुनने का मौका मिला और आदिवासी संस्कृति, जो लुप्त होने के कगार पर पहुंच रही, ऐसे में इस मंच में इसे बचाने के बारे में सार्थक चर्चा हुई.

चुनौतियों के बीच राष्ट्रीय संगोष्ठी से खुले आदिवासी विमर्श के नए आयाम

पिछले डेढ़ साल से आम जन जीवन प्रभावित रहा. इसके अलावा कॉलेज भी बंद रहे जिससे छात्रों पर अच्छा खासा प्रभाव रहा. आवाजाही बाधित होने पर शोध कार्य भी प्रभावित हुआ. कोरोना काल के कारण विचार-विमर्श की ऑनलाइन वेबिनार तक ही सीमित रहा. ऐसे में इस राष्ट्रीय संघोष्टि का खास महत्व था जिसमे आदिवासी मुद्दों पर सार्थक चर्चा हुई.  किसी भी समाज को आगे लेकर जाने के लिए उसकी मौजूद स्थिति की गहरी समझ ज़रूरी है. उसके ऐतिहासिक परिवेश की भी जानकारी ज़रूरी है, जिससे उस सामाजिक- राजनीतिक ढांचे की समझ मिले जिसके कारण उत्पीड़न की मौजूदा परंपरा जारी है . कार्यक्रम की चुनौतियों के बारे में बात करें तो इस बार प्रतिभागियों की संख्या 2019 में आयोजित कार्यक्रम की तुलना में कम रही है.  अब भी देश में कोरोना के कारण आवागमन की स्थिति पूरे तरीके से सामान्य नहीं हो पाई है, ऐसे में सुदूर इलाके में रहने वाले कई प्रतिभागी कार्यक्रम में पहुंच नहीं सके. गोंडवाना स्वदेश ने इस कार्यक्रम को सरकार के सहयोग के साथ किया, ऐसे में सरकार के मंत्री , विधायक और अन्य अतिथि के अनिश्चित आगमन से कार्यक्रम के तय समय में कई बार फेर बदल हुई जिससे आयोजक और प्रतिभागी दोनों को परेशानी हुई. सरकार के साथ कार्य्रकम करने पर आयोजकों पर कई दायरे होते है लेकिन फिर भी आदिवासी मंत्रीगण द्वारा यह आश्वासन देना की इस मंच के द्वारा किसी भी आलोचनात्मक विमर्श की खुली छूट दी गई थी चाहे वह सरकार के ख़िलाफ़ ही क्यों ना हो, सुनना सुखदागी था.

गोंडवाना स्वदेश पत्रिका के सलहाकार  एडिटर ने संघोष्टि के उद्येश्य और इसके प्रभाव का जिक्र किया  

कार्यक्रम में आदिवासी और अन्य शोषित समाज के शोध छात्रों की भागीदारी भी अच्छी खासी रही . लड़कियों की संख्या भी ठीक थी. 30 अक्टूबर यानी कार्यक्रम के आखरी दिन आयोजकों ने कार्यक्रम का घोषणा पत्र पढ़ा. सभी प्रतिभागियों ने भी खड़े होकर इससे सहमति जताकर आदिवासी अस्मिता और अस्तित्व को बचाने की इस सामूहिक लड़ाई में अपनी हामी भरी

रायपुर घोषणा ( कार्यक्रम के आखरी सेशन में घोषणा पत्र पढ़ा गया )

हम लोग यहां 28 से 30 अक्टूबर 2021 के बीच ‘आदिवासी समाज : वर्तमान स्थिति और भविष्य की दिशा’ पर तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के लिए इकट्ठे हुए हैं, इसके द्वारा संगोष्ठी के समापन सत्र में यह घोषणा करते हैं।

वर्तमान समय में जब मूलनिवासी / आदिवासी ज्ञान और शासन प्रणाली के महत्व पर वैश्विक संवाद चल रहा है, जो दुनिया के सामने आने वाले खतरों का एक प्रमुख समाधान है। इस ऐतिहासिक परिवेश में राजसत्ता और उसके प्रतिनिधियों और आम लोगों के लिए यह महत्वपूर्ण होगा कि वे इस चुनौती का डटकर मुकाबला करें और सामने से नेतृत्व करें। हमने अपने तीन दिनों के विचार-विमर्श में यह निष्कर्ष निकाला है कि आदिवासी लोगों और उनके इतिहास, ज्ञान प्रणालियों और विश्वदृष्टि को मान्यता दिए बिना, वैश्विक दुनिया जलवायु संकट और विनाशकारी विकास के रूप में सामना कर रहे वर्तमान संकटों का समाधान नहीं ढूंड सकती  और जीवित नहीं रह सकती है।

देश और दुनिया के लिए एक जोरदार और स्पष्ट संदेश होना चाहिए कि आदिवासी न्याय प्राथमिक न्याय है जिसे पितृसत्ता, सैन्यीकरण, कट्टरवाद और पूंजीवाद के माध्यम से इस देश में निहित कई प्रकार के अन्याय के साथ संवाद स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू करने की आवश्यकता है। आदिवासी न्याय को तब आधार बनाया जा सकता है जब आदिवासी ज्ञान-मीमांसाओं और इतिहासों को आदर्श के रूप में स्वीकार किया गया हो, अपवाद के रूप में नहीं।

विचार-विमर्श में आदिवासी समाजों और इस तरह वैश्विक दुनिया की भविष्य की दिशाएँ क्या हो सकती हैं, इस पर कई सुझाव दिए गए। निम्नलिखित घोषणा तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में हुई विविध विचार-विमर्शों से उभरी।

संविधान और विभिन्न अधिनियमों जैसे पांचवीं और छठी अनुसूची, पेसा, वन अधिकार अधिनियम, भूमि हस्तांतरण की रोकथाम के कानून, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम आदि कानूनों में निहित सुरक्षात्मक प्रावधानों के पूर्ण कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने की एक आसन्न आवश्यकता है।

औद्योगिक और खनन परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण, वन और पर्यावरण मंजूरी से संबंधित कानूनों में पिछले और प्रस्तावित संशोधनों की समीक्षा करने की एक आसन्न आवश्यकता है, जिनका उद्देश्य आदिवासी बसाहटों तथा वन क्षेत्रों पर उद्योग और खनन परियोजनाओं की स्थापना में सरकार और निगमों की जवाबदेही को और आसान बनाना है।

संगोष्ठी ने 2014 में भारत सरकार को सौंपे गए खाखा समिति की रिपोर्ट में दी गई सिफारिशों को केंद्रीय और राज्य सरकारों के द्वारा पहचानने और लागू करने की आवश्यकता को दोहराया।

संगोष्ठी ने आदिवासी क्षेत्रों के बढ़ते सैन्यीकरण और आदिवासी समुदायों और पर्यावरण व मानवाधिकार रक्षकों के मानवाधिकारों के उल्लंघन और हिरासत में हिंसा को अस्वीकार किया और देश भर में आदिवासी क्षेत्रों के सैन्यीकरण और इस तरह की ढांचागत हिंसा को समाप्त करने की मांग की।

संगोष्ठी में आदिवासी और महिला शोधकर्ताओं ने सामान्य रूप से आदिवासी महिलाओं और विशेष रूप से उन आदिवासी महिलाओं के खिलाफ जो सैन्यीकृत, खनन और औद्योगिक क्षेत्रों में रहती हैं, बढ़ती हिंसा पर गहरी अंतर्दृष्टि दी और सैन्य बलों की घुसपैठ को रोकने के लिए कड़े कानून और प्रणाली बनाने की मांग की।

संगोष्ठी में वन्य जीवों के संरक्षण और वनों के संरक्षण के नाम पर आदिवासी लोगों की जबरन बेदखली पर सवाल उठाया गया। ‘सुरक्षित क्षेत्र’ का विचार आदिवासी लोगों के संवैधानिक अधिकारों, वन क्षेत्रों में उनकी पहुंच और बसाहटों के अधिकार को रौंद रहा है। यदि आदिवासी लोगों के अधिकारों को मान्यता नहीं दी जाती है, तो अनुसूचित क्षेत्रों में जहां सरंक्षण परियोजनाओं को लागू किया जाता है, CFR, CFRR और PESA पर कार्यान्वयन को तुरंत बंद कर दिया जाना चाहिए।

आदिवासी विश्वास प्रणाली और इन विश्वास प्रणालियों पर आधारित पवित्र और सामुदायिक संस्थानों के विचार को आधुनिकता और विकास के नाम पर निंदित और नष्ट कर दिया गया है। इसे चुनौती देने की जरूरत है और आदिवासी विश्वास प्रणालियों को अच्छी तरह से स्थापित और तर्कसंगत ज्ञान प्रणालियों के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए और औपचारिक मान्यता दी जानी चाहिए ताकि उन्हें क्षय का सामना न करना पड़े।

हम, राष्ट्रीय संगोष्ठी में भाग लेने वाले, यह घोषणा करते हैं और नागरिक समाज, राजनीतिक नेतृत्व और सरकारों से इस रायपुर घोषणा के माध्यम से की गई मांगों का सम्मान करने और उन्हें लागू करने की अपील करते हैं।

विकास कुमार स्वतंत्र पत्रकार और रिसर्चर है. वे वैज्ञानिक चेतना के साथ भी जुड़े हैं

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