डी एन एस आनंद

यह आजादी का 75 वां वर्ष है। यानी देश को आजाद हुए सात दशक से अधिक समय बीत गए। पर आजाद भारत का सपना देखने, उसके लिए हर संभव प्रयास एवं संघर्ष करने वाले हमारे राष्ट्र नायकों के सपने अब तक पूरे नहीं हुए। इसमें भारत के वेदांती युवा संन्यासी एवं राष्ट्र के गौरव स्वामी विवेकानंद भी हैं। आज पूरा देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। साइंस फार सोसायटी झारखंड ने इसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण वर्ष के रूप में मनाने का निर्णय किया है। ताकि भारतीय संविधान के दिशा-निर्देशों के अनुरूप वैज्ञानिक दृष्टिकोण संपन्न तर्कशील, विकसित भारत का निर्माण संभव हो सके।

संविधान ने वैज्ञानिक मानसिकता के विकास को देश के नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों में शामिल किया है। सचमुच कभी स्वामी विवेकानंद ने भी रूढ़िवादी परम्पराओं, जड़ मान्यताओं, अंधविश्वास, कुरीति, पाखंड मुक्त, बराबरी पर आधारित, आधुनिक युवा भारत के निर्माण का सपना देखा था तथा आजीवन इसके लिए प्रयासरत रहे, अपना संदेश लोगों तक पहुंचाते रहे, लोगों को जगाते रहे, उन्हें प्रेरित करते रहे। आजाद भारत में 12 जनवरी, स्वामी विवेकानंद जयंती को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। ऐसे में बेहद जरूरी है इस अवसर पर स्वामी विवेकानंद के विचारों, कार्यों एवं उनके सपनों के भारत को याद करना।

स्वामी विवेकानंद न सिर्फ भारत की आज़ादी के प्रबल समर्थक थे बल्कि वे देश की सामाजिक विसंगतियों एवं विकृतियों से भी अच्छी तरह परिचित थे तथा उसे तर्कसंगत ढंग से दूर करना चाहते थे। यही वजह है कि प्रबल धार्मिक आस्था होने के बावजूद वे अंधश्रद्धालु एवं अंधविश्वासी कत्तई नहीं बने तथा तर्कशील एवं प्रगतिशील समाज व्यवस्था के पक्षधर थे। इसलिए उन्होंने कहा – ” मुझे विश्वास है कि ईश्वर उस व्यक्ति को तो क्षमा कर दे सकता है, जो अपनी बुद्धि का प्रयोग करता है और आस्था नहीं रखता, किंतु वह उसे क्षमा नहीं करेगा, जो उसकी दी हुई शक्ति का उपयोग किए बिना ही विश्वास कर लेता है … हमें तर्क अवश्य करना चाहिए और जब ये पैगम्बर और महापुरूष, जिनकी चर्चा सभी देशों की प्राचीन पुस्तकों में है, तर्क की कसौटी पर खरे उतरे़, तभी इनमें विश्वास किया जाना चाहिए। वे भाग्य, प्रारब्ध, ज्योतिष जैसी चीजों पर विश्वास नहीं करते थे।

वे मानते थे कि ” ज्योतिष एवं इसी प्रकार की रहस्यवादी बातें कमजोर दिमाग की निशानियां हैं। इसलिए जैसे ही ये हमारे दिमाग को जकड़ने लगे, हम चिकित्सक को दिखाएं, अच्छा भोजन लें और आराम करें। अंधविश्वास हमारा बड़ा शत्रु है और धोखेबाजी तो इससे भी बड़ा। जब अंधविश्वास प्रवेश करता है तो दिमाग निकल जाता है। ” इससे स्पष्ट है कि वे रूढ़ परम्पराओं, मूढ़ मान्यताओं कुरीतियों एवं पाखंड के घोर विरोधी थे। यहां तक कि इसको लेकर वे पुरोहिती शक्ति के भी प्रबल आलोचक थे। वे मानते थे कि पुरोहिती स्वभावत: निर्दय और हृदयहीन चीज है। वे पुरोहिती छल को भारत के लिए अभिशाप मानते थे। यही नहीं, देश के पिछड़ापन के लिए बहुत हद तक वे पुरोहित वाद को भी जिम्मेदार मानते थे तथा उसे प्रगति विरोधी करार देते थे।

उन्होंने दो टूक कहा ” आओ, मनुष्य बनो। उन्नति के सदा विरोधी पुरोहितों को धक्का देकर दूर हटा दो, क्योंकि वे कभी सुधरेंगे नहीं। उनके हृदय कभी उदार नहीं होंगे। वे तो शताब्दियों के कुसंस्कार और अत्याचार से उत्पन्न हुए हैं। पहले पुरोहिती छल को जड़ से उखाड़ फेंको। अपने संकीर्ण बिलों से बाहर निकलो और आंखें खोलकर देखो कि अन्य सब देश कैसे आगे बढ़ रहे हैं। देश के करोड़ों गरीबों, वंचितों की दुर्दशा एवं पीड़ा उन्हें गहरे बेचैन करती थी। इस मुद्दे पर उनका आक्रोश इन शब्दों में फूटा – ” जिस देश में लाखों मनुष्य महुए के फूल से पेट भरते हैं, जहां दस – बीस लाख साधु और दस – एक करोड़ ब्राह्मण इन गरीबों का रक्त चूसते हैं।, पर उनके सुधार का रत्ती भर भी प्रयास नहीं करते। नए एवं आधुनिक भारत के निर्माण के लिए उनकी स्पष्ट समझ थी कि ” हमें यात्रा करनी चाहिए। यदि हमें भारत को सचमुच पुनः एक सशक्त देश या राष्ट्र बनाना है तो यह देखना चाहिए कि दूसरे देशों में समाज यंत्र किस प्रकार चल रहा है। दूसरे राष्ट्रों की विचारधाराओं के साथ हमें मुक्त और खुले दिल से संबंध रखना चाहिए। ” उनकी ये बातें खुद ही बहुत कुछ कह जाती हैं।

स्वामी विवेकानंद मानते थे कि भारत वर्ष में सभी अनर्थों की जड़ है- जन साधारण की गरीबी। उनकी नजर में ” हमारा सबसे बड़ा राष्ट्रीय पाप जन समुदाय की उपेक्षा है और वह भी हमारे पतन का एक कारण है। इस संबंध में अपनी पीड़ा जहिर करते हुए उन्होंने कहा – ” पुरोहिती शक्ति और विदेशी विजेतागण सदियों से उन्हें कुचलते रहे हैं, जिसके फलस्वरूप भारत के गरीब बेचारे यह तक भूल गए हैं कि वे भी मनुष्य हैं। हमारे अभिजात पूर्वज साधारण जन समुदाय को जमाने से पैरों तले कुचलते रहे, इसके कारण वे एकदम असहाय हो गए। वे मानते हैं कि भारत के सत्यानाश का मुख्य कारण यही है कि देश की संपूर्ण विद्या – बुद्धि, राज शासन और दंभ के बल से मुट्ठी भर लोगों के एकाधिकार में रखी गई है। वे यहीं नहीं रूकते। वे कहते हैं ” पृथ्वी पर ऐसा कोई धर्म नहीं है, जो हिन्दू धर्म के समान इतने उच्च स्वर से मानवता के गौरव का उपदेश करता हो, और पृथ्वी पर ऐसा कोई धर्म नहीं है, जो हिन्दू धर्म के समान गरीबों और नीची जाति वालों का गला ऐसी क्रूरता से घोंटता हो। वे खुद से ही सवाल करते हैं – क्या हम मनुष्य हैं ? तथा कहते हैं – पता नहीं कब एक मनुष्य दूसरों से भाईचारे का बर्ताव करना सीखेगा। फिर स्वयं जबाव देते हुए कहते हैं – ” पुरोहित प्रपंच ही भारत की अधोगति का मूल कारण है। ‘

वे देश में करोड़ों गरीबों, वंचितों की उपेक्षा, उनके साथ होने वाले भेदभाव एवं दुर्व्यवहार से आहत थे तथा दो-टूक कहा कि – ” जब तक करोड़ों लोग भूखे और अशिक्षित रहेंगे, तब तक मैं प्रत्येक उस आदमी को विश्वासघातक समझूंगा, जो उनके खर्च पर शिक्षित हुआ है, परन्तु जो उन पर तनिक भी ध्यान नहीं देता। वे लोग जिन्होंने गरीबों को कुचलकर धन पैदा किया है और अब ठाठबाट से अकड़ कर चलते हैं, यदि उन करोड़ों देशवासियों के लिए जो इस समय भूखे और असभ्य बने हुए हैं, कुछ नहीं करते, तो वे घृणा के पात्र हैं।”

स्वामी विवेकानंद का मानना था कि हमने राष्ट्र की हैसियत से अपना व्यक्ति भाव को दिया है तथा यही सारी खराबी का कारण है। हमें राष्ट्र को उसके खोए हुए व्यक्ति भाव को वापस लाना है और जन समुदाय को उठाना है। अधिक धर्म चर्चा पर उनका बेवाक कहना था कि … देखते नहीं, भारत पेट की चिंता से बेचैन है। धर्म की बात सुनाना हो तो, पहले इस देश के लोगों के पेट की चिंता को दूर करना होगा। नहीं तो केवल व्याख्यान देने से विशेष लाभ नहीं होगा। पहले रोटी और तब धर्म चाहिए। गरीब बेचारे भूखों मर रहे हैं और हम उन्हें आवश्यकता से अधिक धर्मोपदेश दे रहे हैं। महज मत-मतांतरों से पेट नहीं भरता। ” वे मानते थे कि भारतीय राष्ट्र झोपड़ियों में बसता है पर अब तक उनके लिए कुछ नहीं किया गया। उनकी राय में … यदि हमें फिर से उन्नति करनी है तो हमको जनता में शिक्षा का प्रसार करना होगा ‌सर्वसाधारण को शिक्षित बनाइए एवं उन्नत कीजिए तभी एक राष्ट्र का निर्माण संभव हो सकता है ‌

स्वामी विवेकानंद यह मानते थे कि विचार और कार्य की स्वतंत्रता ही जीवन और कुशल क्षेम का एकमेव साधन है। जहां यह स्वतंत्रता नहीं है, वहां मनुष्य, उस जाति या राष्ट्र की अवनति निश्चित होगी। वे यह भी मानते थे कि भारत के पतन एवं दुःख दारिद्र्य का मुख्य कारण यह है कि हमने घोंघे की तरह अपना सर्वांग समेटकर उसने अपना कार्यक्षेत्र संकुचित कर लिया तथा आर्येत्तर दूसरी मानव जातियों के लिए, जिन्हें सत्य की तृष्णा थी, अपने जीवनप्रद सत्य रत्नों का भंडार नहीं खोला था। स्वामी विवेकानंद ने कहा कि हमारे मस्तिष्क से व्यर्थ के देवी-देवताओं के हट जाने में कुछ भी हानि नहीं। हमारा देश ही हमारा जाग्रत देवता है। जिन व्यर्थ के देवी-देवताओं को हम देख नहीं पाते, उनके पीछे तो हम बेकार दौड़ें और जिस विराट देवता को हम अपने चारों ओर देख रहे हैं, उसकी पूजा ही न करें?


उनकी राय में भारत तभी जगेगा जब विशाल हृदय वाले सैकड़ों स्त्री पुरुष भोग-विलास और सुख की सभी इच्छाओं को विसर्जित कर मन, वचन और शरीर से उन करोड़ों भारतीयों के कल्याण के लिए सचेष्ट होंगे जो दरिद्रता और मूर्खता के अगाध सागर में निरंतर डूबते जा रहे हैं। वे मानते थे कि हमारे कार्यों पर ही भारत का भविष्य निर्भर करता है। अतः हम लोगों को इस समय कठिन परिश्रम करना होगा। उनकी नजर में उन्नत भारत की तस्वीर कुछ इस प्रकार थी – ” मैं अपने मानस चक्षु से भावी भारत की उस पूर्णावस्था को देखता हूं, जिसका इस विप्लव और संघर्ष से तेजस्वी और अजेय रूप से वेदांती बुद्धि और इस्लामी शरीर के साथ उतत्थान होगा। हमारी मातृभूमि के लिए इन दोनों विशाल मतों का सामंजस्य – हिंदुत्व और इस्लाम – वेदांती बुद्धि और इस्लामी शरीर – यही एक आशा है। उनका स्पष्ट कहना था – हमारी मातृभूमि भारत अपनी गंभीर निंद्रा से अब जाग रही है।अब कोई उसे नहीं रोक सकता। अब यह फिर सो भी नहीं सकती। कोई वाह्य शक्ति इसे दवा नहीं सकती क्योंकि यह असाधारण शक्ति का देश अब जागकर खड़ा हो रहा है।

स्वामी विवेकानंद को देश की युवा शक्ति पर बहुत भरोसा था। उन्होंने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा था – ” तुम बलवान बनो। गीता पढ़ने की अपेक्षा तुम फुटबॉल खेलने से स्वर्ग के अधिक समीप पहुंचोगे। बलवान शरीर तथा मजबूत पुट्ठों से तुम गीता को अधिक समझ सकोगे। ” उन्होंने स्वीकार किया कि सब कुछ हो जाएगा किंतु आवश्यकता है वीर्यवान, तेजस्वी नवयुवकों की इस प्रकार के सौ नवयुवकों से भी संसार को बदला जा सकता है। युवकों को अपने भावपूर्ण संबोधन में उन्होंने कहा – युवकों, मैं गरीबों, और उत्पीड़ितों के लिए इस सहानुभूति और प्राणप्रण प्रयत्न को थाती के तौर पर तुम्हें अर्पण करता हूं। … प्रतिज्ञा करो कि अपना सारा जीवन इन करोड़ों ‌देशवासियों के उद्धार कार्य में लगा दोगे जो दिनों-दिन अवनति के गर्त में गिरते जा रहे हैं। हमें भारत को और पूरे संसार को जगाना है। स्वामी विवेकानंद ने भारत का निर्माण करना चाहते थे। नया भारत गढ़ना चाहते थे।

नया भारत की उनकी परिकल्पना कुछ इस प्रकार की थी – ” एक नवीन भारत निकल पड़े – वह निकले हल पकड़ कर, किसानों की कुटी भेदकर, मछुआ, माली, मोची, मेहतरों की झोपड़ियों से, निकल पड़े बनियों की दुकानों से, भुजवा के भाड़ के पास से, कारखाने से, हाट से बाजार से। निकले झाड़ियों, जंगलों, पहाड़ों, पर्वतों से । अतीत के कंकाल समूह – यही है तुम्हारे सामने तुम्हारा उत्तराधिकारी भावी भारत।


डी एन एस आनंद
महासचिव, साइंस फार सोसायटी झारखंड
संपादक, वैज्ञानिक चेतना साइंस वेब पोर्टल जमशेदपुर झारखंड

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