केंद्र सरकार जैविक खेती (Organic Farming) को बढ़ावा दे रही है. वहीं स्वास्थ्य के प्रति बढ़ते जागरूकता के कारण जैविक उत्पादों की मांग बढ़ रही है. भारत में काफी तेजी से जैविक खेती का रकबा बढ़ रहा है. कई राज्य तो जैविक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष अभियान चला रहे हैं. मांग और समय की जरूरत को देखते हुए जैविक खेती किसानों (Farmers) के लिए आमदनी का एक बेहतर जरिया बनता जा रहा है. साथ ही जैविक खेती के लिए जरूरी वर्मी कम्पोस्ट (Vermicompost) खाद से भी किसान भरपूर कमाई कर रहे हैं. 

उत्तराखंड के कदम जैविक राज्य बनने की तरफ आगे बढ़ रहे हैं। बाजार में जैविक उत्पादों की मांग को देखते हुए प्रदेश के किसानों का रुझान भी जैविक खेती के प्रति बढ़ रहा है। यही वजह है कि बीते चार सालों में उत्तराखंड में जैविक खेती का रकबा बढ़ा है। परंपरागत कृषि विकास योजना के तहत 6100 क्लस्टरों के माध्यम से 1.23 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को जैविक खेती के अधीन लाने पर काम चल रहा है। राज्य गठन के बाद उत्तराखंड में कृषि क्षेत्रफल में कमी आई है। 20 सालों में 15 से 17 प्रतिशत की कृषि क्षेत्रफल कम हुआ है। वर्तमान में 6.48 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में लगभग नौ लाख किसान खेती कर रहे हैं। उत्तराखंड को जैविक राज्य बनाने की दिशा में किसानों ने जैविक खेती की तरफ कदम बढ़ाए हैं। जिससे जैविक खेती का रकबा बढ़ रहा है।

साढ़े चार लाख किसान कर रहे जैविक खेती
चार साल पहले प्रदेश में 16 हजार हेक्टेयर पर ही जैविक खेती होती थी। जो बढ़ कर 2.30 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गई है। कुल कृषि क्षेत्र के 34 प्रतिशत पर जैविक विधि से परंपरागत फसलों, फल, सब्जी, दालें, जड़ी-बूटी, एरोमा फसलों की खेती की जा रही है। लगभग साढ़े चार लाख किसान जैविक खेती कर रहे हैं। 

जैविक खेती के लिए वर्मी कम्पोस्टं खाद काफी अहम है. जैविक खेती के रकबा में बढ़ोतरी के चलते इसकी मांग भी तेजी से बढ़ी है. यहीं कारण है कि कुछ किसान जैविक खेती के साथ पशुपालन भी करते हैं और इस खाद को तैयार करते हैं. इससे उन्हें अच्छा मुनाफा हो रहा है.वर्मी कम्पोस्ट एक तरह का खाद है. इसे केंचुआ खाद भी कहते हैं. हरियाणा के रेवाड़ी जिले में कुछ किसान वर्मी कम्पोस्ट तैयार कर बिक्री करते हैं. वर्तमान में उन्हें हर महीने लाखों में कमाई हो रही है. यहां के किसानों को देश के कई राज्यों से ऑर्डर मिलते हैं. वे कहते हैं कि हम सिर्फ खाद बेचते ही नहीं हैं बल्कि किसानों को वर्मी कम्पोस्ट तैयार करने का प्रशिक्षण भी देते हैं.

वर्मी कम्पोस्ट बनाने की विधि

इस खाद को तैयार करने के लिए सबसे जरूरी अवयव गोबर है. इसे बनाने के लिए किसान गोबर को गोलाई में इकट्ठा किया जाता है और इसमें केंचुआ छोड़ा जाता है. इसे किसान जूट के बोरे से ढ़क देते हैं और ऊपर से पानी का छिड़काव करते हैं ताकि नमी की मात्रा बनी रही. कुछ दिन बाद केंचुए गोबर को वर्मी कम्पोस्ट में बदल देते हैं.

क्यों बढ़ रही है वर्मी कम्पोस्ट की मांग?

गोबर से तैयार वर्मी कम्पोस्ट में सभी पोषक तत्व मौजूद रहते हैं. इसके इस्तेमाल से मिट्टी की उर्वरा शक्ति में बढ़ोतरी होती है, जिससे किसानों को अधिक पैदावार मिलती है. वहीं इससे पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर असर नहीं पड़ता. रसायनिक खाद के मुकाबले यह सस्ता है. ऐसे में कृषि लागत में कमी आ जाती है, जिससे किसानों की आमदनी में इजाफा हो जाता है.

उत्तराखंड जैविक उत्पाद परिषद के प्रबंध निदेशक विनय कुमार का कहना है कि प्रदेश के किसान अब जैविक खेती की तरफ प्रोत्साहित हो रहे हैं। जिसकी वजह से जैविक खेती का रकबा हर साल बढ़ रहा है। परंपरागत कृषि विकास योजना के तहत 6100 क्लस्टरों के माध्यम से 1.23 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को जैविक खेती के दायरे में लाने की योजना है। इस पर काम चल रहा है। जबकि 4600 क्लस्टरों पर किसान जैविक खेती कर रहे हैं। 

पीजीएस प्रणाली से जैविक उत्पाद के गुणवत्ता की गारंटी
सहभागिता जैविक प्रतिभूति प्रणाली (पीजीएस) जैविक उत्पादन की एक  ऐसी प्रक्रिया है, जो स्थानीय स्तर पर उत्पादक और उपभोक्ता की भागीदारी को सुनिश्चित कर तृतीय पक्षीय प्रणामीकरण प्रक्रिया से अलग रहकर उत्पाद गुणवत्ता की गारंटी देती है। पीजीएस प्रणाली के तहत वर्तमान में 1.20 लाख मीट्रिक टन खाद्यान्न और 1.30 लाख मीट्रिक टन फल व सब्जियों का उत्पादन हो रहा है।

चार वर्षों में जैविक खेती का क्षेत्रफल

 वर्ष क्षेत्रफल हेक्टेयर में
2017-18  35106
2018-19 124365
2019-20    154226
2020-21 230540

 

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