विकास कुमार

बुधवार 8 फरवरी को अमेरिका के  प्रतिष्ठित ऑस्कर अवार्ड के  लिए मनोनीत फिल्मों की घोषणा हुई. भारत की ओर से बहुचर्चित फिल्म ‘ जय भीम ‘ पर सबकी नज़र थी. लेकिन इसके विपरीत खुशखबरी आई की भारत की  ‘राइटिंग विद फायर’ ( Writing with Fire ) नाम की डॉक्यूमेंट्री को अमेरिका के बहुप्रतिष्ठित ओस्कार्स अवार्ड्स ( Oscars ) के ‘Best Documentary Feature Film’ के लिए मनोनीत किया गया है. यह पहला मौका है जब भारत की किसी डाक्यूमेंट्री फ़िल्म का ऑस्कर के लिए nomination हुआ , इसलिए यह ऐतिहासिक लम्हा था भारत के फिल्म जगत के लिए. रिंटू थॉमस और सुष्मित घोष द्वारा निर्देशित फिल्म  ‘खबर लहरिया’ की टीम के अखबार से डिजिटल मीडिया बनने के सफर को बताती है. यह भारत  में अकेला ऐसा न्यूज़ नेटवर्क है जिसे सिर्फ महिलाएं चलाती हैं। यह महिलाएं दलित, मुस्लिम आदिवासी और पिछड़ी माने जाने वाली जातियों से हैं। वे समाज के शोषित वर्गों  के मुद्दों को उठाने का काम करती है. 

2002 में अखबार के माध्यम से शुरू हुआ सफ़र

वर्ष 2002 में उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के चित्रकूट से अख़बार के प्रकाशन से खबर लहरिया की शुरुआत हुई। ‘निरंतर ट्रस्ट’ और ‘प्रगति : एक प्रयास फेडरेशन-सामाख्या’ के  सहयोग से  मीरा जाटव, शालिनी जोशी और कविका बुंदेलखंडी ने साथ मिलकर इसकी शुरुआत की . 40 ग्रामीण महिलाओं का एक समूह बना और इन्होंने अखबार के हर छोटे बड़े काम जैसे लेखन, संपादन , डिस्ट्रीब्यूशन को करना शुरू किया. दूसरा संस्करण अक्टूबर 2006 में आसपास के बांदा जिले में लॉन्च किया गया। शुरुआती साल में ही खबर लहरिया को 400 से अधिक गांवों में 25,000 से अधिक पाठक मिले.

फेमिनिस्म इंडिया अख़बार को दिए साक्षात्कार में पत्रिका की संपादक कविता बुंदेलखंडी पत्रिका के इतिहास के बारे में बताती हुई कहती है  ‘’ खबर लहरिया ग्रामीण परिप्रेक्ष्य से संचालित एक वैकल्पिक मीडिया प्लेटफ़ॉर्म है जो साल 2002 में उत्तरप्रदेश के चित्रकूट ज़िले में शुरू हुआ था। यह अख़बार ग्रामीण महिलाओं के एक समूह द्वारा बुंदेली में शुरू किया गया था। इसमें गांव के रोज़मर्रा के मुद्दे, उनसे जुड़े सवाल और हाशिए पर स्थित इलाकों की घटनाओं को प्रमुखता से स्थान दिया जाता था। इस संस्थान में स्थानीय महिलाएं ही पत्रकार की भूमिका में थीं। ख़ास बात यह है कि यह ‘ऑल वीमेंस ऑर्गनाइज़ेशन’ है। इसमें कुछ ऐसी भी औरतें थीं जो केवल पांचवीं या आठवीं तक पढ़ी थी, यानी इसमें काम करने वाले लोग ‘प्रोफेशनल’ पत्रकार नहीं थे, लेकिन फिर भी हमने पुख्ते तौर पर महत्वपूर्ण स्थानीय मुद्दों को उठाया और ज़िम्मेदार लोगों से सवाल किए। साल 2002 में ग्रामीण आदिवासी इलाकों में पढ़ने- लिखने की कोई सामग्री मौजूद नहीं थी, न ही उनके मुद्दों पर बात की जाती थी, इसलिए जब हमने अखबार शुरू किया तो गांव के कुछ लोगों ने इसे हाथों-हाथ लिया। हमारे इस अखबार ने गांव वालों को बाहरी लोगों से जोड़ा। इसको शुरू करने के पीछे सोच थी, समाज में मौजूद उस पारंपरिक धारणा को तोड़ने की, जो औरतों को कमज़ोर मानती है और जिसे लगता है कि पत्रकारिता जैसे जटिल कार्यक्षेत्र में महिलाएं टिक नहीं पाएंगी। इसलिए, हमने नारीवादी चश्मे से एक अखबार शुरू किया। शुरुआत में, खबर लहरिया दो पन्ने का अखबार था, ब्लैक एंड व्हाइट। धीरे-धीरे, जैसे- जैसे हमारी पहुंच बढ़ी, ख़बर लहरिया 2 से 4 पन्ने का हुआ, फिर 6 और आख़िर में 8 का, उसके बाद क़रीब साल 2014-15 में हम पूरी तरह से डिजिटल हो गए ”.

ख़बर लहरिया की शुरआत में चित्रकूट, महोबा जैसे इलाकों में बुंदेली  भाषा में इसका प्रकाशन हुआ. बाद में पत्रिका का विस्तार हुआ. लखनऊ और उसके आस-पास के इलाकों में अवधी में, फिर वाराणसी और आस-पास के क्षेत्र के लिए भोजपुरी में और उसके बाद क़रीब 3-4 साल बिहार के सीतामढ़ी में भी वहां की स्थानीय बोली ‘वज्जिका’ में इसका प्रकाशन हुआ.

इन्टरनेट के उदय के बाद ख़बर लहरिया प्रिंट मीडिया से रूपांतरण करके पूरी तरह डिजिटल स्वरुप में आ गया. इसमें अब अंग्रेजी में भी लेख छपते हैं और इसका अलग फेसबुक पेज और youtube चैनल भी है. आज खबर लहरिया कई डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए हर महीने 50 लाख लोगों तक पहुंचता है। इसके  पास उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के 13 जिलों में 30 महिला पत्रकारों और स्ट्रिंगरों का एक नेटवर्क है।

खबर लहरिया की पहचान जमीनी मुद्दों की पत्रकारिता

खबर लहरिया की पत्रकारिता की ख़ासियत है की उनकी ख़बरें स्थानीय मुद्दों पर केन्द्रित होती हैं . आज कॉर्पोरेट मीडिया के युग में जब जनता से जुड़े मुद्दे गायब हैं, खबर लहरिया उन मुद्दों को उठाने का काम करती है जो राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मीडिया की चर्चा और ध्यान से बहुत दूर हैं। खबर लहरिया ने विभिन्न ज़रूरी मुद्दों पर लिखने का प्रयास किया है , इनमे जातिवाद, धार्मिक कट्टरता, आदिवासियों के साथ शोषण, लिंग आधारित भेदभाव इत्यादि प्रमुखता से शामिल किए गए हैं. खबर लहरिया खासतौर पर सरकार की ग्रामीण विकास और सशक्तीकरण के लिए बनाई गई योजनाओं के दावों और उनकी हकीकत के बीच के अंतर को उजागर करता आया है . इसमें मनरेगा नरेगा की जाँच पड़ताल, सूखे की मार से परेशान किसानों , आम आदमी की समस्या हो या सूखे की वजह से लोगों की पलायन की कहानी, या फिर शिक्षा/ स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी पर रिपोर्ट आदि शामिल है.

प्रशासनिक उपेक्षा, महिलाओं के खिलाफ अपराधों की कहानियों को आगे बढ़ाने और प्रकाश में लाने के लिए इन महिला रिपोर्टर्स को पुरुष प्रधान समाज में जाति और लिंग के पूर्वाग्रहों के साथ निरंतर लड़ाई लड़नी पड़ी । प्रतिकूल वातावरण में,  दलित महिला की पहचान  होने के कारण कई बार उपेक्षा का सामना भी करना पड़ा है, लेकिन इन चुनतियां का उन्होंने डट कर सामने किया.

पत्रकारिता के लिए मिल चुका देश दुनिया में कई सम्मान

मार्च 2004 में खबर लहरिया को मीडिया फाउंडेशन, नई दिल्ली के द्वारा प्रतिष्ठित चमेली देवी जैन पुरस्कार मिला –  यह महिला पत्रकारों के लिए एक वार्षिक पुरस्कार है. 2009 में यूनेस्को द्वारा किंग सेजोंग लिट्रेसी सम्मान भी मिला. 2012 में अखबार ने लिंग संवेदनशील रिपोर्टिंग के लिए लाडली मीडिया अवार्ड जीता. 2013 में कवि कैफ़ी आज़मी की याद में अखबार को कैफ़ी आज़मी पुरस्कार प्रदान किया गया था. 2014 में, जर्मन मीडिया चैनल ड्यूश वेले द्वारा प्रतिष्ठित ग्लोबल मीडिया फोरम अवार्ड से सम्मानित किया गया.

सामाजिक बदलाव की एक पहचान खबर लहरिया

इसने करीब 20 वर्षो में लंबे समय से ज़मीनी रिपोर्टिंग के क्षेत्र में एक बड़ा मुकाम हासिल किया. भारत में महिला पत्रकारों की संख्या शुरू से काफी कम रही है. बीते कुछ दशकों में टेलीविज़न, डिजिटल मीडिया के उभार  से भले न्यूज़रूम में महिलाओं की संख्या पहले से ज्यादा दिख रही है, लेकिन अब भी वे निर्णायक भूमिका में कम ही दिखती हैं. मुख्यधारा की मीडिया में दलित, आदिवासी, मुस्लिम रिपोर्टर ( पुरुष और महिला दोनों )  की संख्या भी नदारद है. ऐसे में ख़बर लहरिया ने ना सिर्फ वैकल्पिक मीडिया के तौर पर उम्मीद पेश की, बल्कि भारत जैसे देश में जहाँ जाति और लिंग आधारित असमानता की खाई काफी बड़ी है , ऐसे में एक नए सामाजिक बदलाव की मिशल पेश की है. रिंटू थॉमस और सुष्मित घोष खबर लहरिया की पत्रकारिता के द्वारा सामाजिक संघर्ष और बदलाव  की इस लम्बी यात्रा को दुनिया के सामने पेश करने पर बधाई के पत्र है. आशा है यह फिल्म ऑस्कर जीतकर भारत के फ़िल्म जगत का नाम रोशन करेगी और सामाजिक सरोकार पर बनी फ़िल्मों को आगे भी प्रोत्साहन मिलेगा

खबर लहरिया पर फिल्म ‘ Writing with Fire’ लोहरदगा में होने वाले पहले झारखंड साइंस फिल्म फेस्टिवल में भी प्रदर्शित की जाएगी.

विकास कुमार स्वतंत्र पत्रकार और रिसर्चर है .

वे साइंस फिल्म फ़ेस्टिवल के को-ऑर्डिनेटर हैं एवं वैज्ञानिक चेतना के साथ भी जुड़े हैं

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