विकास कुमार

मोटरसाइकिल से, कड़ी धूप में, करीब 50 km सफर तय करने के बाद मैं उत्तर प्रदेश के सोनभद्र ज़िले के रेनुकूट में स्थित रिहंद बांध पहुंचा. इस विशाल जलाशय को देखकर मैं विस्मित हो उठा. देश में कई सारे बांध पर मैं जा चुका हूं, लेकिन इसकी विशालता अचरज पैदा करती है. मेरे साथ गए पत्रकार साथी जगत नारायण विश्वकर्मा मुझे बताते हैं कि क्षेत्रफल के हिसाब से एशिया का यह सबसे बड़ा कृतिम डैम है. रेणुका नदी पर बने इस बांध का कैचमेंट एरिया मध्य प्रदेश तक फैला हुआ है. वे बताते हैं कि यह डैम 1960 में बनकर तैयार हुआ था. पंडित नेहरू जब 1962 में सोनभद्र आए थे उन्होंने इसे विकास का मंदिर कहा था. और सपना देखा था कि यह क्षेत्र एक दिन स्वीट्जरलैंड बनेगा।

 

रिहंद डैम आज सोनभद्र के लाखों लोगों के लिए जीवन स्रोत्र है. इस डैम का पानी ज़िले के साथ एम पी के सिंघरौली जिले के 20 लाख आबादी और 11 तापीय परियोजनाओं का प्यास बुझाता है. मेरे साथ कुछ स्थानीय साथी, मुझे ऊपरी क्षेत्र का भ्रमण करने के लिए साथ लेकर बीजपुर रिहन्द तापीय परियोजना लेकर चलते हैं. बांध से करीब 100 मीटर की दूरी पर ही स्थित एक और जलाशय दिखता है. एक लंबे पाइप से कचरा इस जलाशय को भरता है. यह एक फ्लाई ऐश डंप यार्ड है. पास में स्थित NTPC के थर्मल पॉवर प्लांट में कोयला जलाने के क्रम में फ्लाई ऐश निकलता है, जिसका निस्तारण इस डंप यार्ड में किया जा रहा है. फ्लाई ऐश (Fly Ash) कई पदार्थों जैसे – कोयला आदि को जलाने से निर्मित महीन कणों से बनी होती है। ये महीन कण वातावरण में उत्सर्जित होने वाली गैसों के साथ ऊपर उठने की प्रवृत्ति रखते हैं। इसके इतर जो राख/ऐश ऊपर नहीं उठती है, वह ‘पेंदी की राख’ कहलाती है।कोयला संचालित विद्युत संयंत्रों से उत्पन्न फ्लाई ऐश को प्रायः चिमनियों द्वारा ग्रहण कर लिया जाता है. फ्लाई ऐश में भारी धातु जैसे आर्सेनिक, सिलिका, एल्युमिनियम, मरक्यूरी और आयरन फ्लोराइड होते हैं, जो दमा, फेफड़े में तकलीफ, टीबी और यहां तक कि कैंसर तक का कारण बनते हैं. यानी हमारे घरों को रोशन कर रही बिजली के विकास क्रम में यह बाई प्रोडक्ट है जो जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा हैं.

इसके अलावा आसपास लगभग मैँ तीन फ्लाई ऐश डैम का भ्रमण करता हूँ. कुछ डैम में कचरा सूख चुका है और महीन परत का रूप ले चुका है. पत्रकार जगत विश्वकर्मा बताते हैं कि रिहंद बांध के नजदीक कई सारे सरकारी और निजी पावर प्लांट के फ्लाई ऐश डैम हैं. एक वक्त कंपनियों द्वारा फ्लाई ऐश को सीधे रिहंद नदी में बहाना आम बात थी. रिहंद डैम के नजदीक में ही इन फ्लाई ऐश डैम के निर्माण को भी वह बड़ी लापरवाही बताते हैं. बारिश के वक्त इन फ्लाई ऐश डैम से हुए लीकेज से जहरीला रसायन का, बांध में रिसाव होता है. कानूनी हस्तक्षेप के बाद ज़रूर कंपनियां गहरे निद्रा से जगी और इसके निस्तारण पर ध्यान दिया. लेकिन अनपरा और ओबरा तापीय परियोजना इस मामले में बहुत पीछे है। इन परियोजनाओं में अब भी पर्यावरण को बचाने की इच्छाशक्ति कम ही दिखती जिससे आए दिन दुर्घटना होती है

 

सोनभद्र – सिंगरौली क्षेत्र में फ्लाई ऐश डैम दुर्घटनाओं का लंबा इतिहास

ash pond breach in Singrauli, as on April 10, 2020. Pic: Kripanath Yadav

सिंगरौली क्षेत्र के 150 वर्ग किलोमीटर के इलाके में करीब 350 छोटी बड़ी इंडस्ट्रीज हैं. इसमें उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के 269 गाँव आते हैं. सोनभद्र-सिंगरौली में 10 कोयला आधारित पावर प्लांट हैं. हर साल 21,000 मेगावॉट बिजली उत्पादित की जाती है जो नजदीकी राज्यों को भी दी जाती है. इसके लिए साल भर में 10.3 करोड़ टन कोयले की खपत होती है। इतनी बड़ी मात्रा में कोयले की खपत के कारण हर साल औसतन 3.5 करोड़ टन फ्लाई ऐश (राख) पैदा होती है लेकिन पर्याप्त निस्तारण के अभाव में यहाँ पर दुर्घटना आम बात हो चुकी है

सोनभद्र से सटे मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले ने पिछले साल देशभर में सुर्खियां तब बटोरी जब 10 अप्रैल, 2020 को रिलायंस पावर के ‘फ्लाई ऐश डम्प यार्ड’ टूट गया था. इससे निकले ज़हरीले मलबे से काफी जान-माल की क्षति हुई है और इस हादसे में दो लोगों की मौत हो गई और 6 किलोमीटर तक कृषि योग्य भूमि में जहरीले कचरे का फैलाव हो गया। यह मलबा रेणुका नदी पर बने रिहंद बांध तक पहुँच गया था

Reliance Power Plant Fly Ash Dump yard accident in 2020 ( image courtesy : Indian Express )

अक्टूबर 2019 में एनटीपीसी विंध्याचल का ऐश डैम टूटने के बाद क़रीब 35 लाख मीट्रिक टन से ज़्यादा राख  रिहंद जलाशय में गिरी थी. रिहंद जलाशय’ में राख गिरने से हुए नुकसान पर NGT  अंतरिम मुआवजे के तौर पर 10 करोड़ रुपये देने के निर्देश दिया था.

NTPC Fly Ash Dump yard accident in 2019 ( image courtesy : NDTV )

इससे पहले 13 अप्रैल 2014 को भी सिंगरौली के एस्सार पावर प्लांट का ऐश डैम टूट गया था। इसकी जद में आये खेत आज भी बंजर हैं।

खतरनाक रसायन हो रहा जानलेवा

image courtesy : down to earth

अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान ( All India Institute of Ayurveda ) द्वारा वर्ष 2018 में सोनभद्र-सिंगरौली के कुछ गांवों में कई तरह के नमूने लिए थे। रिपोर्ट में पाया गया कि 40 किमी क्षेत्र में फैले इस इलाके की लगभग 20 लाख लोगों की आबादी पारा (mercury) जनित प्रदूषण की शिकार है.  इससे महिलाओं का आकस्मिक गर्भपात हो रहा है, एनिमिया जैसी बीमारियां हो रही हैं। किसान भी इस प्रदूषण की समस्या झेल रहे है़, क्योंकि फसल उत्पादन में गिरावट दर्ज की जा रहीं हैं.

वही फ्लोराईड की मात्रा तय मानक से अधिक होने से भी हज़ारो लोग इसकी चपेट में है. पढ़िए पिछली ग्राउंड रिपोर्ट

http://vaigyanikchetna.com/2021/09/23/thousands-of-people-in-the-grip-of-fluorosis-due-to-pollution-in-sonbhadra/

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण एजेंसी ( Central Pollution Control Board )  ने वर्ष 2018 में सोनभद्र को 22 अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्रों की सूची में डाला  था

विकास के इस मॉडल से किसका फायदा ?

आजादी के बाद औद्योगिकरण के मॉडल ने जहाँ लाखों लोगों को रोजगार प्रदान किया, वहीं स्थानीय आबादी को विस्थापन , पलायन, गरीबी, प्रदूषण की मार बुरी तरह झेलनी पड़ी. खासकर आदिवासी बहुल ज़िले में हुए विकास के प्रोजेक्ट से स्थानीय लोगों को इस विकास में भागीदारी नहीं मिली. आज इन जिलों में आदिवासी, दलित आबादी शिक्षा, स्वास्थ्य , बिजली, स्वच्छ जल के लिए तरस रही है. सोनभद्र की पटकथा भी अन्य आदिवासी बहुल जिलों की तरह इन्हीं समस्यायों के इर्द गिर्द ही लिखी गईं है. रिहंद बांध के निर्माण के कारण हज़ारों लोगों ने अपनी ज़मीन की कुर्बानी दी थी तथा इस विकास के मॉडल में अपना सहयोग दिया था. अन्य कंपनियों के लिए भी लोगों ने अपने खेत खलिहान का त्याग किया. लंबे कानूनी संघर्ष के बाद ही लोगों को जमीन का मुआवजा और पट्टा मिला था. लेकिन बदले में इन कंपनियों ने भेंट में भारी प्रदूषण दिया है. बीते वर्ष सोना के भंडार पाए जाने से चर्चा में आया सोनभद्र की दूसरी तस्वीर इसका विकराल होता जल, वायु प्रदूषण है जो इसे भारत के सबसे प्रदूषित क्षेत्र का ताज पहना चुका है. मरक्यूरी, फ्लोराईड की तय मात्रा के अधिक होने से गांव के गांव तबाह हो रहे हैं. लोग लाइलाज़ बीमारियों का शिकार हो रहे हैं. लोग ज़हरीली हवा में रहने और दूषित पानी पीने को मजबूर हैं. आर्थिक उन्नति के साथ बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, स्वच्छ जल, बिजली , परिवहन  राज्य के अलावा उन तमाम औद्योगिक इकाइयों की भी ज़िम्मेदारी है जो प्राकृतिक संसाधनों से मुनाफा कमाते हैं, क्योंकि प्राकृतिक संसाधनों पर सभी का बराबर का हक हैं.

                            

विकास कुमार स्वतंत्र पत्रकार और रिसर्चर है. वे वैज्ञानिक चेतना के साथ भी जुड़े हैं

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