ललित मौर्य

ब्लू लाइटिंग, मनुष्यों और अन्य जानवरों के शरीर में मेलाटॉनिन हार्मोन के उत्पादन को प्रभावित कर सकती है, जिसकी वजह से उनके नींद के पैटर्न पर असर पड़ सकता है. पहले रात में अंधियारे की चादर ओढ़े तारों को देखना एक अलग ही अनुभव था, लेकिन समय बीता तो न बचपन रहा, न अब वो तारे। पर क्या आपने सोचा है कि ऐसा क्यों है, क्या हमारे आकाश से वो तारे गायब हो रहे हैं या हमारी नजरें कमजोर होती जा रही हैं। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है बस शहरों में रात के समय में भी दिन जैसी रौशनी ने इन सबको धुंधला दिया है, जिसकी वजह से अब शहरों में पहले की तुलना में कम तारे नजर आते हैं।  

इतना ही नहीं बढ़ती एलईडी लाइटिंग से एक नए तरह के प्रदूषण का खतरा बढ़ रहा है, जो इंसान और अन्य जीवों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। इस बारे में एक्सेटर विश्वविद्यालय द्वारा किए नए अध्ययन से पता चला है कि जैसे-जैसे यूरोप में सड़कों और घर के बाहर रौशनी की व्यवस्था के लिए एलईडी का उपयोग बढ़ रहा है उससे एक नए तरह के प्रकाश प्रदूषण का खतरा बढ़ रहा है और इसके चलते कृत्रिम नीली रौशनी बढ़ रही है।

जर्नल साइंस एडवांसेज में प्रकाशित इस शोध के मुताबिक कई यूरोपियन देशों में रात के दौरान सड़कों और इमारतों को रोशन करने के लिए एलईडी का उपयोग कर रहे हैं। इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (आईएसएस) से प्राप्त तस्वीरों से पता चला है कि यूरोप में पुरानी सोडियम लाइटों से पैदा होने वाले नारंगी उत्सर्जन का स्थान अब तेजी से एलईडी द्वारा पैदा हो सफेद उत्सर्जन ले रहा है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक ब्लू लाइटिंग, मनुष्यों और अन्य जानवरों के शरीर में मेलाटॉनिन हार्मोन के उत्पादन को प्रभावित कर सकती है। यह हार्मोन मस्तिष्क में पीनियल ग्रंथि द्वारा निर्मित होता है। प्रकाश इस हार्मोन का दुश्मन होता है, क्योंकि उसकी वजह से इस हार्मोन के उत्पादन पर असर पड़ता है।

वैज्ञानिकों की मानें तो हमारी नींद इसी हार्मोन पर निर्भर करती है। ऐसे में ब्लू लाइटिंग का इस हार्मोन के उत्पादन पर पड़ने वाला असर नींद के पैटर्न में हस्तक्षेप कर सकता है। इसकी वजह से जहां आकाश में तारों का दिखना कम हो गया है। वहीं इसका असर लोगों के व्यवहार पर भी पड़ रहा है। इसी तरह नीली रौशनी चमगादड़ और पतंगे के व्यवहार पर भी असर डाल रही है। 

इस बारे में ज्यादा जानने के लिए शोधकर्ताओं ने आईएसएस से 2012-13 और 2014 से 2020 के बीच ली गई तस्वीरों का विश्लेषण किया है। इनसे पता चला है कि यूरोप के कौन से हिस्से किस हद तक तेजी से एलईडी लाइटिंग में परिवर्तित हो रहे हैं। पता चला है कि जहां यूके, इटली और आयरलैंड की लाइटिंग में इस तरह के व्यापक बदलाव आए हैं।

वहीं ऑस्ट्रिया, जर्मनी और बेल्जियम जैसे अन्य देशों में बहुत कम परिवर्तन देखे गए हैं। शोध से पता चला है कि एलईडी सोडियम बल्ब की तुलना में अलग-अलग तरंग दैर्ध्य पर प्रकाश उत्सर्जित करता है। इसी तरह जिन क्षेत्रों में एलईडी की मदद से रौशनी की व्यवस्था की गई थी वहां नीले प्रकाश के उत्सर्जन में उल्लेखनीय रूप से वृद्धि दर्ज की गई थी।

इंसान और जानवरों दोनों के लिए हानिकारक हो सकती है यह नीली रौशनी

इससे पहले के शोधों से भी पता चला है कि प्राकृतिक वातावरण में बढ़ता कृत्रिम प्रकाश, वन्यजीवों और मनुष्यों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकता है। पता चला है कि बढ़ता प्रकाश प्रदूषण इंसान और जानवरों दोनों के सोने के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है। इतना ही नहीं अंधेरे में रहने वाले कई जीव रात में रौशनी से भ्रमित हो सकते हैं जो उनके जीवन के लिए संकट पैदा कर सकता है।

इसमें कोई शक नहीं कि एलईडी लाइटिंग कहीं ज्यादा ऊर्जा दक्ष हैं, जिनके संचालन पर बहुत कम खर्च आता है, लेकिन साथ ही इनसे पैदा हो रहा ब्लू लाइट रेडिएशन कई समस्याएं भी पैदा कर रहा है। शोधकर्ताओं ने जानकरी दी है कि जिन क्षेत्रों में एलईडी से प्रकाश व्यवस्था की गई है ऐसी जगहों में नीली रोशनी के बढ़ने से वहां के पर्यावरण के साथ-साथ वहां रहने व् काम करने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ सकता है।



ऐसे में इस तरह की प्रकाश व्यवस्था संबंधी नई परियोजनाओं को आगे बढ़ाने से पहले उस क्षेत्र में पर्यावरण, लोगों और अन्य जीवों के स्वास्थ्य पर एलईडी लाइटिंग के प्रभाव को करीब से जानने की जरुरत है।

( ‘डाउन टू अर्थ ‘ पत्रिका से साभार )

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