खगोलीय माप और परमाणु घड़ियों से पृथ्वी (Earth) पर हो रहे एक बड़े बदलाव के बारे में खुलासा हुआ है. पृथ्वी पर दिनों की लंबाई अचानक से लंबी होने लगी है और हैरान करने वाली बात है कि वैज्ञानिक (Scientist) भी नहीं जानते कि ऐसा क्यों हो रहा है? बता दें कि पृथ्वी पर हो रहे इस बदलाव का असर न केवल हमारी टाइमकीपिंग पर, बल्कि जीपीएस (GPS) और अन्य टेक्नोलॉजी पर भी पड़ेगा जो हमारी जिंदगी को कंट्रोल करते हैं. जान लें कि पिछले कुछ दशकों में, धरती का अपनी धुरी के चारों ओर घूमना, जो ये तय करता है कि एक दिन कितना लंबा है- तेज हो रहा है. ये बदलाव हमारे दिनों को छोटा बना रहा है. जून 2022 में हमने पिछली आधी शताब्दी में सबसे छोटे दिन का रिकॉर्ड बनाया. लेकिन इसके बावजूद, साल 2020 के बाद से वह बढ़ी हुई स्पीड धीरे-धीरे धीमी हो रही है- दिन एक बार फिर से लंबे होने लगे हैं. हालांकि इसका कारण अब तक रहस्य है. आइए जानते इस घटना पर वैज्ञानिकों का क्या कहना है? 

‘द कन्वरसेशन’ में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, तस्मानिया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक मैट किंग और क्रिस्टोफर वाटसन ने कहा, हमारे मोबाइल फोन की क्लॉक बताती है कि 1 दिन में 24 घंटे होते हैं, लेकिन धरती को अपनी धुरी पर 1 चक्कर पूरा करने में लगने वाला समय कभी-कभी इससे थोड़ा अलग होता है. ये बदलाव लाखों सालों की अवधि में लगभग तुरंत होते हैं. इसमें भूकंप और तूफान की घटनाएं भी भूमिका निभा सकती हैं. पता चला है कि एक दिन में 86,400 सेकेंड का जादुई आंकड़ा मिलना बहुत ही दुर्लभ होता है. हमेशा बदलते रहने वाला ग्रह पृथ्वी लाखों सालों से, चंद्रमा की तरफ संचालित ज्वार-भाटे से जुड़े घर्षण प्रभावों की वजह से धरती का घूर्णन धीमा होता जा रहा है. यह प्रक्रिया प्रत्येक सदी में हर दिन की लंबाई में लगभग 2.3 मिलीसेकंड जोड़ती है. जान लें कि कुछ अरब वर्ष पहले पृथ्वी पर दिन केवल 19 घंटे का होता था. हालांकि पिछले 20,000 सालों से, एक और प्रक्रिया विपरीत दिशा में कार्यरत है, जिससे पृथ्वी के घूमने की स्पीड तेज हो गई है.

वैज्ञानिकों के मुताबिक, जब आखिरी हिमयुग खत्म हुआ, तो ध्रुवीय बर्फ (Snow) की चादरों के पिघलने से पृथ्वी की सतह का दबाव कम हो गया और पृथ्वी का मेंटल उसके दोनों पोल की तरफ तेजी से बढ़ने लगा. यह ठीक वैसे ही है जैसे एक बैले डांसर अपनी बाहों को अपने शरीर की तरफ लाती है, तो बहुत तेजी से घूमती है. हमारे ग्रह के घूमने की गति बढ़ जाती है जब यह द्रव्यमान पृथ्वी की धुरी के करीब जाता है. प्रत्येक सदी में यह प्रक्रिया हर दिन लगभग 0.6 मिलीसेकंड कम कर देती है. जान लें कि दशकों और लंबे समय से, धरती के आंतरिक और सतह के बीच संबंध भी चलन में है. इसके अलावा बड़े भूकंप भी दिन की लंबाई में बदलाव कर सकते हैं, हालांकि, यह बहुत छोटी मात्रा में होता है. बड़े पैमाने पर होने वाले बदलावों के अलावा, कम समय में मौसम और जलवायु का भी धरती के अपनी धुरी पर घूमने पर अहम असर पड़ता है, जिससे दोनों दिशाओं में भिन्नता दिखती है. पाक्षिक और मासिक ज्वारीय चक्र (Fortnightly And Monthly Tidal Cycles) ग्रह के चारों ओर बड़े पैमाने पर घूमते हैं, जिससे दिन की लंबाई में किसी भी दिशा में मिलीसेकंड तक बदल सकती है. हम 18.6 साल तक की अवधि में हर दिन के रिकॉर्ड में ज्वार-भाटा देख सकते हैं. हमारे वायुमंडल की हलचल का भी मजबूत प्रभाव पड़ता है. इसके अलावा महासागरीय धाराएं भी एक प्रमुख भूमिका निभाती हैं. वहीं, मौसमी बर्फ और बारिश चीजों को और बदल देते हैं.

पृथ्वी अचानक धीमी क्यों हो रही है: 1960 के दशक से, जब पृथ्वी के चारों ओर रेडियो दूरबीनों के संचालकों ने क्वासर जैसी ब्रह्मांडीय वस्तुओं का एक साथ निरीक्षण करने के लिए तकनीक विकसित करना शुरू किया, तो हमारे पास पृथ्वी के घूमने की दर का बहुत सटीक अनुमान था. फिर इन अनुमानों और एक परमाणु घड़ी के बीच तुलना से पता चला कि पिछले कुछ सालों में दिन की लंबाई कम होती जा रही है. लेकिन एक बार जब हम घूर्णन की गति में उतार-चढ़ाव को दूर कर लेते हैं तो एक आश्चर्यजनक खुलासा होता है जो हम जानते हैं कि ज्वार और मौसमी प्रभावों के कारण होता है. बता दें कि 29 जून, 2022 को धरती पर अपने सबसे छोटे दिन पर पहुंचने के बावजूद उसके बाद से दिनों की लंबाई बढ़ रही है. यह बदलाव पिछले 50 सालों में अभूतपूर्व है. पृथ्वी के दिनों की लंबाई में इस बदलाव का कारण साफ नहीं है.
गौरतलब है कि यह बैक-टू-बैक ला नीना घटनाओं के साथ मौसम प्रणालियों में परिवर्तन की वजह हो सकता है, हालांकि ये पहले भी हो चुके हैं. वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि पृथ्वी की घूर्णन स्पीड में रहस्यमय बदलाव ‘चांडलर वॉबल’ घटना से संबंधित है, जो करीब 430 दिनों की अवधि के साथ पृथ्वी के घूर्णन अक्ष में एक छोटा विचलन है. रेडियो दूरबीनों की एनालिसिस से ये भी पता चलता है कि हाल के सालों में विचलन में कमी आई है; दोनों को जोड़ा जा सकता है. एक अंतिम संभावना यह है कि पृथ्वी के अंदर या आसपास कुछ भी विशिष्ट नहीं बदला है. यह पृथ्वी के घूर्णन रेट में अस्थाई बदलाव उत्पन्न करने के लिए अन्य आवधिक प्रक्रियाओं के समानांतर काम करने वाले दीर्घकालिक ज्वारीय प्रभाव हो सकते हैं.
गौरतलब है कि पृथ्वी की घूर्णन दर को सटीक रूप से समझना कई अनुप्रयोगों के लिए अहम है. इसके बिना जीपीएस जैसे नेविगेशन सिस्टम काम नहीं करेंगे. साथ ही, कुछ सालों बाद टाइमकीपर हमारे ऑफिशियल टाइमस्केल में लीप सेकेंड डालते हैं ताकि यह तय हो सके कि वे धरती के साथ सिंक से बाहर नहीं जा रहे हैं. अगर पृथ्वी को और भी अधिक दिनों में स्थानांतरित करना था, तो हमें ‘नकारात्मक लीप सेकंड’ को शामिल करने की जरूरत हो सकती है. यह अभूतपूर्व होगा और इंटरनेट को ध्वस्त कर सकता है. हालांकि नकारात्मक लीप सेकंड की जरूरत को अभी असंभाव्य माना जाता है.
Spread the information

Leave a Reply

Your email address will not be published.