नीतिशा खलखो

भाषा एवं नियुक्तियों के सवाल पर झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार सवालों के घेरे में है। भाषा के मुद्दे पर जन असंतोष एवं आक्रोश को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार को अपना कदम कुछ पीछे खींचना पड़ा। पर सुसंगत नीति के अभाव में राज्य में भाषा का सवाल अब भी अहम मुद्दा बना हुआ है। इसी प्रकार विभिन्न नियुक्तियों में मौजूद विसंगतियों को लेकर भी लोगों में काफी नाराजगी एवं आक्रोश है। नियुक्तियों के मामले में सरकारी नीतियां, प्रशासनिक हस्तक्षेप कैसे झारखंड के वंचित समूहों को, आगे बढ़ाने के बजाय और पीछे की ओर धकेल रहा है, इसका प्रमाण सहज उपलब्ध है। प्रस्तुत है इसी तथ्य को रेखांकित करता नीतिशा खलखो का यह महत्वपूर्ण आलेख / झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार के नाम खुला पत्र –

एकेडेमिया, प्रशासन और सत्ता में बैठा ब्राह्मणवाद कैसे वंचितों को और वंचित केटेगरी में धकेलने को नीतियां बनाता है उसका उदहारण है जेपीएससी की रेगुलर असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्तियां (adv- 04/2018) कुछ तथ्य जिस ओर आपका ध्यान आकृष्ट करना आवश्यक बन पड़ा है। बैकलॉग नियुक्ति की प्रक्रिया बस पूरी ही हुई है और झारखंड सरकार को ढेरों नवनियुक्त प्रोफेसर की बौछार से मन फूला समाया ही था कि कुछ बातें जो कचोट रही थी वह भी यहां कहना आवश्यक बन पड़ता है। अगर हम सत्ता की अच्छी नीतियों का स्वागत और प्रशंसा कर सकते हैं तो उनके ही द्वारा गलत को गलत कहने का साहस भी रखना हम संवेदनशील लोगों का दायित्व है। बैकलॉग में अंग्रेजी प्रोफेसर नियुक्ति में लिंगविस्टिक में MA(मास्टर्स) किये विद्यार्थियों को दरकिनार किया गया जो कतई नहीं होना चाहिए था। वह अंग्रेजी के साथ भाषा संबधी पढ़ाई और बतौर एक पेपर पढ़ाया जाता रहा है , जिससे दूरी बनाना, अंग्रेजी जगत का नुकसान है।

दूसरी बात आदिवासी भाषाओं के संदर्भ में –
1. संथाली, हो, खड़िया, मुंडारी और कुड़ुख की ज्यादातर सीट unresrved(अनारक्षित) के तहत निकाली गई है।
2. इन सभी आदिवासी भाषाओं में एस टी (आदिवासी/अनुसूचित जनजाति) की पोस्ट नहीं रखी गई है।
3. संथाली भाषा का इंटरव्यू हो चुका है और जो चीज़ें सामने आई वह कुछ इस प्रकार है। कुल 11 पोस्ट, नियम अनुसार 3 गुना कैंडिडेट्स को बुलाया जाना तय किया गया था। बुलाया गया 21 कैंडिडेट्स को। UR (अनारक्षित) में सारी पोस्ट होने के कारण कट ऑफ रखा गया 44.50, SC ( अनुसुचित जाति) के लिए कट ऑफ रखा गया 30 प्रतिशत।। एस टी (अनुसुचित जनजाति/आदिवासी ) के लिये कोई पद नहीं। अब सवाल बनता है कि मात्र 21 कैंडिडेट्स क्यों शॉर्टलिस्ट किये गए ? यह संख्या क्यों नहीं 33 की गई ?

रोस्टर बनाने वाले वो कौन से लोग हैं जो यह नहीं समझ पाए कि संथाली बोलने वाला SC , BC, BC-Two, कँहा मिलेंगे ? और जिनमे मिलेंगे वह है आदिवासी कम्युनिटी तो वहां क्यों ST पोस्ट एक भी नहीं बनाई गई। UR के तहत सभी संथाली कैंडिडेट्स हैं, कोई अन्य जाति व समाज का कोई कैंडिडेट नहीं है। फिर इतना हाई कट ऑफ करके क्यों उनको इंटरव्यू तक देने से रोका गया है ? यंहा 44.50 % (एपीआई ) को हाई कट ऑफ कहने का तात्पर्य यह है कि एक तो 10वीं , 12वीं, तक के नंबर जोड़े जा रहे। अब यह तय कर लें कि 80 के दशक में जिन्होंने दसवीं पास की होगी उसके मार्क्स और जो आज 2000 या उसके बाद के दसवीं किये हुए कैंडिडेट्स होंगे तो दोनों के मार्क्स को एक स्केल में तौलना कितना जायज है ? जंहा आज 100% और 99% लाने वाले बोर्ड्स, (सीबीएसई, आई सी एस सी, और स्टेट बोर्ड ) आदि का अंतर क्या एक तराजू पर तौले जा सकते हैं ?

आदिवासी भाषाओं की पढ़ाई जब 1980 के दशक में ट्राइबल एंड रीजनल लैंग्वेज डिपार्टमेंट के नाम पर शुरू हुई तबसे लेकर आज तक एक प्रॉपर अपॉइंटमेंट उस विभाग को हासिल नहीं हुए। पहली दूसरी पीढियां जो वँहा से NET , JRF पीएचडी करके निकले उनको आज तक सरकारें सम्मान पूर्वक जीने का अधिकार नहीं दे सकीं। आज वैसे कई कैंडिडेट्स इस एपीआई गेम से बाहर होंगे। आप उनकी पुस्तकें सिलेबस में रख कर पढ़ा रहे होंगे लेकिन पात्रता की दृष्टि से आज वो कैंडिडेट्स तक नहीं बन पा रहे होंगे ?

4. जब इन आदिवासी भाषाओं के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर की बहाली प्रक्रिया पर एक्सपर्ट की और नजरे घुमाकर देखेंगे तो पाएंगे कि इनमें एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर रैंक के एक्सपर्ट भी नहीं मिल पा रहे होंगें। क्योंकि नियुक्तियां की नहीं गई। क्योंकि प्रोमोशन्स दिए नही गए। क्योंकि आदिवासी भाषाओं से एक समाज रोटी पाकर जीवित हो सकता है, सर्वाइव अच्छे से कर सकता है तो उन भाषाओं की रोटी बनने ही नहीं दी गई (हिंदी अंग्रेजी उर्दू बंगला ओड़िया आदि का यही हाल नहीं है जबकि झारखंड में, तो इन आदिवासी भाषाओं को मरणासन्न में कैसे, क्यों और कौन लेकर जा रहा)। और 1980 के बाद से लेकर 1996 तक में इन आदिवासी भाषाओं के विभाग की बहालियों को लेकर बिहार सरकार की बहाली की प्रक्रिया शुरू हुई जो जाने कहां विलुप्त हुई पता ही नहीं चला।

2007 में JPSC (झारखंड)ने इंटरव्यू लिया, रिजल्ट तक तैयार किया, विश्वविद्यालय को जमा कर दिया सीलबंद रिजल्ट; लेकिन वह भी जाने कहां राँची विश्वविद्यालय के कूड़ेदान में फेंक दिया गया ?? और आज जब यह तीसरी बार बारी आई है तो नीति निर्धारकों के अनुसार आदिवासी भाषाओं के कैंडिडेट नॉन आदिवासी लोगों के मध्य खोजने का प्रयास कर रही। याद रखें, BC ( बैकवर्ड कास्ट ) की कुड़ुख सीटें 6 की संख्या में बर्बाद ही होंगीं। SC (सीडयूल कास्ट ) की सीट भी खाली ही बर्बाद की जाएंगी। और UR के एपीआई कट ऑफ खेल के पीछे योग्य उम्मीदवारों को कैंडिडेट बनने तक से रोका जाएगा। उन्हें उम्र की सीमा पर रोका जाएगा।

जबकि इतने लंबे सालों से यह नियुक्तियां हाशिये में धकेल दी गईं इसका खामियाजा कैंडिडेट्स क्यों उठाएं। 7वें JPSC की परीक्षा में जिस प्रकार उम्र को नियत एक खास साल (लास्ट JPSc जिस साल से नहीं हुआ था वह साल कंसीडर किया गया था, और कैंडिडेट की आयु भी पुरानी ही तय की गई थी उसी तर्ज पर इस बार भी यह नियुक्ति प्रक्रिया पूरी हो) से तय किया गया था वह यंहा भी लागू हो। राज्य सरकार से प्रार्थना है कि यह अन्याय अपने हाथों न होने दे। इन आदिवासी भाषाओं की नियुक्ति के प्रति तर्क, और न्यायसंगत उपाय अपने सत्ता के नीति निर्माताओं से करवाएं। ऐसा न हो कि इस बार भी यह आदिवासी भाषाएँ बलि कर दी जाएं।

सादर

नीतिशा खलखो

( लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलतराम कॉलेज में हिंदी पढ़ाती हैं )

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