डॉ दिनेश मिश्र

झारखंड में आये दिन निर्दोष महिलाओं को जादू-टोने के आरोप में हत्या करने,प्रताड़ित करने की घटनाएं होती है उनमें से अधिकांश मामले आम लोगों की नजरों के सामने नहीं आते, सिर्फ ऐसी घटनाएं जिनमें महिला को दी गई प्रताड़ना हद से बाहर सी हो गई हो, सांघाटिक चोटें पहुंची हो या हत्या हो गई हो, वे ही मामले पुलिस व प्रेस या सामाजिक कार्यकर्ताओं तक पहुंचते हैं। छोटी-छोटी घटनाएं तो लोगों की जानकारी में आती ही नहीं, कुछ मामलों में प्रताड़ित महिला और उसके परिजन बदनामी के डर से मामले को उजागर नहीं करते हैं। कहीं-कहीं प्रताड़ना करने वाला गुट इतना शक्तिशाली व प्रभावी होता है कि उसकी पहुंच के कारण मामला रफा-दफा कर दिया जाता है।


राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक समाचार की सुर्खियां बनती प्रताड़ना की घटनाएं किसी एक क्षेत्र या जिले की नहीं हैं, बल्कि प्रदेश के लगभग सभी जिलों से ऐसी घटनाओं की जानकारी मिलती है। झारखंड के 24 जिलों में सात हजार से अधिक मामले तथा 1800 से अधिक हत्या के मामले पुलिस में हैं जिनमें से गढ़वा जिले के 795, पलामू जिले के 299, हजारीबाग के 287, रांची जिले के 112 मामले है. बाकी अन्य जिलों के भी सैकड़ों मामलों की प्रमाणिक जानकारी हमारे पास है, जिसमें 14 वर्ष की बालिका से लेकर 80 वर्ष तक की वृध्दा को प्रताड़ित करने के मामले हैं। ये कुछ ऐसे उदाहरण है़ जो अंधविश्वास के कारण डायन (टोनही) के संदेह में प्रताड़ना को स्पष्ट दर्शाते हैं।

21वीं सदी में प्रवेश कर चुका हमारा समाज जहां एक ओर स्वयं को अति आधुनिक मानता है, वहीं दूसरी ओर भांति-भांति के अंधविश्वास और कुरीतियाँ समाज में जड़ जमाये हुए है़। जादू-टोने के नाम पर महिला को दी जाने वाली प्रताड़ना डायन प्रताड़ना के नाम से जानी जाती है, झारखंड व अनेक प्रदेशों के प्रमुख अंधविश्वासों में से एक है। अंधविश्वास एवं टोना-टोटका जैसी घिसी-पिटी मान्यताओं के दम पर आज भी कई स्थानों पर महिला प्रताड़ना का कारण है। इस संबंध में एक आश्चर्य की बात यह है कि साक्षरता के प्रकाश से दूर अनपढ़ ग्रामीणों को लेकर पढ़े-लिखे लोग भी इन बातों पर कुछ न कुछ भरोसा करते हैं।

अंधविश्वास के जुनून की बलि चढ़ती महिला प्रताड़ना की घटनाएं सभ्य व पढ़े-लिखे समाज के लिए एक शर्म की बात है, वहीं दूसरी ओर पूर्ण साक्षरता की ओर धीरे-धीरे कदम बढ़ा रहे देश के काफी नागरिकों के मन में अभी भी संदेह ही है, कि क्या डायन वास्तव में कोई ऐसी शक्तियों से युक्त महिला होती है, जो किसी के सम्मुख आर्थिक, शारीरिक, मानसिक उलझने पैदा कर सके या जादू टोना कर किसी को बीमारी या नुकसान पहुंचा सके। क्या डायन का कोई चमत्कारिक अस्तित्व है, जो लोगों को इतना नुकसान पहुंचा सकता है, कि उससे बचाव के लिए उसके साथ मारपीट कर गांव निकाला करना, या हत्या करना ही एकमात्र उपाय है या अंधविश्वास का सहारा लेकर जादू, टोना, टोटका का कुप्रचार कर, गांव में भय व भ्रम का वातावरण निर्मित कर स्वयं की स्वार्थसिध्दि ही इसके मूल में है।

किसी महिला को ” डायन घोषित करने से उसे शारीरिक प्रताड़ना, मारपीट, मानसिक प्रताड़ना, सामाजिक बहिष्कार जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। कई बार प्रताड़नाओं के चलते या तो उसे घर-बार छोड़कर गांव से बाहर निकलना पड़ता है, जिससे या तो वह स्वयं आत्महत्या कर लेती है अथवा कई मामलों में मारपीट कर उसकी हत्या कर दी जाती है। महिला अत्याचार की ऐसी घटनाएं गांवों, कस्बों में अधिकांश घटित होती रहती हैं।

आजादी के पहले शिक्षा व चिकित्सा सुविधा का प्रसार देश में बहुत कम था, गांव, कस्बों में या तो स्कूल कालेजों की पढ़ाई करने के लिए तथा मीलों चलकर जाना पड़ता था, वहीं चिकित्सा के लिए मजबूरीवश गांव में उपलब्ध बैगा गुनिया, झाड़-फूंक करने वालों के ही भरोसे रहना पड़ता था। आजादी के बाद आज स्थिति कुछ सुधरी जरूरी है, लेकिन अब भी पुरानी मान्यताओं के चलते ग्रामीण अंचलों में किसी बच्चे को बुखार आने, पेट में दर्द होने, खाना न खाने, रात में रोने, नींद न आने पर, गांव में फसल कम होने, पानी कम गिरने या अधिक गिरने, पशुओं की तबियत खराब होने, दूध न देने, पशुओं के मरने आदि जितनी भी किस्म की विपरीत परिस्थितियां होती है, उनका कारण जादू, टोना करना, नजर लगाना को ही मान लिया जाता है तथा बैगा गुनिया में झाड़-फूंक कराने, ताबिज पहनने, भभूत खाने के चक्कर में लोग समय व धन नष्ट करते हैं।

बैगा गुनिया नजर लगाने, जादू-टोना करने की बात करने लगते हैं तथा पूरा का पूरा गांव उस महिला की खोज में लग जाता है, जिस के जादू टोने से उस व्यक्ति की तबियत खराब, फसल खराब, व्यापार में हानि हुई हो। गांव में ही ऐसे कई लोग होते हैं जो किसी महिला को डायन अर्थात जादू-टोना करने वाली करार देते हैं व उसके खिलाफ दुष्प्रचार होता रहता है। धीरे-धीरे गांव ही उस महिला के विरोध में हो जाता है। कथित डायन के विरोध में कई काल्पनिक किस्से कहानियां गढ़ दी जाती हैं,और अफवाहें फैलना आरम्भ हो जाता है.

डायन/टोनही करार दी जाने वाली महिला साधारणतया गरीब घर की प्रौढ़, विधवा तथा कई बार नि:संतान महिला होती है, जिनके घर में या तो सदस्य कम होते हैं अथवा निर्धन, अकेले होने के कारण सामूहिक व सुनियोजित षडयंत्र का प्रतिकार करने में अक्षम होते हैं। पहले तो उस महिला को कहा जाता है कि उसने जादू-टोने के बल से जिस परिवार पर विपदा लायी है, इसलिए स्वयं ही उसे दूर करें, जो कि उसके वश में होता ही नहीं। धीरे-धीरे दुव्यर्वहार, प्रताड़ना, मारपीट, सामाजिक बहिष्कार, गांव से निकालने का प्रयास आदि की कोशिशें की जाती है। जिसमें वे बहुत कम खबरें ही हमारे सभ्य कहे जाने वाले समाज के पास पहुंच पाती है, अधिकांश घटनाएं पता ही नहीं लग पाती। समाचार पत्रों में ऐसी घटनाएं प्रमुखता से प्रकाशित होने के बाद भी जाने क्यों सामाजिक चेतना को प्रभावित नहीं कर पाती.

गाँव भर में अंधविश्वास के चलते कई प्रकार की अफवाहों का बाजार गर्म रहता है, ऐसे अमुक औरत के पास नहीं जाना, वह नजर लगा देगी, या टोटका टोना कर देगी, उससे कुछ लेकर खाना नहीं आदि आदि। बच्चों को इस प्रकार की बात सिखाई जाती है, जिससे उनके दिमाग में एक अनजाना भय भी रहता है। नजर लगाने व नजर उतारने का प्रपंच चलता ही रहता है, किसी के दरवाजे पर नींबू, सिंदूर, मिर्च, लाल कपड़ा आदि किसी ने शरारतवश रख दिया तो जादू-टोने, टोटके का हल्ला हो जाता है। गांव व कस्बों में भ्रम व भय व तनाव का माहौल बन जाता है। जबकि इस सबका अंत एक महिला को डायन घोषित कर उसे प्रताड़ित कर होता है,

कोई नारी डायन नहीं अभियान संचालित करने के लिए ग्रामीण अंचल के प्रवास के दौरान मैंने यह पाया है कि गरीब परिवार , विधवा, परित्यक्ता, बेसहारा, महिलाएं ऐसी प्रताड़ना की शिकार अधिक हुई हैं उनमें में 40 से 60 वर्ष की महिलाओं की संख्या अधिक है , डायन प्रताड़ना के मामलों प्रताड़ना के तौर तरीके बड़े ही क्रूर हैं, जिनमें गला काटने, जिंदा जला कर मारने, चारों ओर से घेर कर पीटने से मौतें हुई हैं, वही ईमली के से ,डंडे ,पत्थर ,हाथ पैर से मारने के भी मामले हैं। अनेक मामलों में तो किसी बैगा के कहने पर उन्हें आग का घेरा पार करने, बीमार को ठीक करने, मृतक को पुनर्जीवित करने को कहा गया और असफल होने पर उनके साथ बर्बरतापूर्ण व्यवहार किया गया जिसमें सिर के बाल काटने, मुंह काला करने, दांत तोड़ने, जीभ काटने, आंख फोड़ने जैसी अमानुषिक अत्याचार किया कुछ मामलों में तो वे घटनास्थल पर रात भर पड़ी रही उनकी मृत्यु हो गयी , तो कभी उन्हें अस्पताल भी ले जाने नही दिया गया .मेरा अनेक स्थानों पर जाना हुआ उनसे मुलाकात होती है ,उनके परिजनों से बात होती है वे बताते है ऐसी घटनाओं के बाद उनका गाँव मे रहना भी दूभर हो जाता है लचकेरा की एक महिला तो सालों घर से बाहर नहीं निकली. उसे किसी भी इंसान से, किसी भी आवाज से डर लगता था, बहुत दिनों बाद नॉर्मल हो पाई. इन सब घटनाओं को देखते सुनते ,मिलते किसी भी व्यक्ति का दिल भर आएगा.

हमने अपने अभियानों के दौरान यह अनुभव किया है ,समाज में अंधविश्वास दो प्रकार के हैं एक तो वे जो पुरातन सामाजिक परंपराओं से पीढ़ी दर पीढ़ी जुड़ते गए और दूसरे जो बीमारियों , उनकी उत्पत्ति, कारण और उनके इलाज को लेकर हैं ,जादू टोना, भूत प्रेत, सूर्य ग्रहण ,अमावस्या, नजर लगना, आँख फड़कना ,बिल्ली के रास्ता काटने, छीकने, दिशा शूल, ग्रहोंके सम्बंध में शुभ अशुभ ,जैसी मान्यताएं हावी रहीं, वहीं दूसरे प्रकार के अंधविश्वास बीमारियों और उनके कारणों व उनके उपचार के सम्बंध में हैं. बीमारियों के कारण संक्रमण, कुपोषण और दुर्घटनाएं है. जिनमे से संक्रमण बैक्टीरिया, फंगस, वायरस से होता है. कुपोषण से बचने के लिए संतुलित , पौष्टिक आहार की आवश्यकता होती है, तथा दुर्घटनाओं से बचाव के लिए सावधानी , सतर्कता जरूरी है.

अंधविश्वास एवं भ्रम के कारण आज भी अनेक लोग बीमारियों का कारण जादू टोना, नजर लगना, तथा कथित तन्त्र, मन्त्र मानते हैं ,और इसी लिए उसके उपचार के लिए बैगा, गुनिया, झाड़ फूँक के फेर में आ जाते हैं. और बैगा के बहकावे में आकर अंधविश्वास में पड़कर गलत कार्यों को अंजाम देते हैं.जिससे डायन प्रताड़ना, बलि,ठगी, जैसी घटनाएं होती हैं। लेकिन अंधविश्वास व निहित स्वार्थ के कारण हो रहे इन अत्याचारों पर प्रभावी रोक लगाना आवश्यक है, क्योंकि आज भी अधिकांश गांव ऐसे हैं जहां साक्षरता, प्रौढ़ शिक्षा के प्रचार के बावजूद डायन बैगा, जादू टोना जैसी बातों पर लोग अंधश्रध्दा रखते हैं। विनाशकारी, चमत्कारी शक्ति को देखने का दावा कहीं भी कोई भी नहीं करता, बल्कि सुनी सुनायी बातों व अफवाहों को फैलाने में सब लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष मदद करते हैं।

पिछले अनेक वर्षो से इस मुद्दे पर मैं लगातार लिखते व कार्य करते हुए मैंने यह अनुभव किया है कि आज भी अंधविश्वास की जड़ें गहरी हैं जिसका कारण अशिक्षा, स्वास्थ्य सुविधा की कमी, पुरानी परंपराओं का दबाव व वैज्ञानिक दृष्टिकोण का न होना है। विभिन्न सभाओं के दौरान ग्रामीण जनों में से जागरूक लोग अपने गांव के बैगाओं व ओझाओं की करतूतें व कारगुजारियां बताते हैं व सामाजिक कुरीतियों पर खुलकर बातचीत करते हैं व प्रश्नोत्तर कार्यक्रम में भाग लेते है। यदि किसी गांव में किसी बैगा, तांत्रिक, गुनिया का सम्मान है, उसे गांव के कार्यक्रमों में सम्मानपूर्वक बुलाया जाता है तो इसका मतलब यह नहीं कि उसे किसी महिला को डायन घोषित करने का व गांव के लोगों को भ्रमित कर एक निर्दोष महिला के साथ मारपीट करने व जान से मारने का अधिकार मिल गया है? कोई भी संस्कृति व परम्परा किसी दोषी को बचाने की वकालत नहीं करती तथा न ही किसी निर्दोष को चारों ओर से घेरकर मारने की इजाजत देती है।

यह सच है कि सामाजिक परम्पराएं सदियों से चली आ रही हैं। लोगों की उन पर आस्था रहती है लेकिन जब ये परम्पराएं, कुरीतियों के रूप में बदल जाती है व निर्दोष व्यक्तियों के शोषण का आधार बन जाती हैं तब उनमें समय समय पर परिवर्तन होना चाहिए। जिसमें समाज के लोगों को आगे बढ़कर सक्रियता पूर्वक हिस्सा लेना चाहिए। सिर्फ हाथ पर हाथ रखकर बैठने से कुरीतियां नहीं बदलेगी। सिर्फ कानून बलों या पुलिस कार्यवाही से काम नहीं चलेगा विचारों के आदान-प्रदान की, नये दृष्टिकोण को जागृत करने की आवश्यकता है।

आईये, कुछ ऐसे उपायों पर चर्चा करें, जो डायन प्रताड़ना” के निर्मूलन में प्रभावकारी हो सकते हैं, चूंकि ऐसे प्रकरणों की संख्या ग्रामों, कस्बों, छोटे शहरों में अधिक होती हैं, इसलिए ऐसे स्थलों पर कोटवार, समाजसेवी संस्थाओं, ग्राम पंचायत, शिक्षकों, चिकित्सकों, पुलिस कर्मियों की सक्रिय भूमिका हो सकती है तथा महिलाएं प्रताड़ना से बचायी जा सकती हैं। यदि कोई प्रकरण आरंभिक अवस्था में ही ज्ञात हो जाता है तो उसका निराकरण संभव है। कोटवार, पंच-सरपंच को जादू टोना की अफवाह संबंधी थोड़ी सी भनक पड़ने पर आसपास के नागरिकों की बैठक लेकर मामले को तुरंत सुलझाना चाहिए। गांवों में किसी व्यक्ति के बीमार होने, चाहे व बच्चा ही क्यों न हो अथवा बुजुर्गवार व चिकित्सक की सलाह लेकर उसका उपचार कराना चाहिए।

क्योंकि बीमारियां सूक्ष्म जीवाणु, विषाणु के प्रकोप से होती हैं, जिनका निदान समय रहते कर लिये जाने पर पूर्णत: ठीक किया जा सकता है। बीमारियों के उपचार के लिए तथाकथित जादू-टोना, गैर जरूरी झाड़ फूंक की मदद लेने से बचना चाहिए। पशुओं की बीमारियों, दूध कम देने, आदि का कारण भी अलग अलग होता है। इसी प्रकार अकाल पड़ने, पानी कम गिरने, बाढ़ आने, गर्मी पड़ने, भूकंप आने का कारण भी प्राकृतिक है न कि किसी पुरूष व महिला की चमत्कारिक शक्ति का प्रताप होता है। इसलिए ऐसे किसी भी कारण से किसी महिला को डायन टोनही, बैगिन कहना गलत है, क्योंकि जो महिला अपनी स्वयं की परिवार वालों की रक्षा नहीं कर सकती, वह किसी दूसरे का भला व बुरा करने में समर्थ कैसे हो सकती है।

सामाजिक कार्यकर्ताओं को चौपालों, पंचायतों, कस्बो में जाकर लोगों को सच्चाई से रूबरू कराना चाहिए। इस कार्य में मीडिया की भी काफी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। टेलिविजन के विभिन्न चैनलों में भूत, प्रेत, जादू, टोना की धारणाओं वाले सीरीयलों पर भी नियंत्रण लगाने पर सरकार को विचार करना चाहिए। पंचों, चिकित्सकों, शिक्षकों का सहयोग इसमें लिया जा सकता है। कला जत्थों को नाटकों, एकांकी के माध्यम से लोगों को यह समझाना होगा। समाज में सभी महिला-पुरूष बराबर हैं। कोई भी व्‍यक्ति कथित चमत्कारिक शक्ति के सहारे, किसी के परिवारजनों, पशुओं, खेती, नौकरी का नुकसान नहीं कर सकता। यदि ऐसी घटनाएं प्रारंभ में ही नजरों में आ जावे, तो समाज की कोई भी महिला डायन के रूप में अभिशापित होने से बच जावेगी व समाज से इस अंधविश्वास का निर्मूलन किया जा सकेगा।

हमारी संस्कृति में महिलाओं की पूजा करने की बात कही गयी है वही दूसरी ओर ऐसी घटनाएं निर्दोष महिलाओं के जीवन के लिए ही खतरा बन जाती हैं. डायन के संदेह में प्रताड़ना के निर्मूलन , उनके सामान्य मानवाधिकारों के हनन की रोकथाम के लिए सामाजिक जागरूकता अभियान चलाने जनजागरण सभाएं करने ,युवाओं और छात्रों को सम्मिलित करने, स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने व सक्षम कानून बना महिलाओं और सभी प्रताडितों के अधिकारों की रक्षा की जा सकती है । झारखंड में डायन प्रताड़ना निरोधक कानून भी है, जिसके पूरे ग्रामीण अंचल में प्रचार प्रसार करना , ग्राम पंचायतों में डायन प्रताड़ना के विरोध में जागरूकता के लिए पोस्टर लगवाना आवश्यक है. डायन के सन्देह में प्रताड़ित महिलाओं के उपचार, मुआवजे , निवास पुनर्वास, रोजगार, की व्यवस्था करने की आवश्यकता है , साथ ही ऐसे मामलों के लिए फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट बना कर महिलाओं को त्वरित न्याय दिलाने की जरूरत है . प्रदेश सरकार को डायन के संदेह में प्रताड़ित महिलाओं के अधिकारों और उनके जीवन की रक्षा के लिए ठोस पहल करने की आवश्यकता है ताकि झारखंड में डायन के सन्देह में प्रताड़ना बंद हो , हत्याएं रुकें तथा प्रताडितों को राहत और न्याय मिल सके.

डॉ दिनेश मिश्र
वरिष्ठ नेत्र रोग विशेषज्ञ
संयोजक ,कोई नारी डायन(टोनही)नहीं अभियान.
अध्यक्ष, अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति छत्तीसगढ़.

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