आज देश की पहली महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले के योगदान को जिस तरह याद करना चाहिए, वैसे नहीं किया जाता. 19वीं सदी में जब देश में राजनैतिक गुलामी के साथ-साथ सामाजिक गुलामी का भी दौर था, तब सावित्री बाई फुले ने शिक्षा के महत्व को जाना, समझा और महिलाओं की आज़ादी के नए द्वार खोलकर उनमें नई चेतना का सृजन किया. आज ही के दिन 1831 में देश की पहली महिला टीचर सावित्रीबाई फुले का जन्म महाराष्ट्र के सतारा के नायगांव में एक किसान परिवार में हुआ था।  शिक्षा मनुष्य के विचारों से लेकर उसकी सम्पूर्ण जीवन शैली को प्रतिबिंबित व प्रभावित करती है. आजादी के 74 साल बाद भी भारत की शिक्षा व्यवस्था अन्य देशों की तुलना मे काफी निम्न स्तर की है, जो भारत के लिए गंभीर समस्या है. यदि भारत को बहुत तेज गति से विकास करना है, तो उसे अपनी शिक्षा व्यवस्था मे सुधार करना होगा. 

शिक्षा किसी भी देश या समाज के विकास का आधारभूत ढांचा होता है. जिस देश की शिक्षा प्रणाली उच्च कोटि की होती है, उस देश का विकास बहुत तेज गति से होता है. आज दुनिया भर में यह प्रमाणित हो चुका है कि शिक्षा हर एक नागरिक का सम्पूर्ण विकास करती है. एक ओर जहां अधिकांश अफ्रीकी देश केवल 25 से 50 प्रतिशत साक्षरता के चलते गृहयुद्ध की स्थिति में दरिद्री झेल रहे हैं. वहीं, पाश्चात्य देश 100 प्रतिशत के निकट की साक्षरता के चलते फलफूल रहे हैं. भारत में वर्तमान में यह 75 प्रतिशत के आस-पास है.

आजादी के पहले गुलाम भारत में महिलाओं को पढ़ने-लिखने का अधिकार नहीं था. आज सावित्री बाई फुले की जयंती पर उनके द्वारा किए गए योगदान को समझना और जानना और भी जरूरी हो जाता है कि कैसे उन्होंने उस दौर में स्त्रियों के अधिकारों, अशिक्षा, छुआछूत, सतीप्रथा, बाल या विधवा-विवाह जैसी कुरीतियों पर आवाज उठाई होगी? कैसे उन रूढ़िवादी परंपराओ को तोड़कर महिलाओं को पढ़ने व आगे बढ़ने की राह दी होगी और देश की आधी आबादी महिलाओं को शिक्षा के माध्यम से मुख्यधारा में ला खड़ा किया होगा. लेकिन, ऐसी समाज सेविका जिन्होंने सामाजिक कुरीतियां के खिलाफ आवाज उठाई, क्या हम उनके योगदान और बलिदान के साथ न्याय कर पाए?

माता सावित्री बाई फुले कौन थी 

जनवरी 1831 में महाराष्ट्र के सतारा जिले में स्थित नायगांव नामक छोटे से गांव में जन्मी सावित्री बाई फुले ने अपने पति दलित चिंतक व समाज सुधारक ज्योतिराव फुले से पढ़कर सामाजिक चेतना फैलाई. देश की प्रथम महिला शिक्षिका सावित्री बाई फुले एक मिसाल, प्रमाण और प्रेरणा हैं कि अगर दृढ़ संकल्प और इच्छाशक्ति हो तो समाज में नई चेतना का विस्तार किया का सकता है. जिस समय सावित्री बाई फुले ने शिक्षा की ज्योति जलाई उस समय लड़कियों को शिक्षा से वंचित रखा जाता था, इसके बावजूद भी, उन्होंने नारी शिक्षा के बीड़े को अंजाम तक पहुंचाया और इसके बाद ही समाज से कुंठित वर्ग की नारियां भी शिक्षा ग्रहण करने के लिए आगे आने लगीं.

महिला शिक्षा के लिए दिया काफी योगदान, लड़कियों के खोले थे 18 स्कूल

अपने पति ज्योतिराव के साथ मिलकर उन्होंने महिला शिक्षा पर बहुत जोर दिया। देश में लड़कियों के लिए पहला स्कूल साावित्रीबाई और उनके पति ज्योतिराव ने 1848 में पुणे में खोला था। इसके बाद सावित्रीबाई और उनके पति ज्योतिराव ने मिलकर लड़कियों के लिए 17 और स्कूल खोले। 

पिता के मना करने  के बाद भी जारी रखी  पढ़ाई 

मात्र 9 साल की उम्र में सावित्री बाई फुले का विवाह हुआ और जब उनका विवाह हुआ तब वह अनपढ़ थीं. ज्योतिबा फुले भी तीसरी कक्षा तक ही पढ़े थे. जिस दौर में सावित्री बाई फुले पढ़ने का सपना देख रही थीं. उस दौर में अस्पृश्यता, छुआछूत, भेदभाव जैसी कुरीतियां चरम पर थीं. उसी दौरान की एक घटना के अनुसार एक दिन सावित्री अंग्रेजी की किसी किताब के पन्ने पलट रही थीं, तभी उनके पिताजी ने देख लिया. वह दौड़कर आए और उनके हाथ से किताब छीनकर घर से बाहर फेंक दी कारण सिर्फ़ इतना था कि शिक्षा का हक़ केवल उच्च जाति के पुरुषों को ही था. दलित और महिलाओं के लिए शिक्षा ग्रहण करना पाप था.

बस उसी दिन से वह किताब वापस लाकर प्रण कर बैठीं कि कुछ भी हो जाए वह एक न एक दिन पढ़ना जरूर सीखेंगी. इसी लगन से उन्होंने एक दिन ख़ुद पढ़कर अपने पति ज्योतिबा राव फुले के साथ मिलकर लड़कियों के लिए 18 स्कूल खोले. उन्होंने 1848 में महाराष्ट्र के पुणे में देश के सबसे पहले बालिका स्कूल की स्थापना की थी और अठारहवां स्कूल भी पुणे में ही खोला गया था. उन्‍होंने 28 जनवरी, 1853 को गर्भवती बलात्‍कार पीड़ितों के लिए बाल हत्‍या प्रतिबंधक गृह की स्‍थापना की.

सावित्री बाई पर कई बार फेंका गया गोबर और पत्थर

परिवार से निकाले जाने बाद ब्राह्मणवादी शक्तियों ने सावित्री बाई फुले का पीछा नहीं छोड़ा. जब सावित्री बाई फुले स्कूल में पढ़ाने जातीं, तो उनके ऊपर गांव वाले पत्थर और गोबर फेंकते. सावित्री बाई रुक जातीं और उनसे विनम्रतापूर्वक कहतीं, ‘मेरे भाई, मैं तुम्हारी बहनों को पढ़ाकर एक अच्छा कार्य कर रही हूं. आप के द्वारा फेंके जाने वाले पत्थर और गोबर मुझे रोक नहीं सकते, बल्कि इससे मुझे प्रेरणा मिलती है. ऐसे लगता है जैसे आप फूल बरसा रहे हों. मैं दृढ़ निश्चय के साथ अपनी बहनों की सेवा करती रहूंगी. मैं प्रार्थना करूंगी की भगवान आप को बरकत दें.’ गोबर से सावित्री बाई फुले की साड़ी गंदी हो जाती थी, इस स्थिति से निपटने के लिए वह अपने पास एक साड़ी और रखती थीं. स्कूल में जाकर साड़ी बदल लेती थीं.

सावित्री बाई फुले को आधुनिक मराठी काव्य की अग्रदूत भी माना जाता है. वह अपनी कविताओं और लेखों में हमेशा सामाजिक चेतना की बात करती थीं. उनकी बहुत सी कविताएं हैं जिससे पढ़ने-लिखने की प्रेरणा मिलती है, जाति तोड़ने और ब्राह्मण ग्रंथों से दूर रहने की सलाह भी मिलती है. सावित्री बाई फुले इस देश की पहली महिला शिक्षिका होने के साथ-साथ, समाज के वंचित तबक़े ख़ासकर स्त्रियों और दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने के लिए हमेशा याद की जाएंगी.

 

 

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